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Jagannath Yatra Ki Rasme: रथ यात्रा से पहले होने वाली प्रमुख रस्में क्या-क्या हैं?

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

 Jagannath Yatra Ki Rasme :  भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सनातन परंपरा, भक्ति और संस्कृति का अद्भुत संगम है

 Jagannath Yatra Ki Rasme :
 Jagannath Yatra Ki Rasme :  भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सनातन परंपरा, भक्ति और संस्कृति का अद्भुत संगम है। हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर से भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। लेकिन इस दिव्य यात्रा से पहले कई महत्वपूर्ण धार्मिक रस्में निभाई जाती हैं, जिनका गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। आइए जानते हैं रथ यात्रा से पहले होने वाली प्रमुख रस्मों के बारे में।

1. अक्षय तृतीया पर रथ निर्माण की शुरुआत

रथ यात्रा की तैयारियां अक्षय तृतीयासे ही प्रारंभ हो जाती हैं। इसी शुभ दिन तीनों रथों के निर्माण का कार्य शुरू होता है। इसके लिए विशेष प्रकार की लकड़ियां लाई जाती हैं और पारंपरिक बढ़ई, जिन्हें महाराणा सेवक कहा जाता है, पीढ़ियों से चली आ रही विधि के अनुसार रथों का निर्माण करते हैं।रथों का निर्माण बिना किसी आधुनिक मशीन के किया जाता है। हर वर्ष नए रथ बनाए जाते हैं, जो भगवान के नित्य नवीन स्वरूप का प्रतीक माने जाते हैं।

2. स्नान पूर्णिमा 

रथ यात्रा से लगभग पंद्रह दिन पहले ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का भव्य स्नान उत्सव आयोजित किया जाता है। इस दिन 108 पवित्र कलशों के जल से तीनों विग्रहों का अभिषेक किया जाता है।मान्यता है कि अत्यधिक स्नान के कारण भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। यही कारण है कि इसके बाद वे कुछ दिनों तक भक्तों को दर्शन नहीं देते। इस अनुष्ठान को देव स्नान यात्रा कहा जाता है।

3. अनवसर (अनासार) काल

स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान लगभग 15 दिनों तक विश्राम करते हैं। इस अवधि को अनवसर काल कहा जाता है। इस दौरान मंदिर के गर्भगृह के कपाट भक्तों के लिए बंद रहते हैं।मान्यता है कि भगवान को ज्वर हो जाता है और राजवैद्य उनकी विशेष औषधियों एवं फलों से सेवा करते हैं। इस समय भगवान का विशेष उपचार किया जाता है, जिससे यह संदेश मिलता है कि ईश्वर भी अपने भक्तों की तरह मानवीय भावनाओं से जुड़े हैं।

4. नवयौवन दर्शन

अनवसर काल समाप्त होने के बाद भगवान पुनः स्वस्थ होकर भक्तों को दर्शन देते हैं। इस अवसर को नवयौवन दर्शन कहा जाता है। इस दिन भगवान का नया श्रृंगार किया जाता है और वे अत्यंत आकर्षक रूप में भक्तों के सामने प्रकट होते हैं। लाखों श्रद्धालु इस दुर्लभ दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं।

5. नेत्रोत्सव 

नवयौवन दर्शन से पहले भगवान की आंखों का पुनः चित्रांकन किया जाता है। इसे नेत्रोत्सव कहा जाता है।मान्यता है कि स्नान के बाद भगवान की आंखों का रंग धुंधला पड़ जाता है, इसलिए विशेष विधि से उनकी आंखें दोबारा बनाई जाती हैं। यह अनुष्ठान भगवान की नई ऊर्जा और नवजीवन का प्रतीक माना जाता है।

 6. रथों का अंतिम श्रृंगार

रथ यात्रा से पहले तीनों रथों को रंग-बिरंगे वस्त्रों, ध्वजाओं, लकड़ी की कलाकृतियों और पारंपरिक सजावट से अलंकृत किया जाता है।

तीनों रथों के नाम और विशेषताएं भी अलग-अलग होती हैं—

भगवान जगन्नाथ का रथ – नंदीघोष
 भगवान बलभद्र का रथ – तालध्वज
 माता सुभद्रा का रथ – दर्पदलन

रथों पर विशाल ध्वजाएं, सारथी, घोड़े और अन्य पारंपरिक प्रतीक स्थापित किए जाते हैं।

7. पहंडी बीजे

इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को मंदिर के गर्भगृह से बाहर लाकर झूमते हुए विशेष शैली में रथों तक ले जाया जाता है। ढोल, मृदंग, झांझ, शंख और हरिनाम संकीर्तन के बीच यह दृश्य अत्यंत मनमोहक होता है।भक्तों के जयघोष से पूरा पुरी धाम भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है।

 8. छेरा पहाड़ा

जब तीनों देवता अपने-अपने रथों पर विराजमान हो जाते हैं, तब पुरी के गजपति महाराज स्वर्ण झाड़ू से रथों की सफाई करते हैं। इस रस्म को छेरा पहाड़ा कहा जाता है।राजा स्वयं चंदन मिश्रित जल का छिड़काव करते हैं और स्वर्ण झाड़ू से रथों को साफ करते हैं। यह परंपरा इस बात का संदेश देती है कि भगवान के सामने सभी समान हैं। चाहे राजा हो या सामान्य व्यक्ति, सभी भगवान के सेवक हैं।

 9. रथों की पूजा और मंगल आरती

रथ यात्रा आरंभ होने से पहले पुरोहित वैदिक मंत्रों के साथ रथों की पूजा करते हैं। भगवान से यात्रा के सफल और मंगलमय होने की प्रार्थना की जाती है। इसके बाद शंखध्वनि, घंटानाद और वैदिक मंत्रों के बीच मंगल आरती होती है। तभी रथों को खींचने की अनुमति दी जाती है।

 धार्मिक महत्व

रथ यात्रा से पहले होने वाली ये सभी रस्में केवल परंपराएं नहीं हैं, बल्कि भगवान और भक्त के बीच प्रेम, सेवा, समर्पण और समानता का संदेश देती हैं। भगवान का स्नान, विश्राम, उपचार, नवयौवन और फिर रथ पर विराजमान होकर भक्तों के बीच आना इस बात का प्रतीक है कि ईश्वर अपने भक्तों के जीवन के हर सुख-दुख में सहभागी हैं।रथ यात्रा की शुरुआत से पहले निभाई जाने वाली प्रत्येक रस्म सदियों पुरानी परंपराओं और शास्त्रीय मान्यताओं पर आधारित है। यही कारण है कि यह उत्सव केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इन दिव्य अनुष्ठानों के माध्यम से भक्त भगवान जगन्नाथ के और भी निकट होने का अनुभव करते हैं तथा उनकी कृपा प्राप्त करने का सौभाग्य हासिल करते हैं।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

 


 

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