Ramayana Mythology: वाल्मीकि रामायण की पौराणिक कथा में पुत्रेष्टि यज्ञ का रहस्य भी छिपा है। यह यज्ञ केवल संतान प्राप्ति का साधन नहीं था। यज्ञ के दौरान देवतागण ब्रह्माजी के पास गए थे।
Lord Rama Birth Story: श्रीमद् वाल्मीकि रामायण के बालकांड में अयोध्या नगरी के महाराज दशरथ का चरित्र अत्यंत तेजस्वी और धर्मपरायण बताया गया है। इक्ष्वाकु वंश के इस प्रतापी नरेश के राज्य में समृद्धि, न्याय और सुख-शांति का साम्राज्य था। उनकी तीन रानियां थीं- कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा। परंतु संतान सुख उन्हें प्राप्त नहीं हुआ था। वर्षों बीत जाने के बाद भी कोई पुत्र नहीं हुआ, जिससे राजा दशरथ के मन में गहरी चिंता और व्याकुलता उत्पन्न हो गई। वे सोचते कि वंश की रक्षा कैसे होगी, राज्य का उत्तराधिकारी कौन बनेगा।
राजा दशरथ की चिंता
इस चिंता में डूबे हुए राजा दशरथ ने अपने कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ जी से सलाह ली। महर्षि वसिष्ठ ने राजा को समझाया कि पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए। साथ ही, यज्ञ की पूर्ण सफलता के लिए अश्वमेध यज्ञ भी संपन्न करना उचित होगा। महर्षि ने कहा कि यह यज्ञ वैदिक विधि से किया जाए तो देवताओं की कृपा अवश्य प्राप्त होगी। परंतु इस महान यज्ञ को संपन्न कराने के लिए एक ऐसे ऋत्विज की आवश्यकता है, जो शुद्ध आचरण वाला, वेदों का ज्ञाता और तपस्वी हो।
महर्षि वसिष्ठ ने राजा दशरथ को बताया कि अंग देश के राजा रोमपाद के यहां रहने वाले महर्षि ऋष्यशृंग ही इस कार्य के योग्य हैं। ऋष्यशृंग मुनि का नाम सुनकर राजा दशरथ प्रसन्न हुए।
महर्षि ऋष्यशृंग का आगमन
महर्षि ऋष्यशृंग का जन्म ऋषि विभांडक के यहां हुआ था। वे वन में रहकर तपस्या करते थे। उनका जन्म एक विशेष परिस्थिति में हुआ था, जिसके कारण उनका नाम ऋष्यशृंग पड़ा। वे अत्यंत शुद्धचित्त, ब्रह्मचारी और तपस्वी थे। उनकी तपस्या इतनी प्रभावशाली थी कि उनके आश्रम के आसपास का वातावरण ही पवित्र हो जाता था। अंग देश में एक बार भीषण सूखा पड़ा। राजा रोमपाद चिंतित हो गए। ब्राह्मणों ने सलाह दी कि यदि ऋष्यशृंग मुनि को अंग देश लाया जाए तो वर्षा अवश्य होगी। राजा रोमपाद ने अपनी बुद्धिमत्ता से ऋष्यशृंग को आमंत्रित किया।
राजा रोमपाद की पुत्री शांता ने भी इस कार्य में सहयोग किया, जो वास्तव में दशरथ की पुत्री थीं और गोद में दी गई थीं। ऋष्यशृंग मुनि अंग देश पहुंचे। उनकी उपस्थिति से वर्षा हुई और देश में समृद्धि आई। प्रसन्न होकर राजा रोमपाद ने अपनी पुत्री शांता का विवाह ऋष्यशृंग मुनि से कर दिया।
जब दशरथ ने महर्षि वसिष्ठ की सलाह मानकर ऋष्यशृंग मुनि को आमंत्रित करने का विचार किया तो उन्होंने अपने मंत्री सुमंत्र को भेजा। सुमंत्र अंग देश पहुंचे और राजा रोमपाद से अनुमति लेकर ऋष्यशृंग मुनि और शांता को अयोध्या ले आए। ऋष्यशृंग मुनि के आगमन से अयोध्या नगरी में हर्ष का वातावरण छा गया। राजा दशरथ ने उनका भव्य स्वागत किया। मुनि को यज्ञ की दीक्षा दी गई।
