7 Reason Why It Loves Nature: वर्ष में 6 ऋतुएं होती हैं। इनमें से बसंत, ग्रीष्म और वर्षा को 'देवी ऋतु' तथा शरद, हेमंत और शिशिर को 'पितरों की ऋतु' माना गया है।
Sanatan Dharma & Nature: हिन्दू धर्म में प्रकृति का बहुत महत्व बताया गया है। हिन्दू धर्म के सभी त्योहार प्रकृति से ही जुड़े हुए हैं। प्रकृति को त्रिगुणात्मक माना गया है। इन व्रत एवं त्योहारों के माध्यम से प्रकृति के महत्व, मौसम का रूख, भविष्य के संकेत, खगोलीय गणना, शांतिपूर्ण जीवन और आत्मा के उत्थान के रहस्य को बताया गया है। प्रत्येक व्रत, त्योहार और बातों में छुपा हुआ है रहस्य, बस इसे डिकोड करने की है जरूरत। इसीलिए हिंदू धर्म में प्रकृति के सभी तत्वों की पूजा और प्रार्थना का प्रचलन और महत्व है, क्योंकि हिंदू धर्म मानता हैं कि प्रकृति ही ईश्वर की पहली प्रतिनिधि है। प्रकृति के सारे तत्व ईश्वर के होने की सूचना देते हैं। इसीलिए प्रकृति को ईश्वर, देवता, भगवान और पितृ माना गया है।
1. हिंदू त्योहारों का प्रकृति और ऋतु चक्र से संबंध
प्रकृति पूजा और हिंदू धर्म: गोवर्धन पूजा (पहाड़ पूजा), अश्वत्थोपनयन व्रत (पीपल पूजा), आंवला नवमी या अक्षय नवमी (आंवला वृक्ष पूजा), गंगा सप्तमी, नर्मदा जयंती, ताप्ती जयंती, गंगा दशहरा आदि (नदी पूजा), नारली पूर्णिमा (समुद्र पूजा), वट सावित्री व्रत (बरगद/वट वृक्ष पूजा), तुलसी विवाह (तुलसी का पूजा), छठ पूजा और मकर संक्रांति (सूर्य पूजा), करवा चौथ और दूज (चंद्र पूजा), विजयादशमी/दशहरा (शमी वृक्ष पूजा), हरियाली तीज (प्रकृति और वनस्पति), सोमवती अमावस्या (पीपल वृक्ष) आदि कई व्रत एवं त्योहार है जो वृक्ष, पहाड़, नदी, समुद्र और प्रकृति के महत्व को दर्शाते हैं।
ऋतुओं का चक्र और हिंदू त्योहार: वर्ष में 6 ऋतुएं होती हैं। इनमें से बसंत, ग्रीष्म और वर्षा को 'देवी ऋतु' तथा शरद, हेमंत और शिशिर को 'पितरों की ऋतु' माना गया है। मौसम बदलने पर प्रकृति के साथ-साथ मनुष्य के शरीर और मन-मस्तिष्क में भी बदलाव आता है। ऋषियों ने प्रकृति की हानियों से बचने और मानव जीवन को सुखमय बनाने के लिए ऋतुओं के अनुसार त्योहार और नियम बनाए।
बसंत ऋतु (नववर्ष की शुरुआत)
समय: हिंदू वर्ष का पहला महीना 'चैत्र' और 'वैशाख' (अंग्रेजी में मार्च-अप्रैल)।
विशेषता: इस मौसम से हिंदू नववर्ष की शुरुआत होती है और प्रकृति अपनी पूरी शोभा में होती है।
प्रमुख त्योहार: नव-संवत्सर (नया साल), बसंत पंचमी और रंगपंचमी (मौसम बदलने की सूचना)। होली-धुलेंडी (प्रहलाद की याद में), नवरात्रि (मां दुर्गा का उत्सव), रामनवमी, हनुमान जयंती और बुद्ध पूर्णिमा (महापुरुषों के जन्मोत्सव)।
ग्रीष्म ऋतु (तप और साधना का काल)
समय: 'ज्येष्ठ' और 'आषाढ़' का महीना (अंग्रेजी में मई-जून)।
