Lord Parashurama: परशुराम ने अपने दिव्य फरसे और अन्य अस्त्रों के साथ कार्तवीर्य अर्जुन पर आक्रमण किया। उन्होंने पहले राजा का वध किया और फिर पूरे क्षत्रिय वंश का संहार आरंभ किया।
Lord Parashurama Story: सनातन धर्म की पौराणिक कथाओं में भगवान विष्णु के दस अवतारों में छठे स्थान पर विराजमान भगवान परशुराम का नाम विशेष रूप से उनकी अद्वितीय शक्ति और दिव्य आयुध के कारण लिया जाता है। उनका पूरा नाम परशुराम इसलिए पड़ा, क्योंकि उनके हाथ में सदैव एक दिव्य फरसा (परशु) शोभायमान रहता था। यह फरसा कोई साधारण अस्त्र नहीं था, बल्कि भगवान शिव द्वारा प्रदान किया गया वह शक्तिशाली आयुध था, जो समस्त अन्य शस्त्रों पर विजय पाने वाला था। ब्रह्मांड पुराण, महाभारत तथा अन्य पुराण ग्रंथों में वर्णित इस पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान परशुराम को यह फरसा घोर तपस्या के फलस्वरूप प्राप्त हुआ।
कौन थे भगवान परशुराम
भगवान परशुराम का जन्म भृगुवंशीय महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ था। वे विष्णु भगवान के अवतार थे, जिनका उद्देश्य पृथ्वी पर बढ़ते अधर्म और क्षत्रियों के अत्याचार को नियंत्रित करना था। जन्म के समय ही उनका नाम राम रखा गया। पिता जमदग्नि से उन्होंने वेद-शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया तथा ब्राह्मण होने के नाते शांतिप्रिय जीवन जीने की शिक्षा ली। किंतु समय के साथ क्षत्रिय राजाओं के अत्याचार बढ़ते गए। एक दिन महर्षि जमदग्नि ने राजा कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) का अतिथि सत्कार किया। राजा ने उनके आश्रम की कामधेनु गाय देखी और लोभवश उसे ले जाना चाहा। जब जमदग्नि ने विरोध किया तो क्रोध में आकर कार्तवीर्य ने महर्षि का वध कर दिया।
भगवान परशुराम की तपस्या
इस घटना से पूरा परिवार शोकाकुल हो गया। माता रेणुका ने वक्ष पर 21 बार हाथ मारकर विलाप किया। यह देखकर युवा राम क्रोध से भर उठे। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियों से शून्य कर देंगे। किंतु ब्राह्मण होने के कारण उनके पास युद्ध कला और दिव्य अस्त्र-शस्त्र नहीं थे। उन्होंने निश्चय किया कि केवल भगवान शिव की कृपा से ही यह कार्य संभव है। अतः वे हिमालय पर्वत श्रृंखला के गंधमादन पर्वत पर चले गए और वहां घोर तपस्या आरंभ की।
तपस्या का स्वरूप अत्यंत कठोर था। ब्रह्मांड पुराण के अनुसार, राम ने वहां एक कुटी बनाई और भगवान शिव की मूर्ति की स्थापना की। उन्होंने शिवजी को शिकारी (व्याध) के रूप में प्रतिमा बनाकर पूजा की। प्रतिदिन धूप, पुष्प, नैवेद्य तथा स्तुतियों से शिव की आराधना की। वर्षों तक वे केवल फल-फूल पर निर्वाह करते रहे। कभी-कभी जल भी नहीं पीते। उनकी तपस्या इतनी तीव्र थी कि देवताओं के भी हृदय कांप उठे। आकाश में दिव्य ज्योति चमकने लगी।
