Buddha Purnima Katha: बुद्ध पूर्णिमा वैशाख पूर्णिमा को मनाई जाती है, जिस दिन भगवान गौतम बुद्ध का जन्म, बोधि प्राप्ति और महापरिनिर्वाण हुआ था।
Buddha Purnima Mythological Story: बुद्ध पूर्णिमा बौद्ध समुदाय का सबसे पवित्र त्योहार है। यह वैशाख मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन भगवान गौतम बुद्ध के जन्म, बोधि प्राप्ति तथा महापरिनिर्वाण की तीन पावन घटनाएं हुई थीं। लाखों श्रद्धालु इस अवसर पर बोधगया, लुंबिनी, सारनाथ और कुशीनगर जैसे पवित्र स्थलों पर एकत्र होकर बुद्ध की लीला का स्मरण करते हैं। दीप प्रज्वलन, भिक्षु संघ की पूजा और विशेष ध्यान साधना के माध्यम से भक्त इस दिन को धार्मिक श्रद्धा से मनाते हैं।
बुद्ध पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
बौद्ध परंपरा के अनुसार वैशाख पूर्णिमा को त्रिसंस्कार दिवस भी कहा जाता है, क्योंकि इसी तिथि पर भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण हुआ था। यह दिन बौद्ध अनुयायियों के लिए केवल स्मृति का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत है। इस दिन मंदिरों में बुद्ध मूर्तियों को फूलों से सजाया जाता है, सुगंधित धूप जलाया जाता है और पंचशील की प्रतिज्ञा ली जाती है। विश्व भर के बौद्ध विहारों में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है।
गौतम बुद्ध का जन्म
भगवान गौतम बुद्ध का जन्म शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु में हुआ था। उनके पिता राजा शुद्धोदन शाक्य वंश के शासक थे और माता महामाया देवी कोलिय वंश की राजकुमारी थीं। पुराणों और बौद्ध ग्रंथों के अनुसार महामाया देवी ने गर्भावस्था के दसवें मास में एक स्वप्न देखा। स्वप्न में एक श्वेत हाथी उनके दाहिने पार्श्व से उनके गर्भ में प्रवेश कर गया। इस स्वप्न की व्याख्या विद्वानों ने शुभ संकेत माना।
जन्म के समय महामाया देवी अपने मायके कोलिय राज्य जा रही थीं। मार्ग में लुंबिनी वन पड़ा। वहां एक विशाल शाल वृक्ष के नीचे उन्होंने पुत्र को जन्म दिया। जन्म के समय आकाश से फूलों की वर्षा हुई और देवताओं ने संगीत गाया। नवजात शिशु स्वयं ही सात पग चले और बोल उठे- “मैं संसार में श्रेष्ठ हूँ, मैं संसार में श्रेष्ठ हूँ।” राजा शुद्धोदन ने पुत्र का नाम सिद्धार्थ रखा, जिसका अर्थ था “जिसका उद्देश्य सिद्ध हो चुका हो”।
अष्टम दिन ज्योतिषियों ने राजा को बताया कि यह बालक या तो महान चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या महान संन्यासी। राजा ने पुत्र को राजसी सुख में रखने का निश्चय किया ताकि वह संन्यास का मार्ग न चुन सके।
राजकुमार सिद्धार्थ का राजसी जीवन
राजकुमार सिद्धार्थ का बचपन और जवानी राजमहल में व्यतीत हुई। राजा शुद्धोदन ने तीन महल बनवाए- एक वर्षा ऋतु, एक शीत ऋतु और एक ग्रीष्म ऋतु के लिए। सिद्धार्थ को सर्वोत्तम शिक्षा दी गई। वे अस्त्र-शस्त्र, घुड़सवारी, संगीत और शास्त्रों में निपुण हो गए। सोलह वर्ष की आयु में उनका विवाह कोलिय राजकुमारी यशोधरा से हुआ। कुछ वर्ष बाद उन्हें पुत्र राहुल की प्राप्ति हुई।राजकुमार बाहरी रूप से सुखी थे, किंतु भीतर से एक अज्ञात वेदना उन्हें घेरती रहती थी। वे संसार की नश्वरता को समझने लगे थे।
चार दृश्य और संसार की वास्तविकता
एक दिन राजकुमार सिद्धार्थ घूमने निकले। मार्ग में उन्होंने चार दृश्य देखे जो उनके जीवन की दिशा बदलने वाले सिद्ध हुए। सबसे पहले उन्होंने एक वृद्ध व्यक्ति को देखा, जिसके बाल सफेद थे और शरीर झुक गया था। फिर एक रोगी को देखा जो पीड़ा से कराह रहा था। तीसरे दृश्य में एक शव को देखा जो श्मशान की ओर ले जाया जा रहा था। चौथे दृश्य में उन्होंने एक संन्यासी को देखा, जो शांत और प्रसन्न मुद्रा में था।
