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Ramayan Story: भरत ने हनुमान जी पर क्यों चलाया था बाण, जानिए

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Ramayan Story: रामायण की यह घटना अत्यंत भावुक, नाटकीय और भक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाने वाली है। जब लक्ष्मण मेघनाद के शक्ति बाण से मूर्छित हो गए थे, तब उनके प्राण बचाने के लिए हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर लंका लौट रहे थे।

Ramayan Story:
Ramayan Story: रामायण की यह घटना अत्यंत भावुक, नाटकीय और भक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाने वाली है। जब लक्ष्मण मेघनाद के शक्ति बाण से मूर्छित हो गए थे, तब उनके प्राण बचाने के लिए हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर लंका लौट रहे थे। इसी यात्रा के दौरान अयोध्या के पास नंदीग्राम में भरत जी ने हनुमान जी पर बाण चलाया था।यह पूरी घटना क्यों और कैसे घटित हुई, इसे समझने के लिए हमें उस समय की परिस्थितियों और दोनों पात्रों की मनोदशा को विस्तार से समझना होगा।

1. कालनेमि का छल और हनुमान जी का विलंब

लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए सुषेण वैद्य ने हिमालय से संजीवनी बूटी लाने का परामर्श दिया था। हनुमान जी जब बूटी लेने जा रहे थे, तब रावण ने उनके मार्ग में बाधा डालने के लिए कालनेमि नामक राक्षस को भेजा। कालनेमि ने साधु का रूप धरकर हनुमान जी का समय व्यर्थ करने का प्रयास किया। हनुमान जी ने उसका वध तो कर दिया, लेकिन इस सब में काफी समय बीत चुका था और सूर्योदय से पहले लंका पहुँचना अनिवार्य था।जब हनुमान जी द्रोणागिरी पर्वत पहुँचे, तो वे संजीवनी बूटी की पहचान नहीं कर पाए। समय के अभाव को देखते हुए उन्होंने पूरे पर्वत को ही उखाड़ लिया और लंका की ओर तीव्र गति से उड़ चले।

2. भरत जी की मानसिक स्थिति और नंदीग्राम का दृश्य

दूसरी ओर, अयोध्या से दूर नंदीग्राम में भरत जी भगवान श्री राम के वियोग में तपस्वी का जीवन जी रहे थे। वे चौदह वर्ष से केवल श्री राम के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनका मन हमेशा श्री राम की सुरक्षा और उनकी कुशल-क्षेम को लेकर चिंतित रहता था। वे अयोध्या की रक्षा के लिए चौबीसों घंटे तत्पर रहते थे।

3. बाण चलाने का मुख्य कारण: भ्रम और सुरक्षा की चिंता

जब हनुमान जी विशाल पर्वत को हाथ में लेकर आकाश मार्ग से लंका की ओर जा रहे थे, तो उनका मार्ग अयोध्या (नंदीग्राम) के ऊपर से होकर गुजरा।

रात्रि के अंधकार में एक विशालकाय वानर को हाथ में पहाड़ लेकर इतनी तीव्र गति से उड़ते देख भरत जी भ्रमित हो गए। इसके पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण थे:

राक्षसी माया का संदेह: उस समय राक्षसों द्वारा मायावी रूप धारण करना बहुत आम था। भरत जी को लगा कि कोई विशालकाय राक्षस अयोध्या को हानि पहुँचाने या उस पर हमला करने के उद्देश्य से पर्वत लेकर जा रहा है।
अयोध्या की सुरक्षा: भरत जी श्री राम की अनुपस्थिति में अयोध्या के संरक्षक थे। किसी भी अज्ञात संकट से अपनी प्रजा और नगरी की रक्षा करना उनका परम कर्तव्य था।
अपरिचित रूप: भरत जी इससे पहले हनुमान जी से कभी नहीं मिले थे और न ही वे सुग्रीव की वानर सेना के बारे में कुछ जानते थे। इसलिए उनके लिए हनुमान जी एक अजनबी और संभावित खतरा थे।

4. बिना फल  का बाण चलाना

भरत जी कोई साधारण योद्धा नहीं थे; वे परम ज्ञानी और करुणामयी थे। यद्यपि उन्हें संकट का आभास हुआ, फिर भी उन्होंने उस अज्ञात जीव का वध करने के उद्देश्य से बाण नहीं चलाया। उन्होंने हनुमान जी पर 'अमोघ बाण' तो चलाया, लेकिन वह 'बिना फल' (बिना पैनी नोक वाला या बिना अग्रभाग वाला) था।इस बाण का उद्देश्य सामने वाले को मारना नहीं, बल्कि केवल नीचे गिराना या रोकना था ताकि वे उससे पूछताछ कर सकें।

5. 'राम-राम' का घोष और सत्य का प्रकटीकरण

जैसे ही भरत जी का बाण हनुमान जी को लगा, हनुमान जी मूर्छित होकर नीचे गिरने लगे। गिरते समय हनुमान जी के मुख से निरंतर "हा राम", "श्री राम", "रघुपति" का उच्चारण हो रहा था। जब भरत जी ने उस विशाल वानर के मुख से अपने प्राणप्रिय भाई श्री राम का नाम सुना, तो वे स्तब्ध रह गए। वे तुरंत हनुमान जी के पास दौड़े और अत्यंत व्याकुल हो गए। उन्होंने हनुमान जी के सिर को अपनी गोद में रख लिया और विलाप करने लगे कि उनके हाथों श्री राम के एक परम भक्त को कष्ट पहुँचा है।

6. हनुमान जी की चेतना और दोनों का मिलन

जब हनुमान जी को होश आया, तब उन्होंने भरत जी को देखा जो हूबहू श्री राम जैसे ही तपस्वी भेष में दिख रहे थे। हनुमान जी ने अपना परिचय दिया और लंका युद्ध, लक्ष्मण की मूर्छा तथा संजीवनी बूटी लाने की पूरी कथा सुनाई।यह सुनकर भरत जी अत्यधिक भावुक हो गए और उन्होंने हनुमान जी से क्षमा मांगी। भरत जी ने हनुमान जी की सहायता के लिए उन्हें अपने बाण पर बैठकर लंका जाने का प्रस्ताव भी दिया, क्योंकि समय बहुत कम बचा था। हनुमान जी भरत जी के इस असीम बल और श्री राम के प्रति उनकी भक्ति को देखकर गद्गद हो गए। हालांकि, हनुमान जी ने अपनी गति पर भरोसा जताते हुए उनसे विदा ली और समय पर लंका पहुँचकर लक्ष्मण के प्राण बचाए।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

 

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