Parshuram Jayanti 2025: भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान परशुराम कलियुग में भी जीवित हैं। वैशाख मास की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के साथ ही परशुराम जयंती भी मनाई जाती है।
Parshuram Jayanti 2025: भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान परशुराम कलियुग में भी जीवित हैं। वैशाख मास की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के साथ ही परशुराम जयंती भी मनाई जाती है। वैदिक पंचांग के अनुसार, इस साल यानी 2025 में परशुराम जयंती 30 अप्रैल दिन बुधवार को मनाई जाएगी। भगवान परशुराम बहुत जल्दी क्रोधित होने वाले देवता हैं। कहा जाता है कि भगवान परशुराम ने क्रोध में आकर 21 बार क्षत्रियों का संहार किया था। लेकिन सवाल यह उठता है कि भगवान परशुराम को ऐसा क्यों करना पड़ा, इसके पीछे क्या कारण था।
21 बार क्षत्रियों के संहार की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु ने पागल सहस्त्रबाहु को सबक सिखाने के लिए परशुराम के रूप में छठा अवतार लिया था। महिष्मती नगर के राजा सहस्त्रार्जुन क्षत्रिय समुदाय से थे। इस वंश के राजा कार्तवीर्य और रानी कौशिक के पुत्र थे। सहस्त्रार्जुन का असली नाम अर्जुन था। भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने घोर तपस्या की।
दत्तात्रेय उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा, तो उन्होंने दत्तात्रेय से 10000 हाथों का वरदान प्राप्त किया। इसके बाद उनका नाम अर्जुन से सहस्त्रार्जुन हो गया। उन्हें कार्तेयवीर भी कहा जाता है, क्योंकि वे सहस्त्रबाहु और राजा कार्तवीर्य के पुत्र हैं। कहा जाता है कि महिष्मती सम्राट सहस्त्रार्जुन इतना अहंकारी हो गया था कि उसने धर्म की सारी सीमाएं लांघ दी थीं।
उसके अत्याचारों और दुराचार से पूरी जनता त्रस्त थी। वह इतना अहंकारी था कि उसने वेद, पुराण और धर्मग्रंथों को भी नहीं बख्शा। वह ब्राह्मणों को गलत कहकर अपमानित करता था, ऋषियों के आश्रमों को नष्ट कर देता था और उनकी हत्या कर देता था। उसके अत्याचार इतने बढ़ गए कि अपने सुख और मनोरंजन के लिए वह असहाय स्त्रियों का अपहरण कर उनका सतीत्व समाप्त करने लगा।
सहस्त्रार्जुन का लालच बढ़ने लगा
एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी पूरी सेना के साथ जंगलों को पार करके ऋषि जमदग्नि के आश्रम में विश्राम करने के लिए पहुंचा। महर्षि जमदग्नि ने सहस्त्रार्जुन को आश्रम का अतिथि माना और उसके स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी। कहा जाता है कि ऋषि जमदग्नि के पास दिव्य गुणों वाली कामधेनु नामक एक अद्भुत गाय थी, जो उन्हें देवराज इंद्र से प्राप्त हुई थी।
उस गाय की मदद से महर्षि ने कुछ ही समय में पूरी सेना के लिए भोजन की व्यवस्था कर दी। कामधेनु के ऐसे असाधारण गुणों को देखकर सहस्त्रार्जुन को लगने लगा कि उसका राजसी सुख ऋषि के सुख से कम है। उसके मन में ऐसी अद्भुत गाय पाने की इच्छा हुई। उसने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु मांगी।
ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु देने से यह कहते हुए मना कर दिया कि कामधेनु ही आश्रम के संचालन और आजीविका का एकमात्र साधन है। इस पर सहस्त्रार्जुन क्रोधित हो गया और उसने ऋषि जमदग्नि के आश्रम को नष्ट कर दिया और कामधेनु को लेना शुरू कर दिया। तब कामधेनु सहस्त्रार्जुन के हाथों से छूटकर स्वर्ग की ओर चली गई।
भगवान परशुराम ने सहस्त्रार्जुन का वध कर दिया
जब परशुराम अपने आश्रम पहुंचे तो उनकी माता रेणुका ने उन्हें सारी बातें विस्तार से बताईं। माता-पिता का अपमान और आश्रम का विनाश देखकर परशुराम क्रोधित हो गए। महाबली परशुराम ने तुरंत दुष्ट सहस्त्रार्जुन और उसकी सेना का नाश करने की प्रतिज्ञा कर ली।
परशुराम अपने परशु अस्त्र के साथ सहस्त्रार्जुन की नगरी महिष्मतीपुरी पहुंचे। जहां सहस्त्रार्जुन और परशुराम का युद्ध हुआ। लेकिन परशुराम की प्रचंड शक्ति के आगे सहस्त्रार्जुन बौना साबित हुआ। परशुराम जी ने अपने ही परशु से सहस्त्रार्जुन की हजारों भुजाएं काटकर धड़ से अलग कर दिए। परशुराम जी ने सहस्त्रार्जुन का उसी समय वध कर दिया।
इस तरह 21 बार क्षत्रियों का वध हुआ
सहस्त्रार्जुन का वध करने के बाद परशुराम इस वध का प्रायश्चित करने के लिए अपने पिता की आज्ञा पर तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े। फिर अवसर पाकर सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने अपने साथी क्षत्रियों की सहायता से आश्रम में तपस्यारत महर्षि जमदग्नि का सिर काट डाला।
सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने आश्रम के सभी ऋषियों को मार डाला और आश्रम को जला दिया। माता रेणुका ने करुण स्वर में अपने पुत्र परशुराम को सहायता के लिए पुकारा। माता की पुकार सुनकर जब परशुराम आश्रम पहुंचे तो उन्होंने अपनी माता को विलाप करते देखा और उनके पास अपने पिता का कटा हुआ सिर और शरीर पर 21 घाव देखे।
यह देखकर परशुराम अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने शपथ ली कि वे न केवल उस कुल का नाश करेंगे बल्कि उसके सहयोगी सभी क्षत्रिय कुलों का भी 21 बार संहार करेंगे और भूमि को क्षत्रिय विहीन कर देंगे।
वैदिक पुराणों के अनुसार, जब भगवान परशुराम ने अपनी यह प्रतिज्ञा पूरी की। तब भगवान परशुराम ने पृथ्वी को 21 बार क्षत्रिय विहीन कर दिया। उसके बाद उनके रक्त से समंतपंचक क्षेत्र के पांच सरोवरों को भर दिए। उसके बाद परशुराम जी ने अपना संकल्प पूरा किया।
कहते हैं कि महर्षि ऋचीक ने स्वयं प्रकट होकर भगवान परशुराम को ऐसा करने से रोका था, तब जाकर किसी तरह धरती पर क्षत्रियों का विनाश रुका था। इसके बाद भगवान परशुराम ने अपने पूर्वजों का श्राद्ध कर्म किया और उनके आदेशानुसार अश्वमेध और विश्वजीत यज्ञ भी किया था। यह भी पढ़ें- Shiv Puran Katha: भगवान शिव को क्यों कहा जाता है 'पशुपति', शिव पुराण में छिपा है इसका रहस्य
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