तपस्या के प्रभाव से राम शिव लोक पहुंचने में सक्षम हो गए। वहां शिव के द्वारपालों ने उन्हें रोका, किंतु राम ने विनम्रतापूर्वक अपनी इच्छा बताई। द्वारपालों ने शिवजी से अनुमति ली और राम को अंदर भेजा। शिवजी सभा में विराजमान थे। उनके साथ कार्तिकेय, गणेश, नंदीश्वर, महाकाल, वीरभद्र और दुर्गा माता उनकी गोद में विराजमान थीं। राम ने शिव जी को देखते ही प्रणाम किया और हृदय से स्तुति की। वे बोले, “हे ईशान, हे उग्र, समस्त लोकों के स्वामी, आप वाणी और मन से परे हैं, आप ही ब्रह्मांड का रूप हैं।” उनकी स्तुति सुनकर शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने राम को उठाया, उनके सिर पर हाथ रखा और आशीर्वाद दिया।
शिवजी का वरदान
शिव जी ने राम से पूछा, “वत्स, तुम्हारी इच्छा क्या है?” राम ने अपनी कथा सुनाई– पिता के वध की बात, माता का शोक और अपनी प्रतिज्ञा। दुर्गा माता ने मुस्कुराते हुए कहा कि कार्तवीर्य अर्जुन के सहस्र भुजाएं हैं, वह रावण को भी जीत चुका है, अतः केवल शिव जी की कृपा से ही यह संभव है। शिव जी ने कुछ क्षण विचार किया और फिर राम से कहा, “आज से तुम मेरे लिए स्कंद के समान हो। मैं तुम्हें दिव्य कवच और मंत्र प्रदान करूंगा। इसकी कृपा से तुम कार्तवीर्य का वध करोगे और पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियरहित करोगे।”
परशुराम को मिले दिव्य अस्त्र
इसके बाद शिव ने राम को अनेक दिव्य अस्त्र प्रदान किए। इनमें त्रैलोक्यविजय नामक अद्भुत कवच, नागपाश, पाशुपतास्त्र, ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र, आग्नेयास्त्र, वायव्यास्त्र, वारुणास्त्र, गंधर्वास्त्र, गरुड़ास्त्र, जृंभणास्त्र, गदा, शक्ति, त्रिशूल, दंड और सबसे महत्वपूर्ण- परशु (फरसा) शामिल था। यह फरसा शिवजी का अपना दिव्य आयुध था, जिसका नाम विद्युदभि था। यह इतना शक्तिशाली था कि समस्त अन्य शस्त्रों को पराजित कर सकता था। शिव ने स्वयं राम को इन अस्त्रों का प्रयोग, संहार और पुनः आह्वान करने का मंत्र सिखाया। साथ ही उन्होंने राम को एक दिव्य रथ प्रदान किया जिसमें श्वेत अश्व जुड़े थे तथा विजय नामक धनुष और अक्षय बाणों से भरे दो तरकश दिए।
परशुराम को ये अस्त्र मिलते ही उनका तेज बढ़ गया। उन्होंने शिव, दुर्गा, कार्तिकेय और गणेश की परिक्रमा की तथा पुष्कर तीर्थ जाकर मंत्रों का अभ्यास किया। अब वे पूर्ण रूप से युद्ध कला में निपुण हो चुके थे। कुछ कथाओं में यह भी वर्णित है कि शिव ने राम की परीक्षा लेने के लिए उनसे द्वंद्व युद्ध किया। राम ने पहले बाण चलाए जो शिव ने त्रिशूल से काट दिए। अंत में क्रोध में राम ने अपने नए प्राप्त फरसे से प्रहार किया। शिवजी ने उस प्रहार को सहन किया, क्योंकि वे अपने दिए अस्त्र का सम्मान रखना चाहते थे। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने राम को और भी आशीर्वाद दिया। इस प्रकार फरसा यानी परशु प्राप्त करने के बाद राम का नाम परशुराम हो गया।
कार्तवीर्य अर्जुन का वध
परशुराम ने अपने दिव्य फरसे और अन्य अस्त्रों के साथ कार्तवीर्य अर्जुन पर आक्रमण किया। उन्होंने पहले राजा का वध किया और फिर पूरे क्षत्रिय वंश का संहार आरंभ किया। उन्होंने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियरहित किया। प्रत्येक बार क्षत्रियों की रक्त की पांच सरोवर बन गए। अंत में उन्होंने अपना रक्तरंजित फरसा समुद्र में फेंक दिया, जिससे समुद्र पीछे हट गया और नए भू-भाग का निर्माण हुआ, जिसे केरल कहा जाता है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)