विशेषता: सूर्य उत्तरायण में होता है। यह मौसम कष्टकारी होता है, जो तप के महत्व को दर्शाता है। इसमें अच्छा भोजन और बीच-बीच में व्रत रखने की सलाह दी जाती है।
प्रमुख त्योहार: निर्जला एकादशी, वट सावित्री व्रत, शीतलाष्टमी, देवशयनी एकादशी और गुरु पूर्णिमा। गुरु पूर्णिमा के बाद से सावन का महीना और वर्षा ऋतु शुरू होती है।
वर्षा ऋतु (नए जीवन का आगमन)
समय: 'श्रावण' और 'भाद्रपद' का महीना (अंग्रेजी में जुलाई से सितंबर)।
विशेषता: प्रकृति को नया जीवन मिलता है। संपूर्ण श्रावण (सावन) माह में उपवास (व्रत) रखा जाता है, जिसका महत्व मुस्लिमों के रमजान के रोजों जैसा है।
प्रमुख त्योहार: तीज, रक्षाबंधन और कृष्ण जन्माष्टमी इस ऋतु के सबसे बड़े पर्व हैं।
शरद ऋतु (स्वच्छता और उत्सव का माहौल)
समय: 'आश्विन' और 'कार्तिक' का महीना (अंग्रेजी में अक्टूबर से नवंबर)।
विशेषता: यह प्रभाव में बसंत ऋतु जैसी ही होती है। चारों तरफ वातावरण में स्वच्छता और उत्सव की धूम रहती है।
चातुर्मास का समापन: आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में जाते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवोत्थान एकादशी) को जागते हैं, जिसकी खुशी में व्रत रखा जाता है।
प्रमुख त्योहार: श्राद्ध पक्ष (पितृ कार्य), शारदीय नवरात्रि, दशहरा, करवा चौथ, छठ पूजा, गोपाष्टमी, अक्षय नवमी, देवोत्थान एकादशी, बैकुंठ चतुर्दशी, कार्तिक पूर्णिमा, उत्पन्ना एकादशी, विवाह पंचमी और स्कंद षष्ठी।
हेमंत ऋतु (हल्का गुलाबी जाड़ा)
समय: शरद पूर्णिमा से इसकी शुरुआत होती है। यह 'मार्गशीर्ष' (अगहन) और 'पौष' महीने में पड़ती है (अंग्रेजी में दिसंबर से 15 जनवरी)।
विशेषता: इस मौसम में शरीर स्वस्थ रहता है और मनुष्य की पाचनशक्ति बढ़ जाती है।
प्रमुख त्योहार: करवा चौथ, धनतेरस, रूप चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज आदि। इस ऋतु में कार्तिक स्नान संपन्न होता है और दीपदान किया जाता है।
शिशिर ऋतु (तीखा जाड़ा और पतझड़)
समय: 'माघ' और 'फाल्गुन' का महीना (अंग्रेजी में 16 जनवरी से फरवरी के अंत तक)।
विशेषता: वृक्षों के पत्ते झड़ने लगते हैं और चारों ओर कोहरा छाया रहता है। इसे प्रकृति पर बुढ़ापे का प्रतीक माना जाता है। यह ऋतु चक्र के पूरे होने और फिर से नए जीवन की सुगबुगाहट का संकेत है।
प्रमुख त्योहार: मकर संक्रांति (जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश करता है) और महाशिवरात्रि (फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाने वाला महापर्व)।
2. हिंदू धर्म में प्रकृति और देवियों का स्वरूप
