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Mahabharata: महाभारत में कैसे हुआ था गांधारी के 100 पुत्रों का जन्म? जानें पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Mahabharata Story: गांधारी गांधार देश के राजा सुबल की पुत्री थीं। उनका विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार धृतराष्ट्र से हुआ था। धृतराष्ट्र जन्म से ही नेत्रहीन थे। पति के प्रति समर्पण और पतिव्रता धर्म का पालन करते हुए गांधारी ने स्वयं भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी।

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Mahabharata Mythological Story: महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं है, बल्कि इसमें अनेक ऐसे प्रसंग वर्णित हैं, जो आज भी लोगों को आश्चर्यचकित कर देते हैं। इन्हीं रहस्यमयी घटनाओं में से एक है हस्तिनापुर की महारानी गांधारी के 100 पुत्रों का जन्म। सामान्य रूप से एक माता के लिए इतने पुत्रों को जन्म देना असंभव माना जाता है, लेकिन महाभारत में वर्णित यह कथा दैवी शक्तियों, ऋषियों के वरदान और नियति से जुड़ी हुई मानी जाती है। कौरवों के जन्म की यह कथा भारतीय पुराणों और महाभारत का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग है, क्योंकि आगे चलकर यही 100 पुत्र महाभारत युद्ध का प्रमुख कारण बने। आइए जानते हैं कि आखिर गांधारी के 100 पुत्रों का जन्म कैसे हुआ था।

गांधारी कौन थीं?

गांधारी गांधार देश के राजा सुबल की पुत्री थीं। उनका विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार धृतराष्ट्र से हुआ था। धृतराष्ट्र जन्म से ही नेत्रहीन थे। पति के प्रति समर्पण और पतिव्रता धर्म का पालन करते हुए गांधारी ने स्वयं भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी, ताकि वे भी उसी प्रकार जीवन व्यतीत करें जैसा उनके पति करते थे। गांधारी अपनी तपस्या, धर्मनिष्ठा और पतिव्रता के लिए प्रसिद्ध थीं। महाभारत में उनका स्थान अत्यंत सम्माननीय माना गया है।

महर्षि व्यास से प्राप्त हुआ था वरदान

महाभारत के अनुसार एक बार महर्षि व्यास हस्तिनापुर आए। गांधारी ने अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी सेवा की। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर महर्षि व्यास ने उन्हें वरदान मांगने को कहा, तब गांधारी ने इच्छा व्यक्त की कि उन्हें सौ पुत्र प्राप्त हों, जो उनके पति धृतराष्ट्र के समान बलशाली हों। महर्षि व्यास ने प्रसन्न होकर उन्हें सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान दे दिया। यही वह वरदान था, जिसने आगे चलकर कौरवों के जन्म की अद्भुत कथा को जन्म दिया।

लंबे समय तक गर्भ धारण करने के बाद भी नहीं हुआ जन्म

महर्षि व्यास के वरदान के बाद गांधारी गर्भवती हुईं। किंतु उनका गर्भ सामान्य नहीं था। कहा जाता है कि उन्होंने लगभग दो वर्षों तक गर्भ धारण किया, लेकिन संतान का जन्म नहीं हुआ। इसी बीच हस्तिनापुर में एक महत्वपूर्ण घटना घटी। महारानी कुंती ने धर्मराज युधिष्ठिर को जन्म दे दिया। जब गांधारी को यह समाचार मिला कि कुंती का पुत्र जन्म ले चुका है, तो वे अत्यंत दुखी और चिंतित हो गईं। गांधारी इस बात से व्यथित थीं कि उन्हें वरदान पहले मिला था, फिर भी उनकी संतान का जन्म नहीं हुआ, जबकि कुंती का पुत्र पहले जन्म ले चुका था।

क्रोध और दुख में गर्भ पर प्रहार

महाभारत की कथा के अनुसार, अत्यधिक दुख और निराशा में गांधारी ने अपने उदर पर प्रहार कर लिया। इसके परिणामस्वरूप उनके गर्भ से कोई शिशु नहीं, बल्कि लोहे के समान कठोर मांस का एक बड़ा पिंड बाहर निकला। उस मांसपिंड को देखकर गांधारी अत्यंत दुखी हो गईं। उन्हें लगा कि महर्षि व्यास का वरदान असत्य सिद्ध हो गया है। उसी समय महर्षि व्यास वहां पहुंचे। उन्होंने गांधारी को धैर्य रखने को कहा और बताया कि उनका वरदान व्यर्थ नहीं जाएगा।

महर्षि व्यास ने मांसपिंड के किए 101 भाग

महर्षि व्यास ने उस मांसपिंड पर जल का छिड़काव किया और उसे 101 भागों में विभाजित करने का आदेश दिया। उनके निर्देशानुसार उस मांसपिंड को 101 समान भागों में बांट दिया गया। प्रत्येक भाग अंगूठे के आकार का बताया गया है। महर्षि व्यास ने इन टुकड़ों को घी से भरे 101 मिट्टी के कलशों में सुरक्षित रखने को कहा। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि इन कलशों को गुप्त और सुरक्षित स्थान पर रखा जाए तथा निश्चित समय तक उन्हें न खोला जाए।

कलशों से हुआ कौरवों का जन्म

निर्धारित समय पूरा होने पर सबसे पहले एक कलश खोला गया। उसमें से एक बालक उत्पन्न हुआ, जिसका नाम दुर्योधन रखा गया। दुर्योधन ही धृतराष्ट्र और गांधारी का ज्येष्ठ पुत्र था। महाभारत के अनुसार दुर्योधन के जन्म के समय अनेक अपशकुन दिखाई दिए। आकाश में विचित्र ध्वनियां सुनाई दीं और पशु-पक्षी असामान्य व्यवहार करने लगे। विद्वानों और ज्योतिषियों ने धृतराष्ट्र को संकेत दिया कि यह बालक भविष्य में कुल के लिए संकट का कारण बन सकता है। किन्तु पुत्र मोह के कारण धृतराष्ट्र ने उनकी बात नहीं मानी। दुर्योधन के जन्म के बाद क्रमशः अन्य कलश खोले गए और उनसे शेष 99 पुत्रों का जन्म हुआ। इस प्रकार गांधारी सौ पुत्रों की माता बनीं।

एक पुत्री का भी हुआ था जन्म

बहुत कम लोग जानते हैं कि गांधारी केवल सौ पुत्रों की ही नहीं, बल्कि एक पुत्री की भी माता थीं। 101वें कलश से एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम दुःशला रखा गया। दुःशला कौरवों की एकमात्र बहन थीं। बाद में उनका विवाह सिंधु देश के राजा जयद्रथ से हुआ था। महाभारत में दुःशला का उल्लेख कई महत्वपूर्ण प्रसंगों में मिलता है।

गांधारी के 100 पुत्रों में प्रमुख कौन थे?

यद्यपि गांधारी के सौ पुत्र थे, लेकिन उनमें कुछ विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए। इनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था और कौरवों का नेतृत्व करता था। उसके बाद दुःशासन का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। दुःशासन वही था, जिसने द्यूत सभा में द्रौपदी के चीरहरण का प्रयास किया था। इसके अतिरिक्त विकर्ण भी कौरवों में उल्लेखनीय माना जाता है। विकर्ण ने द्रौपदी के अपमान के समय सभा में इसका विरोध किया था, इसलिए उसे अन्य कौरवों से भिन्न माना जाता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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