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Ramayana Story: भरत चित्रकूट क्यों गए थे , जानिए प्रमुख कारण

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Ramayana Story: रामायण में भरत का चित्रकूट जाना केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि यह भ्रातृप्रेम, त्याग, कर्तव्य और धर्म की पराकाष्ठा का प्रतीक है।

Ramayana Story:
Ramayana Story: रामायण में भरत का चित्रकूट जाना केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि यह भ्रातृप्रेम, त्याग, कर्तव्य और धर्म की पराकाष्ठा का प्रतीक है। जब महाराजा दशरथ के आदेश और माता कैकेयी के वरदान के कारण भगवान श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ 14 वर्ष के वनवास पर चले गए, तब भरत अपने ननिहाल (केकय देश) में थे।अयोध्या लौटने पर जब उन्हें पूरे घटनाक्रम का पता चला, तो वे गहरे शोक और ग्लानि में डूब गए। वे उस राज्य को स्वीकार नहीं करना चाहते थे जो उनके भाई के वनवास की कीमत पर मिला था। इसलिए, वे श्री राम को वापस अयोध्या लाने के लिए चित्रकूट गए। चलिए जानते हैं कि भरत चित्रकूट क्यों गए थे।

श्री राम को वापस अयोध्या लाकर राजसिंहासन सौंपना

भरत के चित्रकूट जाने का सबसे मुख्य और तात्कालिक कारण श्री राम को वापस अयोध्या मनाकर लाना था। भरत का मानना था कि रघुकुल की परंपरा के अनुसार राजा बनने का अधिकार केवल सबसे बड़े पुत्र का होता है।

भरत को लग रहा था कि संसार उन्हें और उनकी माता कैकेयी को इस संकट का दोषी मानेगा। वे श्री राम के चरणों में गिरकर अपने मन की निष्पापता सिद्ध करना चाहते थे और उन्हें राजा के रूप में वापस देखना चाहते थे।

भरत अकेले चित्रकूट नहीं गए थे। उनके साथ माता कौशल्या, सुमित्रा, स्वयं कैकेयी, ऋषि वशिष्ठ, मंत्री गण और अयोध्या की प्रजा भी थी। वे सब मिलकर राम जी से लौटने की प्रार्थना करने गए थे।

 भ्रातृप्रेम और अपार श्रद्धा

भरत और राम का प्रेम अलौकिक था। जब लक्ष्मण को पता चला कि भरत एक बड़ी सेना के साथ चित्रकूट आ रहे हैं, तो उन्हें एक पल के लिए संदेह हुआ कि कहीं भरत राम पर आक्रमण करने तो नहीं आ रहे। लेकिन श्री राम भरत के स्वभाव को अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने लक्ष्मण को समझाया कि भरत जैसा भाई संसार में दूसरा नहीं हो सकता।जब भरत चित्रकूट पहुंचे, तो वे रथ त्यागकर पैदल ही कटीले रास्तों पर चलते हुए राम की कुटिया तक पहुंचे। दोनों भाइयों का मिलाप इतना भावुक था कि वहां मौजूद हर व्यक्ति और वन के पशु-पक्षी भी रो पड़े।

माता कैकेयी की भूल का पश्चाताप

भरत अपनी माता कैकेयी द्वारा किए गए कृत्य से अत्यंत दुखी और लज्जित थे। वे श्री राम के सामने जाकर यह स्पष्ट करना चाहते थे कि इस पूरे षड्यंत्र में उनकी कोई सहमति नहीं थी। वे राम जी से अयोध्या की प्रजा और परिवार की ओर से क्षमा मांगने गए थे ताकि रघुकुल के इतिहास पर लगा यह दाग मिट सके।

 'भरत मिलाप' और संवाद

जब चित्रकूट में भरत और श्री राम का संवाद हुआ, तो वह राजनीति, धर्म और दर्शन का एक अद्भुत उदाहरण बन गया। भरत ने श्री राम से अयोध्या लौटने की बार-बार विनती की। उन्होंने कहा कि राजा आप ही हैं और मैं आपका सेवक बनकर रहूँगा। लेकिन श्री राम अपने पिता राजा दशरथ के वचनों (रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाई बरु बचन न जाई) से बंधे हुए थे। श्री राम ने भरत को समझाया कि:

"तात! पिता की आज्ञा का पालन करना और सत्य के मार्ग पर चलना ही हमारा परम धर्म है। यदि हम ही धर्म का उल्लंघन करेंगे, तो प्रजा को क्या सीख मिलेगी?"

 भरत की मनोदशा

गोस्वामी तुलसीदास जी ने 'अयोध्याकांड' में चित्रकूट प्रसंग का बेहद मार्मिक वर्णन किया है। भरत ने जब देखा कि श्री राम धर्म से डिगने वाले नहीं हैं और वे पिता के वचन को भंग नहीं करेंगे, तो भरत असमंजस में पड़ गए। वे राम की आज्ञा को टाल भी नहीं सकते थे और उनके बिना अयोध्या का राजपाठ संभालना भी उन्हें स्वीकार नहीं था।

 श्री राम की चरण पादुकाएं 

जब यह तय हो गया कि श्री राम 14 वर्ष का वनवास पूरा किए बिना नहीं लौटेंगे, तब गुरु वशिष्ठ की मध्यस्थता और श्री राम के समझाने पर भरत ने एक बीच का मार्ग निकाला।
- भरत ने श्री राम से उनकी चरण पादुकाएं (खड़ाऊँ) मांग लीं। उन्होंने कहा कि ये पादुकाएं ही अयोध्या के सिंहासन पर बैठेंगी और राज करेंगी।
-  भरत ने प्रतिज्ञा की कि वे राजा बनकर नहीं, बल्कि श्री राम के प्रतिनिधि और सेवक के रूप में अगले 14 वर्षों तक अयोध्या की देखभाल करेंगे।

चित्रकूट से लौटने के बाद भरत का जीवन

चित्रकूट से लौटने के बाद भरत ने जो किया, उसने उनके त्याग को श्री राम के त्याग से भी बड़ा बना दिया।भरत अयोध्या के महलों में नहीं रहे। वे अयोध्या के पास 'नंदीग्राम' नामक स्थान पर एक कुटिया बनाकर रहने लगे। उन्होंने अपने बाल कटवा लिए, गेरुए वस्त्र धारण किए और ठीक वैसी ही तपस्वी की जीवनशैली अपनाई जैसी वन में श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी जी रहे थे। वे जमीन पर गड्ढा खोदकर उसमें कुश की चटाई बिछाकर सोते थे। भरत ने यह भी प्रतिज्ञा की थी कि यदि 14 वर्ष पूरे होने के अगले ही दिन श्री राम वापस नहीं लौटे, तो वे अग्नि समाधि ले लेंगे।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

 

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