ईश्वर की पहली प्रतिनिधि: हिंदू धर्म में प्रकृति के सभी तत्वों (धरती, वायु, जल, आकाश) की पूजा का विधान है, क्योंकि प्रकृति को ही ईश्वर का पहला रूप और संदेशवाहक माना गया है। इसीलिए इसे देवता, भगवान और पितृ का स्थान प्राप्त है। ब्रह्मांड एक उल्टे वृक्ष की भांति है जहां सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। प्रकृति संचालक 5 देवियां: इस संपूर्ण प्रकृति का मुख्य संचालन पांच महाशक्तियों द्वारा होता है- 1.देवी दुर्गा, 2.महालक्ष्मी, 3.सरस्वती, 5.सावित्री और 5.राधा।
वन और वनस्पति की अन्य अधिष्ठात्री देवियां/देवता:
वनदुर्गा: वनों की पीड़ा हरने, दानवों का वध करने और जंगलों की रक्षा करने वाला माता दुर्गा का श्रेष्ठ अवतार।
देवी तुलसी (वृंदा): भगवान नारायण की प्रिया और वेदों की रक्षिता, जो संपूर्ण वनस्पतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इनके मूल में सभी तीर्थ और देवी-देवता वास करते हैं।
देवी आर्याणि: पितरों के अधिपति अर्यमा की बहन और निसर्ग सौंदर्य का प्रतीक। ये वेदों की वन-शाखाओं (अरण्यक) की रक्षक हैं।
वनस्पति देव: हिरण्यगर्भा ब्रह्मा के केशों से निर्मित देव, जो वृक्षों, लताओं और झाड़ियों का अनुशासन व पोषण करते हैं। सूर्यास्त के बाद या ग्रहण में वनस्पतियों को हानि पहुंचाने वालों को ये दंडित करते हैं।
आरण्यिका नागदेव: महर्षि कश्यप और कद्रू के पुत्र (नाग), जो नैमिष और खांडव जैसे घने वनों के स्वामी हैं और वनों में अकाल या बिना अनुमति प्रवेश करने वाले गृहस्थों को दंड देते हैं।
नदियों का मूर्तिमान स्वरूप: भारत की सात प्रमुख नदियां भी देवियों का रूप हैं। इनमें नर्मदाजी वैराग्य की, गंगाजी ज्ञान की, यमुनाजी भक्ति की, ब्रह्मपुत्रा तेज की, गोदावरी ऐश्वर्य की, कृष्णा कामना की और सरस्वतीजी विवेक की अधिष्ठात्री हैं।
देवताओं का वर्गीकरण (वैदिक मत)
आकाश के देवता (स्वः/स्वर्ग): सूर्य, वरुण, मित्र, पूषन, विष्णु, उषा, अपांनपात, सविता, त्रिप, विंवस्वत, आदित्यगण और अश्विनद्वय।
अंतरिक्ष के देवता (भुवः): पर्जन्य, वायु, इंद्र, मरुत, रुद्र, मातरिश्वन्, त्रिप्रआप्त्य, अज एकपाद, आप और अहितर्बुध्न्य।
पृथ्वी के देवता (भूः): पृथ्वी, उषा, अग्नि, सोम, बृहस्पति और नदियां।
अष्ट वसु (प्रकृति तत्व): धर (धरती), अनल (अग्नि), अनिल (वायु), आप (अंतरिक्ष), द्यौस/प्रभाष (आकाश), सोम (चंद्रमा), ध्रुव (नक्षत्र) और प्रत्यूष/आदित्य (सूर्य)।
3. पर्यावरण और धार्मिक यज्ञों का वैज्ञानिक महत्व
देवयज्ञ (हवन): विशेष औषधीय समिधाओं से हवन करना देवयज्ञ कहलाता है, जो जलवायु को शुद्ध कर ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाता है। शास्त्रों के अनुसार हवन के लिए हरे वृक्षों को काटना वर्जित है; इसके लिए केवल जंगल से स्वतः जमीन पर गिरी सूखी टहनियां (समिधाएं) चुनी जाती हैं। हवन के लिए मुख्यतः 7 पेड़ों की लकड़ियां सर्वश्रेष्ठ हैं:- आम, बड़ (बरगद), पीपल, ढाक, जाँटी, जामुन और शमी।
