Heramba Sankashti Chaturthi: धार्मिक ग्रंथों में भगवान गणेश के कई स्वरूपों का वर्णन मिलता है। हेरंब गणपति उन्हीं विशिष्ट स्वरूपों में से एक हैं। हेरंब गणपति की पांच मुख वाली प्रतिमा का वर्णन मिलता है।
Heramba Sankashti Chaturthi: हिंदू धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य देवता माना गया है। गणेश जी की उपासना के लिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष महत्व रखता है। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है, लेकिन जब यह व्रत हेरंब गणपति के स्वरूप से जुड़ता है तो इसका धार्मिक महत्व और भी विशेष माना जाता है। हेरंब संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश के हेरंब स्वरूप की पूजा की जाती है और उनसे जीवन के संकट दूर करने की प्रार्थना की जाती है।
पुराणों और गणेश उपासना से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में भगवान गणेश के अनेक स्वरूपों का वर्णन मिलता है। इन्हीं में हेरंब गणपति का स्वरूप भी विशेष माना गया है। हेरंब गणपति को भगवान गणेश का ऐसा रूप माना जाता है, जो भक्तों की रक्षा करने वाले और भय तथा संकट से मुक्ति देने वाले हैं। हेरंब संकष्टी चतुर्थी की कथा भी भगवान गणेश की इसी शक्ति और उनके भक्तों पर कृपा से जुड़ी हुई है।
हेरंब गणपति कौन हैं?
धार्मिक ग्रंथों में भगवान गणेश के कई स्वरूपों का वर्णन मिलता है। हेरंब गणपति उन्हीं विशिष्ट स्वरूपों में से एक हैं। हेरंब गणपति की पांच मुख वाली प्रतिमा का वर्णन मिलता है। उनके पांच मुख भगवान गणेश की विभिन्न शक्तियों का प्रतीक माने जाते हैं। इस स्वरूप में भगवान गणेश को दस भुजाओं वाला भी बताया गया है।
हेरंब गणपति का वाहन सिंह माना गया है। सामान्य रूप से भगवान गणेश का वाहन मूषक है, लेकिन हेरंब स्वरूप में उनका सिंह पर विराजमान होना इस रूप की विशेष पहचान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सिंह पर सवार हेरंब गणपति अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें भय, संकट तथा बाधाओं से बचाते हैं। 'हेरंब' नाम का धार्मिक अर्थ भी भगवान गणेश के इसी रक्षक स्वरूप से जुड़ा हुआ माना जाता है। गणेश उपासना की परंपरा में हेरंब गणपति को विशेष रूप से ऐसे देवस्वरूप के तौर पर पूजा जाता है, जो निर्बल और भयभीत भक्तों को संरक्षण प्रदान करते हैं।
क्यों मनाई जाती है हेरंब संकष्टी चतुर्थी?
संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित व्रत है। 'संकष्टी' का अर्थ संकट से मुक्ति से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से गणेश जी की पूजा और व्रत करने से भक्तों के जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। हेरंब संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश के हेरंब स्वरूप का पूजन किए जाने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान गणेश स्वयं विघ्नों का नाश करने वाले देवता हैं। इसलिए संकष्टी चतुर्थी के दिन उनके विशेष स्वरूप की पूजा करने से संकटों से रक्षा की कामना की जाती है। इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु दिनभर भगवान गणेश का स्मरण करते हैं और चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर गणेश जी की पूजा करते हैं।
हेरंब संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक समय देवताओं और ऋषियों के सामने अनेक प्रकार के संकट उत्पन्न होने लगे। दुष्ट शक्तियों के बढ़ते प्रभाव के कारण देवता भी चिंतित हो गए। जब किसी भी उपाय से संकट दूर नहीं हुआ तो देवताओं ने भगवान गणेश की आराधना की। सभी देवताओं ने विघ्नहर्ता गणेश से प्रार्थना की कि वे इस संकट का निवारण करें और उनकी रक्षा करें।
देवताओं की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने एक विशेष स्वरूप धारण किया। इस स्वरूप में उनके पांच मुख थे और वे सिंह पर सवार होकर प्रकट हुए। उनके हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र और आयुध थे। भगवान गणेश के इस दिव्य स्वरूप को हेरंब गणपति कहा गया। कथा के अनुसार हेरंब गणपति के प्रकट होते ही दुष्ट शक्तियां भयभीत हो गईं।
भगवान गणेश ने अपने दिव्य तेज और शक्ति से उन बाधाओं का नाश किया, जिनके कारण देवता और ऋषि परेशान थे। संकट दूर होने के बाद देवताओं ने हेरंब गणपति की स्तुति की और उनकी पूजा की। मान्यता है कि भगवान गणेश का यह स्वरूप अपने भक्तों को भय से मुक्त करने और संकटों से उनकी रक्षा करने वाला है। इसी कारण हेरंब गणपति की उपासना को संकष्टी चतुर्थी के व्रत से जोड़ा गया और इस दिन उनके विशेष स्वरूप की पूजा की जाने लगी।
एक अन्य धार्मिक मान्यता में हेरंब गणपति को माता पार्वती की विशेष कृपा से जुड़ा हुआ माना जाता है। भगवान गणेश को माता पार्वती और भगवान शिव का पुत्र माना गया है। हेरंब स्वरूप में उनका मातृ-स्नेह और रक्षक रूप विशेष रूप से प्रकट होता है। इसी वजह से इस स्वरूप की उपासना में भगवान गणेश को संकट में फंसे भक्तों का सहारा देने वाला देवता माना जाता है।
हेरंब गणपति के पांच मुख का क्या महत्व है?
