Jyeshtha Kalashtami 2026: कालाष्टमी को काला अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। यह प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आती है, लेकिन ज्येष्ठ मास की कालाष्टमी का अपना विशेष स्थान है।
Jyeshtha Kalashtami 2026: ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाने वाली कालाष्टमी हिंदू धर्म में भगवान काल भैरव को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत और त्यौहार है। यह दिन भक्तों के लिए भय, नकारात्मक शक्तियों और संकटों से मुक्ति का अवसर माना जाता है। वर्ष 2026 में ज्येष्ठ कालाष्टमी कब मनाई जाएगी, आइए इस बारे में जानते हैं...
तिथि और शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास की कृष्ण अष्टमी तिथि 9 मई 2026 को प्रातः 4:32 बजे से शुरू होकर 10 मई को प्रातः 5:36 बजे तक रहेगी। इसलिए मुख्य व्रत और पूजा 9 मई को ही की जाएगी। भक्तों को इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए और पूजा का संकल्प लेना चाहिए।
इस तिथि पर प्रदोष काल विशेष रूप से शुभ होता है, जब भगवान काल भैरव की पूजा का अधिक महत्व होता है। कई भक्त सप्तमी तिथि की रात्रि से ही व्रत शुरू कर देते हैं, लेकिन मुख्य रूप से अष्टमी तिथि को व्रत रखा जाता है।
कालाष्टमी का धार्मिक महत्व
कालाष्टमी को काला अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। यह प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आती है, लेकिन ज्येष्ठ मास की कालाष्टमी का अपना विशेष स्थान है। भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव इस तिथि के मुख्य आराध्य देव हैं। काल भैरव को समय के नियंत्रक, न्याय के देवता और भक्तों के रक्षक के रूप में पूजा जाता है।
मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव ने काल भैरव रूप धारण किया था। भैरव काशी के कोतवाल माने जाते हैं और उनके आशीर्वाद से भक्तों को शत्रु भय, रोग भय तथा अन्य नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्राप्त होती है। कालाष्टमी का व्रत रखने से शनि, राहु और केतु जैसे ग्रह दोषों का प्रभाव भी कम होता है।
यह व्रत मानसिक शांति, साहस और आत्मविश्वास बढ़ाने में सहायक माना जाता है। जो लोग भय, चिंता या अदृश्य बाधाओं से पीड़ित हैं, उनके लिए यह दिन विशेष लाभकारी है। भक्तों का विश्वास है कि निष्ठापूर्वक काल भैरव की पूजा करने से जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
पौराणिक कथा
पुराणों के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी ने अपने अहंकारवश स्वयं को सर्वोच्च बताया। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपना रौद्र रूप प्रकट किया, जिसे काल भैरव कहा गया। भैरव ने ब्रह्मा जी के एक सिर को काट दिया। इस घटना के बाद भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति के लिए पृथ्वी पर भ्रमण करना पड़ा। अंत में काशी में उन्हें पापमुक्ति मिली।
पूजा विधि और सामग्री
प्रातःकाल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
भगवान काल भैरव की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाएं। सरसों का तेल या घी का दीपक विशेष शुभ माना जाता है।
पूजा सामग्री में काला तिल, सरसों का तेल, फूल, अगरबत्ती, धूप, फल, मिठाई, काला वस्त्र और काले चने शामिल करें।
भैरव मंत्र का जाप करें: ॐ कालभैरवाय नमः। भैरव चालीसा, भैरव स्तोत्र या सहस्रनाम का पाठ लाभकारी होता है।
व्रत रखने वाले भक्त दिन भर फलाहार या केवल जल ग्रहण कर सकते हैं। शाम को पूजा के बाद व्रत का पारण करें।
कुत्तों को रोटी या खाना खिलाना इस पूजा का महत्वपूर्ण अंग है, क्योंकि कुत्ता भैरव का वाहन माना जाता है।
मंदिरों में इस दिन विशेष अभिषेक और आरती का आयोजन होता है। काशी के काल भैरव मंदिर में भक्तों की विशेष भीड़ लगती है।
व्रत के लाभ और नियम
भय और चिंता से मुक्ति मिलती है।
शत्रु बाधा और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।
ग्रह दोषों में कमी, विशेषकर शनि और राहु-केतु से संबंधित समस्याओं में राहत मिलती है।
साहस, निर्णय शक्ति और नेतृत्व गुणों में वृद्धि होती है।
पारिवारिक सुख और समृद्धि आती है।
व्रत के नियमों का पालन करना आवश्यक है। मांसाहार, मदिरा और क्रोध से बचें। पूजा में शुद्धता बनाए रखें। महिलाएं भी इस व्रत को रख सकती हैं, लेकिन गर्भवती महिलाओं को डॉक्टर की सलाह से व्रत करना चाहिए।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)