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Swami Govind Dev Giri Ji: सनातन संस्कृति का क्या है 'मास्टर मैनेजमेंट'? स्वामी गोविंद देव गिरि जी ने बताया

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Sanatan Culture: सनातन संस्कृति की एक और विशेषता यह है कि उसने आध्यात्मिक उन्नति के लिए सभी लोगों के लिए एक ही मार्ग अनिवार्य नहीं किया। व्यक्ति की रुचि और स्वभाव के अनुसार ज्ञान, कर्म, भक्ति और योग के मार्ग बताए गए।

Swami Govind Dev Giri Ji Maharaj
Vedic Culture: स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज कहते हैं कि सनातन संस्कृति केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक परंपराओं का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवन को व्यवस्थित और संतुलित ढंग से जीने की एक संपूर्ण व्यवस्था है। हमारी संस्कृति ने मनुष्य के जीवन, समाज और उसके लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए ऐसी व्यवस्था बनाई है, जिसे एक प्रकार का ‘मास्टर मैनेजमेंट’ कहा जा सकता है।

सनातन संस्कृति में मनुष्य के जीवन के चार पुरुषार्थ बताए गए हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन्हें जीवन के चार प्रमुख लक्ष्य माना गया है। धर्म हमें सही आचरण और कर्तव्य का मार्ग दिखाता है। अर्थ के माध्यम से जीवन की आवश्यकताओं और जिम्मेदारियों को पूरा किया जाता है। काम का अर्थ है जीवन की उचित इच्छाओं और सुखों की पूर्ति, जबकि मोक्ष जीवन का अंतिम आध्यात्मिक लक्ष्य माना गया है। इस प्रकार हमारी ऋषि परंपरा ने हजारों वर्ष पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि मनुष्य को जीवन में क्या प्राप्त करना चाहिए।

समय का सही विभाजन

इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए जीवन के समय का उचित विभाजन भी आवश्यक है। इसी उद्देश्य से सनातन संस्कृति में चार आश्रमों की व्यवस्था की गई—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। ब्रह्मचर्य आश्रम में शिक्षा और चरित्र निर्माण पर ध्यान दिया जाता है। गृहस्थ आश्रम में परिवार, समाज और आर्थिक जिम्मेदारियों का निर्वाह किया जाता है। वानप्रस्थ में व्यक्ति धीरे-धीरे सांसारिक मोह से दूर होकर समाज और अध्यात्म की ओर बढ़ता है। संन्यास जीवन को पूर्ण रूप से आत्मिक साधना के लिए समर्पित करने की अवस्था है।

समाज की व्यवस्थित संरचना

सनातन संस्कृति ने केवल व्यक्ति के जीवन को ही व्यवस्थित नहीं किया, बल्कि पूरे समाज के सुचारु संचालन की व्यवस्था भी बताई। इसके लिए चार वर्णों की अवधारणा दी गई- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। मूल रूप से यह व्यवस्था व्यक्ति के गुण, कर्म और सामाजिक जिम्मेदारियों से जुड़ी थी। इसका उद्देश्य समाज के अलग-अलग कार्यों को उचित ढंग से संचालित करना था।

अपनी रुचि के अनुसार साधना का मार्ग

सनातन संस्कृति की एक और विशेषता यह है कि उसने आध्यात्मिक उन्नति के लिए सभी लोगों के लिए एक ही मार्ग अनिवार्य नहीं किया। व्यक्ति की रुचि और स्वभाव के अनुसार ज्ञान, कर्म, भक्ति और योग के मार्ग बताए गए। कोई ज्ञान के माध्यम से सत्य को समझ सकता है, कोई कर्म के द्वारा अपने कर्तव्यों को साधना बना सकता है, कोई भक्ति के माध्यम से ईश्वर से जुड़ सकता है और कोई योग के द्वारा मन तथा चेतना को अनुशासित कर सकता है।

जीवन को संतुलित बनाने की संस्कृति

इस प्रकार चार पुरुषार्थ जीवन के लक्ष्य बताते हैं, चार आश्रम समय और जीवन की अवस्थाओं को व्यवस्थित करते हैं, चार वर्ण सामाजिक जिम्मेदारियों को दिशा देते हैं और ज्ञान, कर्म, भक्ति तथा योग व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा के मार्ग बनते हैं। यही समग्र व्यवस्था सनातन संस्कृति को जीवन प्रबंधन की एक अद्भुत परंपरा बनाती है। स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज के शब्दों में, ऐसी व्यापक और संतुलित व्यवस्था संसार में कहीं और देखने को मिलना कठिन है।

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