विज्ञापन
Home  dharm  kavad yatra sabse pahle bhagvan shiv ko kisne chadhayi thi kavad

Kavad Yatra : सबसे पहले भगवान शिव को किसने चढ़ाई थी कावड़, जानिए

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Kavad Yatra :  सावन का महीना आते ही देशभर में "बोल बम" और "हर-हर महादेव" के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो जाता है। लाखों शिवभक्त पवित्र नदियों से जल भरकर कावड़ के माध्यम से भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।

Kavad Yatra : 
Kavad Yatra :  सावन का महीना आते ही देशभर में "बोल बम" और "हर-हर महादेव" के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो जाता है। लाखों शिवभक्त पवित्र नदियों से जल भरकर कांवड़ के माध्यम से भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सबसे पहली कावड़ किसने चढ़ाई थी? इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई? आइए जानते हैं पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के आधार पर इसका उत्तर।

पहली कावड़ किसने चढ़ाई?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सबसे पहली कांवड़ भगवान परशुराम ने चढ़ाई थी। माना जाता है कि उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर  से गंगाजल लेकर पैदल यात्रा की और उसे वर्तमान बागपत जिले के पुरा महादेव मंदिर में भगवान शिव का अभिषेक किया।यह घटना त्रेता युग की मानी जाती है। तभी से गंगाजल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करने की परंपरा शुरू हुई, जो आज कांवड़ यात्रा के रूप में विश्व की सबसे बड़ी धार्मिक यात्राओं में से एक बन चुकी है।

क्यों चढ़ाई परशुराम ने कावड़ ?

कथा के अनुसार भगवान परशुराम भगवान शिव के परम भक्त थे। उन्होंने भगवान शिव से दिव्य अस्त्र-शस्त्र और परशु (फरसा) प्राप्त किया था। अपनी भक्ति और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उन्होंने गंगा से पवित्र जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया।कहा जाता है कि उन्होंने दोनों ओर जल के पात्र बांधकर उन्हें एक डंडे पर संतुलित किया, जिसे आज "कावड़" कहा जाता है। यही कारण है कि भगवान परशुराम को पहली कावड़ यात्रा का प्रवर्तक माना जाता है।

समुद्र मंथन से जुड़ी दूसरी मान्यता

एक अन्य प्रसिद्ध मान्यता समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब समुद्र मंथन के दौरान हलाहल विष निकला, तब उसके प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई। देवताओं और असुरों की प्रार्थना पर भगवान शिव ने वह विष अपने कंठ में धारण कर लिया, जिससे उनका कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए।विष की तीव्रता कम करने के लिए देवताओं ने विभिन्न पवित्र नदियों का जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया। कुछ विद्वान मानते हैं कि यही जलाभिषेक आगे चलकर कावड़ परंपरा का आधार बना।

श्रवण कुमार से जुड़ी मान्यता

एक और लोकप्रिय लोकमान्यता के अनुसार श्रवण कुमार भी कावड़ परंपरा से जुड़े हुए हैं। उन्होंने अपने वृद्ध और नेत्रहीन माता-पिता को कंधों पर टोकरी में बैठाकर तीर्थयात्रा कराई थी।हालांकि यह यात्रा भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए नहीं थी, लेकिन कंधों पर संतुलित भार लेकर लंबी धार्मिक यात्रा करने की परंपरा के कारण कई लोग इसे कावड़ यात्रा की प्रेरणा मानते हैं।

कावड़ का आध्यात्मिक महत्व

कांवड़ केवल जल ले जाने का साधन नहीं है, बल्कि यह श्रद्धा, अनुशासन और तपस्या का प्रतीक है। कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालु कई नियमों का पालन करते है
सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं।
ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूर रहते हैं।
नंगे पैर या सरल साधनों से यात्रा करते हैं।
निरंतर भगवान शिव का नाम जपते रहते हैं।
यह यात्रा व्यक्ति के भीतर आत्मसंयम, धैर्य और भक्ति का विकास करती है।

सावन में ही क्यों होती है कावड़ यात्रा?

धार्मिक मान्यता है कि सावन भगवान शिव का अत्यंत प्रिय महीना है। इसी माह में गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। शिवपुराण में भी जलाभिषेक को भगवान शिव को प्रसन्न करने का सर्वोत्तम उपाय बताया गया है।इसी कारण हर वर्ष लाखों श्रद्धालु हरिद्वार, गंगोत्री, गौमुख, सुल्तानगंज, गढ़मुक्तेश्वर और अन्य पवित्र स्थलों से गंगाजल लाकर अपने निकट के शिवालयों में अर्पित करते हैं।


यह भी पढ़ें:- 
Ramayan Ki Kahani: रामायण की रचना क्यों हुई? जानें रामायण की मुख्य घटनाएं, कथा और धार्मिक महत्व 
Ramayana: कौन थे ऋषि जाबालि? रामायण में क्या थी उनकी भूमिका, पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 
Hanuman Ji Story: कलियुग में कहां रहते हैं हनुमान जी? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 
 
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel