Parshuram Story: भगवान विष्णु ने परशुराम अवतार लेकर पृथ्वी पर फैले क्षत्रिय राजाओं के अत्याचार को समाप्त किया। महर्षि जमदग्नि की हत्या के बाद परशुराम जी ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से मुक्त कर धर्म की रक्षा की।
Lord Vishnu-Parshuram Story: हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में भगवान विष्णु के दशावतारों का वर्णन है। इन अवतारों का उद्देश्य सृष्टि में धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए होता है। दशावतारों में छठा स्थान परशुराम जी का है, जो भगवान विष्णु का आवेशावतार माने जाते हैं। विष्णु पुराण, भागवत पुराण, महाभारत तथा अन्य पुराणों में उनकी कथा वर्णित है। इस अवतार में भगवान ने ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर क्षत्रिय वंश के अत्याचारों को समाप्त किया और पृथ्वी को भारमुक्त किया। उनकी कथा त्रेता युग की है, जिसमें वे महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र के रूप में अवतरित हुए।
कार्तवीर्य अर्जुन
उस समय पृथ्वी पर क्षत्रिय राजाओं का अहंकार चरम पर था। वे धर्म मार्ग से भटक गए थे, ब्राह्मणों का अपमान करते थे और ऋषि-मुनियों को सताते थे। हैहय वंश के राजा कार्तवीर्य अर्जुन, जिन्हें सहस्त्रार्जुन या सहस्त्रबाहु भी कहा जाता है, वो विशेष रूप से क्रूर और बलशाली थे। दत्तात्रेय जी की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें सहस्र भुजाओं का वरदान प्राप्त हुआ था, जिससे वे अजेय हो गए थे। महिष्मती नगरी में उनका शासन था। वे प्रजा पर अत्याचार करते और ऋषियों के आश्रमों को भी नहीं छोड़ते थे।
भगवान विष्णु
माता पृथ्वी इन अत्याचारों से व्यथित होकर भगवान विष्णु की शरण में पहुंचीं। भगवान श्रीहरि ने उन्हें आश्वासन दिया कि जब अधर्मी धर्म का पतन करने का प्रयास करते हैं, तब वे अवश्य अवतार लेकर धर्म की स्थापना करते हैं। उन्होंने कहा कि वे महर्षि जमदग्नि के घर पुत्र रूप में जन्म लेंगे और सहस्त्रार्जुन के अत्याचारों का अंत करेंगे। इस प्रकार भगवान विष्णु ने परशुराम रूप धारण करने का संकल्प लिया।
परशुराम जी जन्म
परशुराम जी का जन्म भृगु वंश में हुआ। भृगु ऋषि के पुत्र ऋचिक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ था। भृगु ऋषि ने सत्यवती को दो चरु प्रदान किए थे, एक ब्राह्मण गुणों वाला और दूसरा क्षत्रिय गुणों वाला। सत्यवती की माता ने छल से चरु बदल दिए, जिसके फलस्वरूप सत्यवती के पुत्र जमदग्नि ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रियोचित तेज वाले हुए। जमदग्नि ऋषि अत्यंत तेजस्वी और तपस्वी थे। उन्होंने राजा प्रसेनजित की कन्या रेणुका से विवाह किया। रेणुका अत्यंत पतिव्रता थीं।
जमदग्नि ऋषि ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया। इससे प्रसन्न होकर इंद्र ने वरदान दिया। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को, मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में जानापाव पर्वत पर रेणुका के गर्भ से परशुराम जी का जन्म हुआ। उनका मूल नाम राम था। वे जमदग्नि के पांच पुत्रों में सबसे छोटे थे। अन्य पुत्र थे रुमण्वान, सुषेण, वसु और विश्वावसु।
परशुराम जी की तपस्या
