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Shiva Purana: माता पार्वती और शिव जी का विवाह कैसै हुआ था संपन्न? जानिए भोलेनाथ की बारात में कौन हुए थे शामिल

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी
सार

Shiva Purana: शिव जी और पार्वती की प्रेम कहानी सिर्फ प्रेम की कहानी नहीं है, बल्कि एक दिव्य गाथा है, जो सच्ची भक्ति, धैर्य और अटूट विश्वास का प्रतीक है। 

माता पार्वती और शिव जी का विवाह
Shiva Purana: शिव जी और पार्वती की प्रेम कहानी सिर्फ प्रेम की कहानी नहीं है, बल्कि एक दिव्य गाथा है, जो सच्ची भक्ति, धैर्य और अटूट विश्वास का प्रतीक है। यह एक ऐसी कहानी है, जिसने पीढ़ियों से लाखों लोगों को प्रेरित किया है। हिंदू धर्म में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह न केवल एक पवित्र मिलन है, बल्कि प्रेम, तप, समर्पण और आध्यात्मिकता का उदाहरण भी है। यह कहानी सृष्टि के दो महान शक्तियों- शिव और शक्ति के साथ आने की गाथा है, जो आज भी भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। आइए, भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह से जुड़ी रोचक कहानी जानते हैं।

शिव जी के विवाह की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस कहानी की शुरुआत तब से हुई, जब भगवान शिव जी की पहली पत्नी माता सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में आत्मदाह किया। दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया था, जिसे सती सहन नहीं कर पाईं। सती के इस बलिदान ने शिव जी को गहरे दुख में डुबो दिया। वे संसार से विरक्त होकर कैलाश पर्वत पर तप में लीन हो गए। शिव और शक्ति का मिलन ही विश्व की ऊर्जा का आधार है, ऐसे में भगवान शिव के इस वैराग्य अवस्था ने सृष्टि के संतुलन को प्रभावित किया।

देवताओं की चिंता का हुआ निवारण

सृष्टि के संतुलन के प्रभावित होने पर जब देवताओं को जब यह चिंता सताने लगी, तब माता आदिशक्ति ने हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। पार्वती के हृदय में बचपन से ही शिव जी बसे हुए थे। उनकी माता मैना और पिता हिमालय ने भी उनकी भक्ति को देखकर उन्हें शिव जी की आराधना के लिए उनका मनोबल बढ़ाया, जिसके बाद पार्वती ने शिव जी को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप शुरू कर दिया।
 

पार्वती की भक्ति से प्रसन्न हुए शिव जी

पार्वती की तपस्या और भक्ति इतनी प्रबल थी कि उन्होंने वर्षों तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए कठिन मौसम और प्रकृति की चुनौतियों का सामना किया और शिव जी को पाने के लिए तप करती रहीं। आखिरकार उनकी भक्ति ने शिव जी को प्रभावित किया और अंततः शिव जी ने पार्वती की भक्ति और समर्पण को स्वीकार किया और उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाने का निर्णय लिया।

शिव जी मे माता पार्वती से शादी करने से पहले उनकी परीक्षा भी ली थी। शिव जी ने पार्वती की भक्ति का परीक्षण करने के लिए कई रूप धरे। एक बार उन्होंने साधु का वेश धारण कर पार्वती से कहा कि शिव तो एक सन्यासी हैं, जो श्मशान में रहते हैं और सर्पों को गले में धारण करते हैं। ऐसे में पार्वती का उनके साथ विवाह करना उचित नहीं होगा, लेकिन माता पार्वती अपने फैसले अडिग रहीं और बोलीं कि मैं शिव को उनके गुणों और शक्ति के लिए चाहती हूं, उनके बाहरी रूप के लिए नहीं। पार्वती माता यह उत्तर सुन शिव जी प्रसन्न हो गए। फिर देवताओं और हिमालय ने इस विवाह के लिए भव्य तैयारियां शुरू कीं। 

शिव जी और माता पार्वती का विवाह

शिव जी और माता पार्वती का विवाह एक अलौकिक दृश्य था। शिव अपनी बारात लेकर हिमालय पहुंचे, जिसमें भूत, प्रेत, गण और अन्य अनुयायी शामिल थे। शिव का यह विचित्र रूप देखकर हिमालय और मैना स्तब्ध रह गए, लेकिन पार्वती की अटूट श्रद्धा ने सभी को आश्वस्त किया। पौराणिक कथा के अनुसार, विवाह के दौरान शिव जी ने अपने सुंदर रूप में दर्शन दिए, जिससे सभी मंत्रमुग्ध हो गए। विवाह समारोह में वैदिक मंत्रों का गान हुआ और शिव-पार्वती ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई। यह मिलन केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि पुरुष और प्रकृति, शिव और शक्ति का संयोग था। इस विवाह ने सृष्टि में संतुलन और सामंजस्य स्थापित किया।

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