वैश्वदेवयज्ञ (भूतयज्ञ): पंचमहाभूतों और संसार के समस्त थलचर, नभचर व जलचर प्राणियों के प्रति करुणा और कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम है। इसके तहत भोजन की पहली आहुति रसोई की अग्नि में दी जाती है, और फिर भोजन का कुछ अंश गाय, कुत्ते व कौवे को दिया जाता है।
4. प्रमुख पूजनीय वृक्ष और उनका महत्व
पीपल (अश्वत्थ/प्लक्ष):
धार्मिक मान्यता: भगवान कृष्ण ने गीता में स्वयं को वृक्षों में 'पीपल' कहा है। इसके मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्रभाग में शिव सहित तैंतीस कोटि देवताओं का वास है। प्राचीन काल से ही इसकी पूजा और परिक्रमा (अश्वत्थोपनयन व्रत) का विधान है, जिससे दरिद्रता और दुर्भाग्य दूर होता है। शनिवार की अमावस्या को इसकी परिक्रमा और सरसों के तेल का दीपक जलाने से शनि पीड़ा से मुक्ति मिलती है।
वैज्ञानिक व औषधीय गुण: कल्पवृक्ष समान पीपल सर्वाधिक ऑक्सीजन छोड़ता है और विषैली गैसों को सोखता है। इसकी छाया में वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है, जिससे मानसिक शांति मिलती है। इसकी छाल, पत्तियां, बीज और लाख सभी असाध्य रोगों के निदान में काम आते हैं। वैदिक काल में इसके नीचे घोड़े बांधने के कारण इसे अश्वार्थ भी कहा जाता था।
बरगद (वटवृक्ष):
धार्मिक मान्यता: इसे बेहद पवित्र माना गया है और 'वट सावित्री' का व्रत पूरी तरह इसे समर्पित है। धर्मग्रंथों में पांच प्राचीन वटवृक्षों (अक्षयवट-प्रयाग, पंचवट-नासिक, वंशीवट-वृंदावन, गयावट-गया, और सिद्धवट-उज्जैन) का सर्वोच्च महत्व है। रामचरितमानस के अनुसार देवताओं ने भी वटवृक्ष में भगवान विष्णु के दर्शन किए हैं।
वैज्ञानिक गुण: पीपल की तरह यह भी 24 घंटे ऑक्सीजन देने की क्षमता रखता है और पर्यावरण को दीर्घकाल तक ठंडा रखता है।
आम:
इसके पत्तों का उपयोग मांगलिक कार्यों, त्योहारों, धार्मिक पांडालों और घर के द्वारों पर वंदनवार (लड़) बनाकर वातावरण को शुद्ध और सकारात्मक करने के लिए किया जाता है।
शमी (खिजड़ा):
भविष्यवाणी क्षमता: आचार्य वराहमिहिर के 'बृहतसंहिता' ग्रंथ के अनुसार, शमी का वृक्ष आने वाले संकटों का संकेतक है। जिस वर्ष इसमें अत्यधिक फूल-फल आते हैं, वह सूखे (अकाल) की स्थिति का पूर्व संकेत होता है, जिससे किसान सचेत हो सकते हैं। विजयादशमी के दिन इसकी विशेष पूजा की जाती है।
तुलसी और आंवला:
आयुर्वेद में आंवला को 'सुपरफूड' और तुलसी को 'अमृत' माना गया है। ये दोनों अत्यंत शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट और रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) बढ़ाने वाली औषधियां हैं, जो कई असाध्य रोगों को दूर रखती हैं।
5. वृक्ष और आध्यात्मिक विकास (ध्यान साधना)