हेरंब गणपति की सबसे खास पहचान उनके पांच मुख हैं। धार्मिक परंपरा में पांच मुखों को भगवान गणेश की पांच शक्तियों से जोड़कर देखा जाता है। इनके माध्यम से भगवान के अलग-अलग दिव्य स्वरूपों की कल्पना की जाती है। हेरंब गणपति का पांच मुख वाला स्वरूप भगवान गणेश की व्यापक शक्ति और सर्वदिशाओं में रक्षा करने की क्षमता का प्रतीक माना जाता है। उनके सिंह वाहन को भी शक्ति और निर्भयता से जोड़ा जाता है। इसलिए हेरंब गणपति की प्रतिमा सामान्य गणेश स्वरूप से अलग दिखाई देती है।
हेरंब गणपति की पूजा का धार्मिक महत्व
हेरंब संकष्टी चतुर्थी पर श्रद्धालु भगवान गणेश की पूजा करते समय उनके हेरंब स्वरूप का ध्यान करते हैं। पूजा में गणेश जी को दूर्वा, मोदक, फल और लाल पुष्प अर्पित करने की परंपरा है। इसके बाद गणेश मंत्रों और गणेश स्तुति का पाठ किया जाता है। संकष्टी चतुर्थी के व्रत में चंद्रमा की पूजा का भी विशेष महत्व है। मान्यता के अनुसार चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इसके बाद व्रत का पारण किया जाता है।
हेरंब संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा करते समय भक्त उनसे अपने जीवन के संकट और बाधाएं दूर करने की प्रार्थना करते हैं। धार्मिक मान्यता में हेरंब गणपति का स्वरूप विशेष रूप से रक्षक और संकटमोचक माना गया है। इसलिए इस दिन उनकी कथा सुनने और पूजा करने की परंपरा को महत्वपूर्ण माना जाता है।
हेरंब संकष्टी चतुर्थी पर कथा सुनने की परंपरा
संकष्टी चतुर्थी के व्रत में भगवान गणेश की कथा सुनना या पढ़ना पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। हेरंब संकष्टी चतुर्थी पर हेरंब गणपति के स्वरूप और उनकी पौराणिक कथा का पाठ किया जाता है। कथा के दौरान भगवान गणेश के रक्षक स्वरूप का स्मरण किया जाता है और पूजा के अंत में आरती की जाती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार गणेश जी की पूजा में सबसे पहले उनका आवाहन किया जाता है, क्योंकि हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश के पूजन से करने की परंपरा है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत भी इसी गणेश आराधना की परंपरा से जुड़ा हुआ है। हेरंब संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश के पांच मुख वाले हेरंब स्वरूप की कथा का श्रवण विशेष रूप से किया जाता है।
हेरंब संकष्टी चतुर्थी इस प्रकार भगवान गणेश के उस दिव्य स्वरूप की आराधना का पर्व है, जिसमें वे सिंह पर सवार होकर अपने भक्तों की रक्षा करने वाले देवता के रूप में पूजे जाते हैं। पांच मुख और दस भुजाओं वाले हेरंब गणपति का स्वरूप गणेश उपासना में विशिष्ट स्थान रखता है और संकष्टी चतुर्थी के दिन उनकी पूजा संकटों से मुक्ति की धार्मिक मान्यता से जुड़ी हुई है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)