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Durga Kund Temple: दुर्गा कुंड मंदिर का क्या है रोचक इतिहास? जानें दर्शन और यात्रा की पूरी गाइड

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Durga Kund Temple History: दुर्गा कुंड मंदिर का इतिहास युगों पुराना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह स्थल आदि काल से मां दुर्गा से जुड़ा हुआ है। देवी भागवत पुराण में वर्णित कथा के मुताबिक अयोध्या नरेश धीरवसंधि की पुत्री का स्वयंवर आयोजित हुआ था।

 Durga Kund Temple History:
 Durga Kund Temple History: वाराणसी की पावन भूमि पर स्थित दुर्गा कुंड मंदिर मां दुर्गा की आराधना का प्रमुख केंद्र है। यहां मां दुर्गा स्वयंभू रूप में विराजमान हैं और काशी की दक्षिण दिशा से रक्षा करती हुई भक्तों को शक्ति, साहस तथा कष्ट निवारण का वरदान देती हैं। यह मंदिर न केवल वाराणसी के तीन प्राचीनतम मंदिरों में से एक है बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक भी है, जहां नवमी पर विशेष पूजा-अर्चना होती है। इस मंदिर की यात्रा हर भक्त के जीवन में एक बार अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि यहां मां का दर्शन मात्र सारे संकटों को दूर कर देता है।

मंदिर का इतिहास

दुर्गा कुंड मंदिर का इतिहास युगों पुराना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह स्थल आदि काल से मां दुर्गा से जुड़ा हुआ है। देवी भागवत पुराण में वर्णित कथा के मुताबिक अयोध्या नरेश धीरवसंधि की पुत्री का स्वयंवर आयोजित हुआ था। स्वयंवर में अनेक राजकुमार आए, लेकिन एक राक्षस ने युद्ध छेड़ दिया। उस युद्ध में मां दुर्गा ने राक्षसों का संहार किया। रक्त से भरा यह कुंड उसी युद्ध का साक्षी है। माना जाता है कि मां दुर्गा ने शुंभ और निशुंभ जैसे दैत्यों का वध कर यहां विश्राम किया था।

आदिकाल में काशी में केवल तीन प्रमुख मंदिर थे- काशी विश्वनाथ, अन्नपूर्णा और दुर्गा कुंड मंदिर। काशी नरेश राजा सुबाहू ने इस मंदिर का प्राचीनतम निर्माण कराया था। मंदिर की वर्तमान भव्य संरचना 18वीं शताब्दी में बंगाल की महारानी भवानी द्वारा बनवाई गई। उन्होंने 1760 ईस्वी के आसपास इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। मंदिर नागर शैली में बना है, जिसमें बहु-मंजिला शिखर है।

मंदिर की मूर्ति स्वयंभू है, अर्थात् मानव हाथों से नहीं बनी बल्कि स्वयं प्रकट हुई है। यही कारण है कि यह मंदिर शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है। कुंड पहले गंगा से जुड़ा हुआ था, जो बाद में अलग हो गया। मंदिर के परिसर में लक्ष्मी, सरस्वती और काली की मूर्तियां भी स्थापित हैं। यह मंदिर बंदरों की संख्या के कारण 'मंकी टेम्पल' के नाम से भी प्रसिद्ध है। इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन काल में कई बार आक्रमणों से मंदिर क्षतिग्रस्त हुआ, लेकिन रानी भवानी ने इसे पुनः स्थापित कर भक्ति की परंपरा को जीवित रखा।

मंदिर की धार्मिक मान्यताएं और महत्व

दुर्गा कुंड मंदिर सनातन धर्म में मां दुर्गा की आदि शक्ति का प्रतीक है। भक्तों की मान्यता है कि यहां मां दुर्गा काशी की दक्षिण दिशा से रक्षा करती हैं। जो भक्त सच्चे मन से यहां दर्शन करता है, उसे शक्ति, बुद्धि और संकटमोचन का आशीर्वाद मिलता है। मंदिर को सिद्ध पीठ माना जाता है, जहां तांत्रिक साधना भी की जाती है।

कुंड का जल पवित्र है। पहले यह गंगा से जुड़ा होने के कारण गंगा जल के समान माना जाता था। श्रद्धालु कुंड में स्नान कर मां की पूजा करते हैं। नवदुर्गा के नौ रूपों की विशेष पूजा यहां होती है। दीपावली, नवरात्रि और दुर्गा अष्टमी पर भक्तों की भारी भीड़ लगती है। मंदिर में मंगला आरती, भोग और सायं आरती का विशेष महत्व है। भक्तों का विश्वास है कि मां दुर्गा यहां प्रचंड रूप में विराजमान हैं और हर भक्त की मनोकामना पूरी करती हैं। यह मंदिर वाराणसी के केदार खंड में स्थित होने के कारण शिव-शक्ति के संयोग का प्रतीक भी है।