अश्वमेध यज्ञ का आयोजन
सबसे पहले अश्वमेध यज्ञ का आयोजन हुआ। यह यज्ञ राजा दशरथ की संतान कामना को पूर्ण करने के लिए था। यज्ञ की विधि के अनुसार घोड़ा छोड़ा गया, जो पूरे राज्य की परिक्रमा करके लौटा। यज्ञ की पूर्णता के बाद पुत्रकामेष्टि यज्ञ प्रारंभ हुआ। महर्षि ऋष्यशृंग ने अथर्ववेद के मंत्रों का उच्चारण करते हुए यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित की। अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मणों और ऋषियों की उपस्थिति में यह यज्ञ अत्यंत भव्य रूप से संपन्न हो रहा था। राजा दशरथ पत्नियों सहित यज्ञ में दीक्षित थे। यज्ञ की आहुतियां दी जा रही थीं, मंत्रों का गूंजन पूरे यज्ञ स्थल पर फैल रहा था।
यज्ञ के समाप्त होने पर एक अद्भुत घटना घटी। अग्नि से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए। उनके हाथ में स्वर्ण का पात्र था, जिसमें दिव्य पायस (खीर) भरा हुआ था। वह पात्र अत्यंत तेजस्वी और सुगंधित था। दिव्य पुरुष ने राजा दशरथ से कहा, “महाराज, यह पायस देवताओं द्वारा प्रदान किया गया है। इसे अपनी रानियों को बांटकर खिलाएं। इससे आपको पुत्र प्राप्ति होगी।”
दिव्य पायस का ग्रहण
राजा दशरथ ने उस दिव्य पायस को ग्रहण किया। उन्होंने इसे अपनी रानियों में विभाजित किया। कौसल्या को आधा भाग दिया। शेष का आधा भाग कैकेयी को दिया। बचे हुए भाग को सुमित्रा को दिया। इस प्रकार पायस का विभाजन वैदिक विधि के अनुसार हुआ। रानियों ने प्रसन्नतापूर्वक यह दिव्य पायस ग्रहण किया।
इसके कुछ समय बाद रानियों ने गर्भधारण किया। कौसल्या से श्रीराम का जन्म हुआ, कैकेयी से भरत का और सुमित्रा से लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न का जन्म हुआ। चारों पुत्र दिव्य तेज से युक्त थे। अयोध्या नगरी में आनंद का वातावरण छा गया। राजा दशरथ का मन संतोष से भर गया।
विष्णु भगवान का श्रीराम अवतार
वाल्मीकि रामायण की इस पौराणिक कथा में पुत्रेष्टि यज्ञ का रहस्य भी छिपा है। यह यज्ञ केवल संतान प्राप्ति का साधन नहीं था। यज्ञ के दौरान देवतागण ब्रह्माजी के पास गए थे। रावण के अत्याचार से त्रस्त होकर उन्होंने विष्णु भगवान से प्रार्थना की थी कि वे मनुष्य रूप में अवतरित होकर रावण का वध करें। ब्रह्माजी की आज्ञा से विष्णु भगवान ने दशरथ के पुत्र रूप में जन्म लेने का संकल्प किया। इसी दिव्य योजना के अंतर्गत पुत्रेष्टि यज्ञ में अग्नि से निकला वह पायस विष्णु तत्व से युक्त था, जिससे चारों भाइयों का जन्म हुआ। इस प्रकार महाराज दशरथ ने संतान की कामना से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया और वह यज्ञ महर्षि ऋष्यशृंग के द्वारा संपन्न हुआ।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)