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Maa Mahagauri: कौन हैं मां महागौरी? नवरात्रि के आठवें दिन पूजे जाने वाली देवी की उत्पत्ति की पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Maa Mahagauri Katha: देवी भागवत पुराण और शिव पुराण के अनुसार मां महागौरी की उत्पत्ति की कथा भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की तपस्या से जुड़ी हुई है।

Maa Mahagauri Katha:
Maa Mahagauri Ki Katha: नवरात्रि के नौ दिनों में नव दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इनमें आठवें दिन अष्टमी को मां महागौरी का पूजन होता है। मां दुर्गा के इस आठवें रूप को महागौरी कहा जाता है। महा का अर्थ अत्यंत और गौरी का अर्थ गौर वर्ण यानी उज्ज्वल श्वेत वर्ण है। पुराणों में इनका वर्ण शंख, चंद्रमा और कुंद पुष्प के समान बताया गया है। मां महागौरी भगवान शिव की अर्धांगिनी पार्वती का ही वह स्वरूप हैं, जिसमें तपस्या के बाद उनका शरीर अत्यंत कांतिमान और गौर हो गया। यह स्वरूप शांति, पवित्रता और दिव्य तेज का प्रतीक माना जाता है। देवी भागवत पुराण और शिव पुराण में इनकी उत्पत्ति और लीला का वर्णन मिलता है। नवरात्रि के इस दिन इनकी आराधना से भक्तों को शिव-पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

मां महागौरी का दिव्य स्वरूप

मां महागौरी का स्वरूप अत्यंत मनोहर और शांत है। उनका पूरा शरीर गौर वर्ण का है। उनकी आयु अष्टवर्षा अर्थात आठ वर्ष की कही गई है। उनके सभी वस्त्र और आभूषण श्वेत रंग के हैं, इसलिए उन्हें श्वेताम्बरधरा भी कहा जाता है। उनके चार भुजाएं हैं। ऊपरी दाहिने हाथ में अभय मुद्रा है, जिससे भक्तों को निर्भयता का आश्वासन मिलता है। नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल धारण किया हुआ है। ऊपरी बाएं हाथ में डमरू है, जो शिव तत्व का प्रतीक है। नीचे वाले बाएं हाथ में वर मुद्रा है। इनकी मुद्रा पूरी तरह शांत और सौम्य है। इनका वाहन वृषभ है, जिस कारण इन्हें वृषारूढ़ा भी कहा जाता है। 

पुराणों में इनके स्वरूप का वर्णन इस प्रकार है-

श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोदया।


अर्थात श्वेत वृषभ पर आरूढ़, श्वेत वस्त्र धारण करने वाली, पवित्र महागौरी महादेव को प्रसन्न करने वाली शुभ फल देने वाली हैं। उनका यह रूप तपस्या के बाद प्राप्त हुआ दिव्य रूप है, जिसमें सारा तेज और कांति समाहित है। मां का यह स्वरूप पार्वती के उन रूपों में से एक है जो शिव के साथ संयुक्त जीवन का प्रतीक है।

 

Maa Mahagauri Katha:

उत्पत्ति की पौराणिक कथा

देवी भागवत पुराण और शिव पुराण के अनुसार मां महागौरी की उत्पत्ति की कथा भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की तपस्या से जुड़ी हुई है। जब मां सती ने दक्ष यज्ञ में अपने शरीर का त्याग किया, तब उन्होंने अगले जन्म में भी शिव को पति रूप में प्राप्त करने का संकल्प लिया। हिमालय पर्वत राजा और उनकी पत्नी मेनका के घर पार्वती के रूप में उनका जन्म हुआ। पार्वती का जन्म होते ही उनके मन में पूर्व जन्म की स्मृति जागृत हो गई। वे बचपन से ही शिव के ध्यान में लीन रहती थीं। 

