Jagannath Murti Ka Rahasya: जगन्नाथ मंदिर का नबाकेलेबारा (नवकलेवर) उत्सव जगन्नाथ परंपरा के सबसे रहस्यमयी और पवित्र अनुष्ठानों में से एक है। उड़िया भाषा में 'नव' का अर्थ है नया और 'कलेवर' का अर्थ है शरीर।
Jagannath Murti Ka Rahasya: जगन्नाथ मंदिर का नबाकेलेबारा (नवकलेवर) उत्सव जगन्नाथ परंपरा के सबसे रहस्यमयी और पवित्र अनुष्ठानों में से एक है। उड़िया भाषा में 'नव' का अर्थ है नया और 'कलेवर' का अर्थ है शरीर। जिस तरह मनुष्य अपना पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करता है, उसी तरह भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी भी अपनी पुरानी काष्ठ (लकड़ी) की मूर्तियों को छोड़कर नई मूर्तियों में प्रवेश करते हैं। यह उत्सव हर 8, 11 या 19 साल बाद तब मनाया जाता है जब आषाढ़ के महीने में 'अधिकमास' (मलमास या पुरुषोत्तम मास) आता है, यानी जब एक ही साल में आषाढ़ के दो महीने होते हैं। पिछला नवकलेवर वर्ष 2015 में हुआ था। इस पूरे उत्सव का सबसे गुप्त और रहस्यमयी केंद्र बिंदु है- ब्रह्म पदार्थ।
क्या है 'ब्रह्म पदार्थ'?
स्थानीय मान्यता और किवदंति के अनुसार 'ब्रह्म पदार्थ' भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के हृदय स्थान (सीने) में स्थित एक अत्यंत गुप्त और अलौकिक वस्तु है। इसे भगवान जगन्नाथ की 'आत्मा' या 'जीवंत शक्ति' माना जाता है। पुरानी मूर्तियों को विसर्जित करने से पहले इस पदार्थ को निकालकर नई मूर्तियों में स्थापित किया जाता है। चूंकि आज तक किसी भी आम इंसान ने इसे नहीं देखा है, इसलिए इसके स्वरूप को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं, किवदंतियां और कथाएं प्रचलित हैं। 1. श्रीकृष्ण का हृदय?
सबसे लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, जब महाभारत काल के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी देह त्यागी थी, तब अर्जुन ने उनका अंतिम संस्कार किया था। श्रीकृष्ण का पूरा शरीर तो पंचतत्व में विलीन हो गया, लेकिन उनका हृदय (दिल) जलते हुए भी धड़कता रहा और सुरक्षित रहा। माना जाता है कि वही अमर और धड़कता हुआ हृदय आज भी 'ब्रह्म पदार्थ' के रूप में जगन्नाथ जी की मूर्ति के भीतर मौजूद है। 2. अष्टधातु या दिव्य यंत्र?
कुछ अन्य मान्यताओं के अनुसार, यह कोई बहुत प्राचीन तांत्रिक यंत्र, अष्टधातु की कोई चमत्कारी वस्तु या शालिग्राम शिला हो सकता है, जिसमें असीम ऊर्जा का वास है।
ब्रह्म पदार्थ बदलने की रहस्यमयी प्रक्रिया
जब नवकलेवर के दौरान ब्रह्म पदार्थ को पुरानी मूर्ति से निकालकर नई मूर्ति में डाला जाता है, तो उस रात पुरी में कुछ ऐसा होता है जो किसी को भी हैरत में डाल दे। जैसे ही ब्रह्म पदार्थ को नई मूर्तियों में स्थापित कर दिया जाता है, पुरानी मूर्तियों को मंदिर परिसर के भीतर ही 'कोइली वैकुंठ' नामक स्थान पर ज़मीन में दफन (पाताली) कर दिया जाता है। इसके बाद नई मूर्तियों का श्रृंगार होता है और वे रथयात्रा के लिए तैयार होती हैं। 1. पूरे पुरी शहर में ब्लैकआउट (अंधेरा)
ऐसा कहा जाता है कि जिस रात यह रस्म होती है (आषाढ़ कृष्ण चतुर्दशी की आधी रात), उस समय पूरे पुरी शहर की बिजली काट दी जाती है। पूरे शहर में पूरी तरह से अंधेरा कर दिया जाता है। मंदिर के आसपास भारी सुरक्षा बल तैनात होता है ताकि कोई भी मंदिर की तरफ न देख सके। 2. आंखों पर पट्टी और हाथों में रेशम
यह कार्य मंदिर के सबसे वरिष्ठ पुजारियों (जिन्हें दइतापति सेवक कहा जाता है) द्वारा संपन्न किया जाता है। मूर्ति के गर्भगृह में जाने वाले पुजारियों की आंखों पर मोटी रेशमी पट्टी बांध दी जाती है ताकि वे कुछ देख न सकें। उनके हाथों और पैरों पर भी मोटे सूती या रेशमी कपड़े लपेट दिए जाते हैं ताकि वे उस पदार्थ को सीधे अपनी त्वचा से छुकर महसूस न कर सकें। 3. पुजारियों का अनुभव
कहते हैं कि जिन पुजारियों ने इतिहास में इस रस्म को निभाया है, उनके अनुसार जब वे ब्रह्म पदार्थ को अपने हाथों में लेते हैं, तो ऐसा महसूस होता है जैसे कोई जीवित चीज़ उनके हाथों में फुदक रही हो या धड़क रही हो। वह खरगोश या किसी जीवंत पंछी की तरह स्पंदन करता हुआ महसूस होता है। मान्यता: ऐसी कड़ी मान्यता है कि यदि कोई भी व्यक्ति इस ब्रह्म पदार्थ को खुली आंखों से देख ले या बिना सुरक्षा के छू ले, तो उस तेज को उसका शरीर सहन नहीं कर पाएगा और उसकी तत्काल मृत्यु हो जाएगी। यही कारण है कि ईश्वर के इस सर्वोच्च रहस्य को पूरी तरह गुप्त रखा जाता है। हालांकि उपरोक्त मान्यता और किवदंतियों की कोई भी पुष्टि नहीं करता है। - शैली प्रकाश
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)