परशुराम जी ने बाल्यावस्था से ही शास्त्र और शस्त्र दोनों की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने विश्वामित्र, ऋचिक तथा कश्यप ऋषि से प्रारंभिक विद्या सीखी। शार्ङ्ग धनुष और अविनाशी वैष्णव मंत्र की प्राप्ति हुई। तदनंतर उन्होंने कैलाश पर्वत पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की। शिव जी प्रसन्न हुए और उन्हें विद्युदभि नामक दिव्य परशु (फरसा) प्रदान किया। इसी परशु के कारण उनका नाम परशुराम पड़ा। शिव जी ने उन्हें त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र और मंत्र कल्पतरु भी दिए। चक्रतीर्थ पर तपस्या से भगवान विष्णु ने उन्हें वर दिया कि त्रेता युग में रामावतार के समय तेजोहरण के पश्चात वे कल्पांत तक भूलोक पर तपस्या करते रहेंगे।
कामधेनु गाय के लिए युद्ध
परशुराम जी क्षत्रियोचित पराक्रम वाले ब्राह्मण थे। एक बार जमदग्नि ऋषि के आश्रम में दिव्य कामधेनु गाय थी, जो यज्ञों और अतिथि सत्कार के लिए दूध प्रदान करती थी। सहस्त्रार्जुन वन विहार करते हुए आश्रम पहुंचा। जमदग्नि जी ने उसे और उसकी सेना को कामधेनु के दूध से भोजन कराया। सहस्त्रार्जुन ने गाय को देखकर लोभ कर लिया और जमदग्नि जी से उसे मांग लिया। जमदग्नि जी ने मना कर दिया, क्योंकि गाय उनके यज्ञों के लिए आवश्यक थी। क्रोध में सहस्त्रार्जुन ने बलपूर्वक गाय छीन ली और आश्रम को क्षति पहुंचाई।
परशुराम जी उस समय आश्रम से बाहर थे। लौटकर जब उन्होंने यह समाचार सुना तो क्रोधित हो गए। उन्होंने महिष्मती नगरी पर आक्रमण किया। सहस्त्रार्जुन ने अपने सहस्र भुजाओं से युद्ध किया, किंतु परशुराम जी के दिव्य परशु के सामने वह असफल रहा। परशुराम जी ने उसके सभी भुजाएं काट दीं और अंत में उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। गाय को वापस लाकर उन्होंने पिता को सौंपा।
जमदग्नि जी का वध
सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने यह समाचार सुना तो प्रतिशोध की आग में जल उठे। एक दिन जब जमदग्नि जी ध्यान में लीन थे और परशुराम जी आश्रम से बाहर थे, तो वे आश्रम पर टूट पड़े। उन्होंने जमदग्नि जी का वध कर दिया। उनके शरीर पर इक्कीस घाव थे। माता रेणुका विलाप करती हुई चिता पर बैठ गईं। परशुराम जी जब आश्रम पहुंचे तो पिता का कटा शरीर और माता का विलाप देखकर उनका क्रोध असीम हो गया। उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि वे पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित कर देंगे।
क्षत्रिय राजवंशों का संहार
परशुराम जी ने सबसे पहले सहस्त्रार्जुन के पुत्रों का वध किया। फिर उन्होंने समस्त क्षत्रिय वंशों पर आक्रमण किया। हैहय वंश सहित अन्य क्षत्रिय राजवंशों का संहार किया। वे इक्कीस बार पृथ्वी पर घूम-घूमकर क्षत्रियों का नाश करते रहे। कुरुक्षेत्र क्षेत्र में समंतपंचक नामक स्थान पर उन्होंने क्षत्रियों के रक्त से पांच विशाल कुंड भर दिए। पितरों का तर्पण उन रक्त से किया। केवल उन क्षत्रिय महिलाओं को छोड़ा जिनके गर्भ में संतान थी, ताकि वंश की निरंतरता बनी रहे।
परशुराम जी का अश्वमेध यज्ञ
इस संहार के पश्चात महर्षि ऋचिक ने उन्हें रोका। परशुराम जी ने अश्वमेध यज्ञ किया और जीती हुई समस्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी। ब्राह्मणों ने इस भूमि को खंड-खंड करके बांटा, जिससे वे खांडवायन कहलाए। परशुराम जी ने शस्त्र त्याग दिए और महेंद्र पर्वत पर जाकर तपस्या में लीन हो गए। वे अजर-अमर हैं और अष्ट चिरंजीवियों में से एक हैं। कल्पांत तक वे वहीं तपस्या करते रहेंगे।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)