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Swami Avdheshanand Giri Ji Maharaj: ज्ञानी और भक्त किस भाव में रहते हैं हरपल? स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Spiritual Knowledge: अक्सर मनुष्य संसार को केवल दुख का स्थान मान लेता है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि यह बताती है कि दुख का अनुभव हमारी सीमित दृष्टि से जुड़ा है। 
 

Swami Avdheshanand Giri Ji Maharaj
Gyani or Bhakt Importance: स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज बताते हैं कि ज्ञानी और भक्त दोनों की अंतिम स्थिति परमात्मा में ही होती है, लेकिन उनके अनुभव और भाव की अभिव्यक्ति अलग-अलग दिखाई देती है। ज्ञानी संसार को ब्रह्मस्वरूप देखता है और भक्त संसार के प्रत्येक जीव तथा वस्तु में भगवान की उपस्थिति का अनुभव करता है। ज्ञानी कहता है कि “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”, अर्थात यह संपूर्ण जगत ब्रह्म ही है। वहीं भक्त के भाव को गोस्वामी तुलसीदास जी की पंक्ति में समझा जा सकता है “सियाराममय सब जग जानी”, अर्थात उसे पूरा संसार सीता-राम से भरा हुआ दिखाई देता है।

हम सामान्य मनुष्य समय को अपने जीवन की सीमाओं में समझते हैं, लेकिन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में समय की कल्पना अत्यंत विराट है। ब्रह्मा के एक दिन की अवधि में एक हजार चतुर्युग माने गए हैं। इस विराट काल की कल्पना करने पर समझ आता है कि सृष्टि में कितने परिवर्तन, कितनी लीलाएं और कितने युग आते-जाते होंगे। शास्त्रों में निमिष, त्रुटि आदि अत्यंत सूक्ष्म समय-इकाइयों का भी वर्णन मिलता है। इससे यह संकेत मिलता है कि हमारा सामान्य समय-बोध ब्रह्मांडीय काल की विशालता के सामने कितना छोटा है।

काल से परे है ज्ञानी

ज्ञानी व्यक्ति काल और स्वभाव की सीमाओं से ऊपर उठने का प्रयास करता है। वह केवल बदलती हुई घटनाओं को सत्य नहीं मानता, बल्कि उस शाश्वत तत्व को पहचानता है जो समय के परिवर्तन से प्रभावित नहीं होता। जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को परमात्मा से जुड़ा हुआ अनुभव करता है, तब उसके लिए भूत, भविष्य और वर्तमान की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।

भक्त का भगवान में निवास

भक्त का मार्ग प्रेम और समर्पण का मार्ग है। भक्त भगवान को केवल किसी दूर स्थित सत्ता के रूप में नहीं देखता, बल्कि अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में उनका अनुभव करता है। उसके लिए संसार भगवान की लीला बन जाता है। इसलिए भक्त के भीतर शिकायत कम और समर्पण अधिक होता है। वह सुख-दुख दोनों को भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार करने का प्रयास करता है।

दुख से आनंद की ओर

अक्सर मनुष्य संसार को केवल दुख का स्थान मान लेता है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि यह बताती है कि दुख का अनुभव हमारी सीमित दृष्टि से जुड़ा है। जब दृष्टि बदलती है और मनुष्य परमात्मा की ओर मुड़ता है, तब उसी जीवन में आनंद का अनुभव होने लगता है। संसार में परिस्थितियां बदलती रहेंगी, लेकिन परमात्मा में स्थित व्यक्ति का आंतरिक आधार स्थिर रह सकता है। अंततः ज्ञानी कहता है कि सब कुछ ब्रह्म है और भक्त अनुभव करता है कि सब कुछ भगवान से भरा हुआ है। मार्ग अलग दिखाई दे सकते हैं, लेकिन दोनों की मंजिल एक ही है परमात्मा में स्थित होना, जहां समय की सीमाएं समाप्त होती हैं और शाश्वत आनंद का अनुभव होता है।

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