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Kabir Das Jayanti: कब है कबीर दास जयंती , जानिए तिथि और महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Kabir Das Jayanti: संत कबीर दास जयंती 29 जून को मनाई जाएगी। यह कबीर दास जी की 649वीं जयंती है। भक्ति काल के महान संत, कबीर दास भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के एक अहम स्तंभ हैं, जिनकी बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उनके समय में थीं

Kabir Das Jayanti
Kabir Das Jayanti: संत कबीर दास जयंती 29 जून को मनाई जाएगी। यह कबीर दास जी की 649वीं जयंती है। भक्ति काल के महान संत, कबीर दास भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के एक अहम स्तंभ हैं, जिनकी बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उनके समय में थीं। वे केवल एक कवि ही नहीं, बल्कि एक निडर विचारक, समाज सुधारक और मानवता के सच्चे पैरोकार भी थे। उनकी शिक्षाओं का मुख्य उद्देश्य समाज को पाखंड, अंधविश्वास और दिखावटी धार्मिकता से मुक्त करना था।

कबीर दास जी का जन्म

कबीर दास जी की जयंती हर साल ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा को मनाई जाती है; इसे कबीर जयंती के रूप में पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। हालांकि विद्वानों के बीच उनके जन्म के सही वर्ष को लेकर अलग-अलग राय है, लेकिन आम मान्यता यही है कि उनका जन्म 1398 ईस्वी में काशी में हुआ था। बाद में 1518 ईस्वी में मगहर में उनका निधन हो गया।

कबीर दास जी के जीवन के मुख्य पहलू

कबीर दास का जीवन कई तरह की किंवदंतियों से घिरा हुआ है। उनका पालन-पोषण जुलाहा समुदाय के एक जोड़े ने किया था। भले ही उन्हें औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी, लेकिन उनके शब्दों की गहराई और सच्चाई किसी भी विद्वान के बराबर थी।

उनके दोहे आज भी लोगों को जीवन की सच्चाई से रूबरू कराते हैं जैसे: "बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।"
इस दोहे के माध्यम से कबीर अहंकार, धार्मिक कट्टरता और खोखले रीति-रिवाजों की तीखी आलोचना करते हैं। उनकी भाषा सरल, स्वाभाविक और आम लोगों के जीवन से जुड़ी थी, जिससे उनका संदेश आसानी से सभी तक पहुँचता था।

कबीर दास ने अपने समय में व्याप्त जातिवाद, धार्मिक कट्टरता और कर्मकांडों का खुलकर विरोध किया। हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक होने के नाते, उन्होंने दोनों धर्मों की रूढ़िवादी प्रथाओं की आलोचना की। नतीजतन, उनके विचारों ने उस दौर के सामाजिक और धार्मिक परिवेश को काफी प्रभावित किया। 'कबीर पंथ' आज भी कबीर की शिक्षाओं को आगे बढ़ाने में सक्रिय है और समाज में सच्चाई, प्रेम और समानता के उनके आदर्शों का प्रसार करने का काम कर रहा है। आज के समय में, जब समाज एक बार फिर कई तरह के भ्रम और बंटवारे से जूझ रहा है, कबीर के विचार सादगी, सच्चाई और इंसानियत का रास्ता दिखाते हैं। उनका जीवन और साहित्य हमें सिखाता है कि सच्चा धर्म वही है जो इंसानों को आपस में जोड़े, न कि उन्हें बांटे।

कबीर के दोहे

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥
तिनका कबहुं ना निन्दिये, जो पांवन तर होय, कबहुं उड़ी आंखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।
दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय॥
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय। बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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