Nirjala Ekadashi Pauranik katha: ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है। वैष्णव परंपरा में इसे वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु का व्रत रखा जाता है। इसी कारण इसे "निर्जला" एकादशी कहा जाता है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार इस व्रत का संबंध महाभारत काल के महाबली भीमसेन से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि भीमसेन की विशेष परिस्थिति के कारण ही इस व्रत की शुरुआत हुई और तभी से इसे अत्यंत पुण्यदायी एकादशी के रूप में मान्यता मिली।
निर्जला एकादशी का उल्लेख मुख्य रूप से पद्म पुराण और भविष्य पुराण में मिलता है। इस व्रत की महिमा और इसकी पौराणिक कथा भगवान विष्णु की भक्ति से जुड़ी हुई है। आइए जानते हैं कि आखिर निर्जला एकादशी क्यों मनाई जाती है और इसके पीछे कौन सी पौराणिक कथा प्रचलित है।
एकादशी व्रत का महत्व और भीमसेन की समस्या
पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल में पांचों पांडव, माता कुंती और द्रौपदी भगवान विष्णु के परम भक्त थे। वे नियमित रूप से एकादशी का व्रत रखते थे। महर्षि वेदव्यास ने सभी को बताया था कि वर्ष में आने वाली चौबीस एकादशियों का विधिपूर्वक पालन करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और अनेक प्रकार के पापों का नाश होता है।
युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, माता कुंती और द्रौपदी सभी श्रद्धा के साथ एकादशी का व्रत करते थे। लेकिन भीमसेन के सामने एक बड़ी समस्या थी। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है कि भीमसेन अत्यंत बलशाली थे और उनकी भूख भी असाधारण थी। उनके उदर में "वृक" नामक अग्नि निवास करती थी, जिसके कारण उन्हें बार-बार भोजन की आवश्यकता पड़ती थी।
जब भी एकादशी का दिन आता, तब भीमसेन के लिए उपवास करना अत्यंत कठिन हो जाता। वे कई बार प्रयास करते, लेकिन भूख सहन नहीं कर पाते थे। इस कारण वे चिंतित रहने लगे कि यदि वे एकादशी का व्रत नहीं रख पाए तो उन्हें उन धार्मिक फलों की प्राप्ति कैसे होगी, जिनका वर्णन शास्त्रों में किया गया है।
भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास से मांगा समाधान
एक दिन भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास के समक्ष अपनी समस्या रखी। उन्होंने कहा कि उनके भाई, माता और पत्नी सभी एकादशी का व्रत करते हैं, लेकिन वे अपनी तीव्र भूख के कारण ऐसा नहीं कर पाते। उन्होंने महर्षि से ऐसा उपाय बताने का अनुरोध किया जिससे उन्हें सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त हो सके।
भीमसेन ने विनम्रतापूर्वक कहा कि वे दान, पूजा और भगवान विष्णु की आराधना तो कर सकते हैं, लेकिन बार-बार उपवास करना उनके लिए संभव नहीं है। इसलिए उन्हें कोई ऐसा व्रत बताया जाए जिसे करने से सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो जाए। महर्षि वेदव्यास ने उनकी बात ध्यानपूर्वक सुनी और फिर उन्हें एक विशेष व्रत के बारे में बताया।
महर्षि वेदव्यास ने बताया निर्जला एकादशी का व्रत
वेदव्यास जी ने भीमसेन से कहा कि यदि वे वर्षभर की सभी एकादशियों का फल प्राप्त करना चाहते हैं तो उन्हें ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करना चाहिए। यह व्रत अत्यंत कठिन है क्योंकि इसमें सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी तक जल तक ग्रहण नहीं किया जाता।
महर्षि ने कहा कि जो व्यक्ति इस दिन पूर्ण श्रद्धा के साथ निर्जल रहकर भगवान विष्णु का स्मरण करता है, उसे वर्ष की सभी एकादशियों के पालन के समान पुण्य प्राप्त होता है। उन्होंने भीमसेन को निर्देश दिया कि इस दिन वे जल का त्याग करें, भगवान विष्णु की पूजा करें और पूरी निष्ठा के साथ व्रत का पालन करें। वेदव्यास जी के वचनों को सुनकर भीमसेन ने इस व्रत को करने का संकल्प लिया।
भीमसेन ने रखा पहला निर्जला एकादशी व्रत
निर्धारित समय आने पर ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का दिन आया। भीमसेन ने भगवान विष्णु का स्मरण करके निर्जला व्रत आरंभ किया। उनके लिए यह व्रत अत्यंत कठिन था क्योंकि वे सामान्य दिनों में भी लंबे समय तक बिना भोजन और जल के नहीं रह सकते थे।
कथा के अनुसार पूरे दिन और पूरी रात उन्होंने अत्यंत धैर्य के साथ व्रत का पालन किया। भूख और प्यास के बावजूद उन्होंने जल की एक बूंद तक ग्रहण नहीं की। वे लगातार भगवान विष्णु का ध्यान करते रहे और उनकी आराधना में लगे रहे। जब द्वादशी तिथि आई, तब विधिपूर्वक पूजा और दान करने के बाद उन्होंने व्रत का पारण किया। कहा जाता है कि भगवान विष्णु उनकी भक्ति और दृढ़ संकल्प से अत्यंत प्रसन्न हुए।
भगवान विष्णु का वरदान
पौराणिक कथा के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत पूर्ण होने पर भगवान विष्णु ने भीमसेन को आशीर्वाद प्रदान किया। उन्हें बताया गया कि इस एक व्रत के प्रभाव से उन्हें उन सभी एकादशियों का फल प्राप्त होगा जिन्हें वे वर्षभर नहीं कर पाए। भगवान विष्णु ने कहा कि जो भी भक्त श्रद्धा और नियमपूर्वक इस एकादशी का पालन करेगा, उसे अन्य एकादशी व्रतों के समान पुण्य प्राप्त होगा। इसी कारण यह व्रत विशेष महत्व रखता है और वैष्णव परंपरा में इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। भीमसेन द्वारा किए जाने के कारण इस एकादशी को "भीमसेनी एकादशी" या "पांडव एकादशी" भी कहा जाता है।