facebook pixel
विज्ञापन
Home  dharm  saint stories  swami gyananand ji maharaj told when and who started sanatan

Swami Gyananand Ji Maharaj: सनातन कब और किसने किया शुरू? स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने बताया रहस्य

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Sanatan Truth: सनातन का अर्थ केवल किसी धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक अर्थ है- शाश्वत, निरंतर रहने वाला और जिसका कोई निश्चित आरंभ या अंत नहीं है। 

Swami Gyananand Ji Maharaj
Sanatan Dharma History: जब हम दुनिया के अलग-अलग धर्मों, विचारधाराओं को देखते हैं, तो सामान्यतः उनके साथ दो महत्वपूर्ण बातें जुड़ी दिखाई देती हैं। पहली बात होती है कि उनकी शुरुआत कब हुई और दूसरी यह कि उन्हें किसने शुरू किया। किसी धर्म या विचारधारा के इतिहास में एक निश्चित समय, काल या घटना का उल्लेख मिलता है। साथ ही उसके संस्थापक या प्रवर्तक का नाम भी बताया जाता है, लेकिन जब बात सनातन धर्म की आती है, तो स्थिति बिल्कुल अलग दिखाई देती है।

स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज कहते हैं कि सनातन को किसी एक तारीख या वर्ष से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है। इसका कारण यह है कि सनातन का अर्थ ही है जो सदा से है और सदा रहने वाला है। जब हम पूछते हैं कि सनातन कब शुरू हुआ, तो इसका सरल उत्तर है कि इसकी शुरुआत सृष्टि के प्रारंभ के साथ हुई। जिस समय यह सृष्टि अस्तित्व में आई, उसी समय से जीवन, प्रकृति, कर्म और सत्य से जुड़े वे शाश्वत सिद्धांत भी विद्यमान रहे, जिन्हें सनातन कहा जाता है। इसलिए इसकी कोई अलग से शुरुआत की तारीख बताना संभव नहीं है।

सनातन को किसने शुरू किया?

दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न है कि सनातन को किस व्यक्ति ने शुरू किया? स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज इस प्रश्न का उत्तर भी बहुत सरल तरीके से समझाते हैं। जिस सत्ता ने इस सृष्टि की रचना की, सनातन भी उसी से जुड़ा हुआ है। अर्थात् सनातन किसी एक व्यक्ति द्वारा बनाया या स्थापित किया गया धर्म नहीं है। सनातन की अवधारणा उस परम सत्ता, प्रकृति और सृष्टि के शाश्वत नियमों से जुड़ी है, जो सृष्टि के साथ ही मौजूद माने जाते हैं। इसी कारण इसके किसी एक संस्थापक का नाम नहीं मिलता।

सनातन का वास्तविक अर्थ

सनातन का अर्थ केवल किसी धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक अर्थ है- शाश्वत, निरंतर रहने वाला और जिसका कोई निश्चित आरंभ या अंत नहीं है। सत्य, धर्म, कर्म और जीवन के मूल सिद्धांतों को इसी दृष्टि से समझा जाता है। इस प्रकार स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज के विचारों का सार यह है कि सनातन की शुरुआत किसी विशेष तारीख, वर्ष या व्यक्ति से नहीं हुई। जब सृष्टि का प्रारंभ हुआ, उसी के साथ सनातन का भी अस्तित्व माना गया। और जिस परम सत्ता से यह सृष्टि उत्पन्न हुई, सनातन भी उसी से संबंधित है। इसलिए सनातन को किसी एक व्यक्ति द्वारा शुरू किया गया धर्म मानने के बजाय एक शाश्वत जीवन-दृष्टि के रूप में समझना अधिक उचित है।

ये भी पढ़ें -  रोजाना शिव मंदिर जाने से क्या फल मिलता है? पंडित प्रदीप मिश्रा जी महाराज ने बताया

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel