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Sadhvi Ritambhara Didi: ऐसी मृत्यु बन जाती है महोत्सव? जानें साध्वी ऋतम्भरा दीदी ने क्या बताया

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Supreme Life: मनुष्य अपने परिवार या जिम्मेदारियों से प्रेम करना छोड़ दे। इसका अर्थ है कि वह संसार में रहते हुए भी यह समझे कि संसार की कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है। 
 

Sadhvi Ritambhara Didi
Spiritual Life: साध्वी ऋतम्भरा दीदी अपने प्रवचनों में कहती हैं कि जीवन को केवल सुंदर तरीके से जीना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जीवन ऐसा होना चाहिए कि उसकी अंतिम यात्रा भी सुंदर और शांत हो जाए। भारतीय संस्कृति ने जीवन के साथ-साथ मृत्यु को भी एक विशेष गरिमा और सुंदरता प्रदान करने का प्रयास किया है। हमारे यहां मृत्यु को केवल जीवन का अंत नहीं माना गया, बल्कि उसे एक यात्रा का अगला पड़ाव समझा गया है।

साध्वी ऋतम्भरा दीदी मृत्यु के स्वरूप को समझाते हुए कहती हैं कि शरीर की मृत्यु ऐसी होनी चाहिए, जैसे सांप अपनी केंचुली छोड़ देता है। सांप जब पुरानी केंचुली छोड़ता है तो उसका जीवन समाप्त नहीं होता, बल्कि वह एक नई अवस्था में आगे बढ़ता है। उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने शरीर के प्रति इतना आसक्त नहीं होना चाहिए कि शरीर छूटते समय उसे अत्यधिक पीड़ा और मोह का अनुभव हो।

मृत्यु के समय शरीर जर-जर हो चुका होता है। यदि जीवन को सही ढंग से जिया गया हो और व्यक्ति ने अपने वास्तविक स्वरूप को समझ लिया हो, तो शरीर का छूटना सहज हो जाता है। यह ऐसा लगता है जैसे पुराना वस्त्र उतारकर कोई व्यक्ति आगे बढ़ गया हो।

पके हुए नारियल का उदाहरण

साध्वी जी इस बात को समझाने के लिए पके और कच्चे नारियल का उदाहरण देती हैं। जब नारियल पूरी तरह पक जाता है तो उसकी गिरी अपने आप खोल से अलग हो जाती है। खोल को हिलाने पर भीतर की गिरी अलग महसूस होती है। इसके विपरीत कच्चे नारियल में गिरी खोल से मजबूती से जुड़ी रहती है। उसे अलग करने के लिए चाकू से बहुत प्रयास करना पड़ता है, फिर भी कुछ हिस्सा खोल से चिपका रह जाता है। मनुष्य का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। जब व्यक्ति संसार, शरीर, धन और रिश्तों के प्रति अत्यधिक आसक्त रहता है, तो मृत्यु के समय उसका मोह उसे भीतर से बांधे रखता है, लेकिन जब जीवन में निरासक्ति आती है, तब शरीर से संबंध धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगता है।

निरासक्त जीवन की शक्ति

निरासक्ति का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य अपने परिवार या जिम्मेदारियों से प्रेम करना छोड़ दे। इसका अर्थ है कि वह संसार में रहते हुए भी यह समझे कि संसार की कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है। धन, शरीर, पद और सुख-सुविधाएं सब समय के साथ बदल जाती हैं। इसलिए जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक उपलब्धियां प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। जब मनुष्य परम जीवन और परम धन को समझ लेता है, तब उसकी दृष्टि बदल जाती है। उसे यह अनुभव होने लगता है कि वास्तविक संपत्ति बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और ईश्वर के प्रति जुड़ाव में है।

मृत्यु नहीं, एक सुंदर विदाई

इस दृष्टि से मृत्यु भय का विषय नहीं रह जाती। वह जीवन की एक स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाती है। जिस व्यक्ति ने जीवन को प्रेम, सत्य, संतोष और निरासक्ति के साथ जिया हो, उसके लिए मृत्यु एक सुंदर विदाई की तरह हो सकती है। साध्वी ऋतम्भरा दीदी का संदेश यही है कि हमें मृत्यु के समय की तैयारी मृत्यु के दिन से नहीं, बल्कि जीवन के हर दिन से करनी चाहिए। यदि हमारा जीवन भीतर से शांत, संतुलित और निरासक्त होगा, तो शरीर का अंतिम क्षण भी सहज हो सकता है। तब मृत्यु केवल अंत नहीं, बल्कि एक नई यात्रा का आरंभ बन जाती है और जीवन की अंतिम विदाई भी एक महोत्सव जैसी अनुभूति दे सकती है।

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