साधना में सहायक: वृक्षों की सकारात्मक ऊर्जा मनुष्य के आध्यात्मिक विकास और चित्त की स्थिरता में सहायक होती है।
बुद्ध पुरुषों का संबंध: द्वापरयुग में परमधाम जाने से पूर्व योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान लगाया था। इसके अतिरिक्त भगवान बुद्ध, भगवान महावीर स्वामी और हजारों ऋषि-मुनियों ने वृक्षों के नीचे ही तपस्या करके परम ज्ञान (कैवल्य) प्राप्त किया था।
6. वृक्षारोपण एवं स्थानांतरण के कड़े नियम (शास्त्रोक्त विधि)
पुण्यात्मा की परिभाषा: शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति अपने जीवन में 1 पीपल, 1 नीम, 10 इमली, 3 कैथ, 3 बेल, 3 आंवला और 5 आम के वृक्ष लगाता है, वह कभी नरक के दुखों को नहीं देखता।
शुभ मुहूर्त व नक्षत्र: पौधारोपण के लिए उत्तरा, स्वाति, हस्त, रोहिणी और मूल नक्षत्र अत्यंत शुभ माने गए हैं। शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर कृष्ण पक्ष की सप्तमी तक का समय इसके लिए सर्वश्रेष्ठ है। व्यक्ति को अपने जन्म नक्षत्र के अनुसार भी पौधा लगाना चाहिए।
दिशा और वास्तु नियम: घर के मुख्य द्वार के ठीक सामने कभी बड़ा वृक्ष न लगाएं। बड़े वृक्षों को द्वार की ऊंचाई से तीन गुना दूरी पर साइड में लगाना चाहिए। घर के उत्तर और पूर्व क्षेत्र में हमेशा कम ऊंचाई के पौधे लगाने चाहिए। सुबह 9 बजे से दोपहर 3 बजे तक किसी बड़े वृक्ष की छाया घर पर नहीं पड़नी चाहिए।
प्राचीन पौधारोपण विधि: अग्निपुराण में पौधारोपण को एक पवित्र मांगलिक उत्सव माना गया है। प्राचीन काल में रोपने से पूर्व पौधों को संक्रमण मुक्त करने के लिए औषधीय रसों से नहलाया जाता था। इसके बाद सूर्य के मेष राशि में होने पर शुभ मुहूर्त में सोने की सलाई से हल्दी-कुंकुम लगाकर और मंत्रोच्चार के साथ उन्हें रोपा जाता था।
वृक्ष हटाने का नियम: यदि किसी अत्यंत अनिवार्य कारण से किसी वृक्ष को हटाना पड़े, तो उसे केवल माघ या भाद्रपद मास में ही हटाना चाहिए। साथ ही, उसके बदले में एक नया वृक्ष लगाने का संकल्प 3 महीने के भीतर पूरा करना अनिवार्य है।
7. लोक विश्वास और निष्कर्ष
विविध मान्यताएं: लोक परंपराओं में कुछ विशेष वृक्षों को देवताओं का निवास तो कुछ को विशिष्ट शक्तियों का केंद्र माना जाता है। कल्पवृक्ष को मनोकामना पूर्ण करने वाला माना गया है, वहीं तंत्र-मंत्र में कुछ विशेष वनस्पतियों की छाल व हिस्सों का उपयोग असाधारण औषधियां बनाने में किया जाता है।
मानव सभ्यता को चेतावनी: वेद, पुराण और गीता स्पष्ट संदेश देते हैं कि वनों और प्राकृतिक संपदाओं को मनमाने ढंग से नष्ट करना मानव सभ्यता को विनाश की ओर धकेलना है। धरती को बचाने के लिए अंधाधुंध खनन को रोकना, जंगलों, नदियों, तालाबों और पहाड़ों को उनके स्वाभाविक और प्राकृतिक रूप में संरक्षित रखना जनता और सरकार दोनों का परम कर्तव्य है।