ये चार दृश्य राजकुमार के मन में गहरी चिंतन पैदा कर गए। वे समझ गए कि जरा, व्याधि, मृत्यु और जन्म-मृत्यु के चक्र से कोई भी बच नहीं सकता। राजसी सुख अब उन्हें व्यर्थ लगने लगा।
महाभिनिष्क्रमण
29 वर्ष की आयु में एक रात्रि में राजकुमार सिद्धार्थ ने महान निर्णय लिया। उन्होंने राजमहल, पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को छोड़ दिया। घोड़े कंथक पर सवार होकर वे चुपचाप महल से बाहर निकल आए। नगर की सीमा पार करते ही उन्होंने अपने बाल काट दिए और राजसी वस्त्र त्यागकर संन्यासी का वस्त्र धारण कर लिया। यह घटना महाभिनिष्क्रमण के नाम से प्रसिद्ध है। राजकुमार अब सिद्धार्थ गौतम के रूप में नहीं, बल्कि एक साधक के रूप में ज्ञान की खोज में निकल पड़े।
छह वर्ष की कठोर तपस्या
सिद्धार्थ गौतम पहले राजगृह गए। वहां उन्होंने आलार कलाम और उद्रक रामपुत्र जैसे गुरुओं से ध्यान और योग सीखा। किंतु वे संतुष्ट नहीं हुए। फिर वे गया के निकट उरुवेला (आधुनिक बोधगया) पहुंचे। वहां उन्होंने पांच साथियों के साथ छह वर्ष तक अत्यंत कठोर तपस्या की। वे केवल एक दाना चावल या एक फल पर निर्वाह करते थे। शरीर इतना क्षीण हो गया कि पसलियां गिनी जा सकती थीं।
एक दिन वे नदी किनारे बैठे थे। इतनी दुर्बलता थी कि नदी में गिर पड़े। तभी उन्हें अनुभव हुआ कि कठोर तपस्या से ज्ञान नहीं मिलता। उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाने का निश्चय किया। पांच साथी उन्हें छोड़कर चले गए। वे अकेले रह गए।
बोधि वृक्ष के नीचे ध्यान
वैशाख पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर सिद्धार्थ गौतम ने एक पीपल वृक्ष (बोधि वृक्ष) के नीचे आसन लगाया। उन्होंने संकल्प लिया- “यह शरीर सूख जाए, हड्डियां टूट जाएं, किंतु मैं बोधि प्राप्त किए बिना यहां से नहीं उठूंगा।”
रात्रि के प्रथम प्रहर में उन्होंने पूर्व जन्मों की स्मृति प्राप्त की। द्वितीय प्रहर में उन्होंने कर्म और पुनर्जन्म के नियम समझे। तृतीय प्रहर में उन्होंने चार आर्य सत्यों का ज्ञान प्राप्त किया- दुख, दुख का कारण, दुख का निवारण और निवारण का मार्ग।
बोधि प्राप्ति और भगवान बनना
वैशाख पूर्णिमा की मध्य रात्रि में सिद्धार्थ गौतम ने पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया। वे अब भगवान बुद्ध कहलाए। उन्होंने कहा- “बहुत जन्मों तक मैंने इस शरीर को ढूंढा, अब मैंने तथागत को पा लिया।” भगवान बुद्ध ने पहले सप्ताह बोधि वृक्ष के नीचे, दूसरे सप्ताह आसपास के वृक्षों के नीचे और इस प्रकार सात सप्ताह तक ध्यान में व्यतीत किया।
ज्ञान प्राप्ति के बाद प्रथम उपदेश
भगवान बुद्ध ने पहले अपने पांच पूर्व साथियों को खोजा जो सारनाथ के मृगदाव में थे। वहां उन्होंने प्रथम उपदेश दिया, जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है। उन्होंने चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया। इस प्रकार बौद्ध संघ की शुरुआत हुई।
महापरिनिर्वाण
भगवान बुद्ध 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर पहुंचे। वैशाख पूर्णिमा को उन्होंने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। उनके अंतिम शब्द थे- “हे भिक्षुओं, सभी संस्कार अनित्य हैं, सावधान रहकर प्रयत्न करो।”
बुद्ध पूर्णिमा पर धार्मिक अनुष्ठान
इस पावन दिन बौद्ध भिक्षु और श्रावक पूरे दिन उपोसथ व्रत रखते हैं। मंदिरों में बुद्ध की मूर्ति को दूध, जल और फूल चढ़ाए जाते हैं। रात में दीप जलाकर बोधि वृक्ष की परिक्रमा की जाती है। विश्व भर में बौद्ध संघों द्वारा विशेष प्रार्थना सभाएं आयोजित होती हैं।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)