स्थान और दिशा

दुर्गा कुंड मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में स्थित है। यह भारत के उत्तर भारत के पवित्र काशी क्षेत्र में है। मंदिर का पूरा पता है- दुर्गा कुंड रोड, जवाहर नगर कालोनी, भेलुपुर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश- 221005। यह अस्सी रोड से कुछ दूरी पर आनंद बाग के पास स्थित है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से मात्र 1.5 किलोमीटर और संकट मोचन मंदिर से 700 मीटर की दूरी पर है। यह काशी की दक्षिण दिशा में स्थित होकर समूची नगरी की रक्षा करता है।

यात्रा का विवरण

हवाई मार्ग से: निकटतम हवाई अड्डा लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट है, जो मंदिर से लगभग 25 किलोमीटर दूर है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, लखनऊ आदि शहरों से रोजाना फ्लाइटें उपलब्ध हैं। एयरपोर्ट से प्रीपेड टैक्सी, ओला-उबर या ऑटो से 45 मिनट में मंदिर पहुंचा जा सकता है। 

रेल मार्ग से: वाराणसी जंक्शन या वाराणसी कैंट मुख्य रेलवे स्टेशन हैं। कैंट स्टेशन से मंदिर की दूरी केवल 6 किलोमीटर है। दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई समेत पूरे भारत से ट्रेनें उपलब्ध हैं। स्टेशन से ऑटो, ई-रिक्शा या टैक्सी मात्र 20-30 मिनट में पहुंचा देती है। 

सड़क मार्ग से: वाराणसी उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की बसों से अच्छी तरह जुड़ा है। दिल्ली, लखनऊ, इलाहाबाद, पटना आदि शहरों से सीधी बसें आती हैं। शहर के अंदर लोकल बस, ई-रिक्शा या ऑटो से आसानी से पहुंचा जा सकता है। स्थानीय परिवहन में ऑटो, ई-रिक्शा और साइकिल रिक्शा सस्ते और उपलब्ध हैं।

ठहरने की व्यवस्था

मंदिर के आसपास ठहरने की अच्छी व्यवस्था है। भेलुपुर, बीएचयू लंका क्षेत्र और अस्सी घाट के पास कई विकल्प उपलब्ध हैं। 

धर्मशालाएं: वाराणसी में कई धर्मशालाएं सस्ती दरों पर कमरे देती हैं। मंदिर के निकट श्री कृष्ण धर्मशाला, पीजावरा मठ आदि में 500 रुपये से शुरू होकर साधारण कमरे मिल जाते हैं। इनमें भोजन की सुविधा भी होती है। 

बजट होटल: 1000-2500 रुपये प्रतिदिन में अच्छे बजट होटल उपलब्ध हैं, जिनमें एसी, वाई-फाई, अटैच्ड बाथरूम और 24 घंटे पानी की सुविधा है। लंका क्षेत्र में कई गेस्ट हाउस 800 रुपये से शुरू होते हैं। 

मीडियम और लग्जरी: 3000-8000 रुपये में 3-स्टार होटल और गेस्ट हाउस हैं। बीएचयू के पास या अस्सी घाट पर नदी का सुंदर नजारा देखते हुए ठहर सकते हैं। ऑनलाइन बुकिंग यात्रीधाम, मेकमायट्रिप आदि ऐप्स पर उपलब्ध है। 

भक्तों के लिए मंदिर परिसर के आसपास सस्ते भोजनालय भी हैं, जहां सात्विक भोजन मिलता है।

दर्शन समय

दुर्गा कुंड मंदिर पूरे वर्ष भक्तों के लिए खुला रहता है। 
ग्रीष्मकाल: सुबह 4:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक और दोपहर 3:00 बजे से रात 9:30 बजे तक। 
शीतकाल: सुबह 5:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक और दोपहर 4:00 बजे से रात 8:00 बजे तक। 

मंगला आरती सुबह 5:00 बजे, भोग आरती दोपहर 12:00 बजे और सायं आरती शाम 7:00 बजे होती है। रविवार को कभी-कभी थोड़ा समय बंद रह सकता है, इसलिए जाने से पहले स्थानीय जानकारी ले लें। दर्शन के समय भक्तों की भीड़ रहती है, इसलिए सुबह जल्दी पहुंचना उत्तम है। यह मंदिर काशी की आध्यात्मिक यात्रा का अभिन्न अंग है। भक्त यहां मां दुर्गा के चरणों में समर्पित होकर अपनी यात्रा को सार्थक बनाते हैं।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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