एक दिन नारद मुनि उनके पास आए और उन्होंने पार्वती को शिव प्राप्ति का मार्ग बताया। नारद जी ने कहा कि केवल कठोर तपस्या से ही महादेव को प्राप्त किया जा सकता है। पार्वती ने नारद जी की सलाह मानकर तपस्या का संकल्प लिया। उन्होंने अपने माता-पिता से अनुमति ली और हिमालय की गुफाओं में जाकर तप आरंभ किया। उनकी प्रतिज्ञा थी- व्रियेऽहं वरदं शम्भुं नान्यं देवं महेश्वरात्। अर्थात मैं शिव को ही पति रूप में वरण करूंगी, अन्य किसी देव को नहीं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी इस संकल्प का उल्लेख किया है- जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरऊं संभु न त रहऊं कुंआरी। 

तपस्या के प्रारंभ में पार्वती केवल कंदमूल और फलों का आहार करती थीं। धीरे-धीरे उन्होंने और भी कठोर नियम ले लिया। वे केवल पत्ते खाती थीं, फिर केवल जल पीती थीं। अंत में वे केवल वायु का आहार कर तपस्या करने लगीं। वर्षों तक वे बिना किसी आश्रय के खड़े रहकर, बिना पलक झपकाए शिव के ध्यान में लीन रहीं। हिमालय की ठंडी हवाएं, वर्षा, बर्फ और गर्मी सब कुछ सहन करती रहीं। उनका शरीर धूल, कीचड़ और तपस्या की कठिनाई से काला पड़ गया। त्वचा सूख गई, बाल उलझ गए और शरीर पर दरारें पड़ गईं। फिर भी उनका मन अटल रहा। 

देवी भागवत पुराण में वर्णन है कि इस कठोर तपस्या से तीनों लोकों में हलचल मच गई। इंद्र और अन्य देवता चिंतित हो गए। वे ब्रह्मा जी के पास गए और बोले कि पार्वती की तपस्या से सृष्टि में असंतुलन हो रहा है। ब्रह्मा जी ने कहा कि यह तपस्या शिव की इच्छा से ही हो रही है, इसे रोकना संभव नहीं। 

इसी बीच भगवान शिव पार्वती की भक्ति और तपस्या से प्रसन्न हुए। उन्होंने पार्वती को परीक्षा लेने के लिए विभिन्न रूपों में आकर उनके संकल्प को तोड़ने का प्रयास किया। कभी वे ब्राह्मण का रूप धरकर आए, कभी साधु बनकर और कभी अन्य रूपों में। उन्होंने मां पार्वती से कहा कि शिवजी तो कठोर हैं, जटाधारी हैं, भूत-प्रेतों के साथ रहते हैं, उन्हें पति रूप में क्यों चाहती हो, लेकिन पार्वती का संकल्प अटल रहा। उन्होंने कहा कि मैं शिवजी को ही अपना पति मानती हूं, अन्य किसी को नहीं। 

मां महागौरी की उत्पत्ति

अंत में शिव प्रसन्न होकर अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए। उन्होंने पार्वती से कहा कि तुम्हारी तपस्या सफल हुई। मैं तुम्हारा पति बनने को तैयार हूं, लेकिन तुम्हारा शरीर तपस्या के कारण काला पड़ गया है, तब शिवजी ने अपने जटाजूट से गंगा जल को निकाला और पार्वती को स्नान कराया। गंगा के पवित्र जल से पार्वती का शरीर धोया गया। 

देवी भागवत पुराण के अनुसार जब पार्वती गंगा में स्नान करने गईं तो उनके शरीर से एक श्याम वर्ण का स्वरूप अलग हो गया। यह श्याम वर्ण का स्वरूप कौशिकी कहलाया। कौशिकी ने आगे चलकर शुंभ-निशुंभ जैसे राक्षसों का संहार किया। वहीं पार्वती का जो स्वरूप गंगा जल से शुद्ध हुआ, वह उज्ज्वल चंद्रमा के समान गौर वर्ण का हो गया। इसी कारण उन्हें महागौरी कहा जाने लगा। उनका पूरा शरीर विद्युत की प्रभा की तरह चमकने लगा। वस्त्र और आभूषण भी श्वेत हो गए। 


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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