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Jagannath Rath Yatra:जगन्नाथ रथ यात्रा का प्राचीन इतिहास और इससे जुड़े अनसुने रहस्य

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Jagannath Rath Yatra Ka Itihas: जगन्नाथ रथ यात्रा भारत की सबसे प्राचीन और भव्य धार्मिक यात्राओं में से एक है। यह यात्रा हर वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को ओडिशा के पुरी में आयोजित की जाती है।

Jagannath Rath Yatra Ka Itihas
Jagannath Rath Yatra Ka Itihas: जगन्नाथ रथ यात्रा भारत की सबसे प्राचीन और भव्य धार्मिक यात्राओं में से एक है। यह यात्रा हर वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को ओडिशा के पुरी में आयोजित की जाती है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। करोड़ों श्रद्धालु इस दिव्य यात्रा में शामिल होकर रथ खींचने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि भगवान के रथ की रस्सी खींचने से मनुष्य के अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

रथ यात्रा का पौराणिक इतिहास
जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है। इसका उल्लेख स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण, पद्म पुराण और नारद पुराण सहित कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु स्वयं जगन्नाथ रूप में पुरी में विराजमान हुए और भक्तों को दर्शन देने के लिए वर्ष में एक बार मंदिर से बाहर निकलने की परंपरा प्रारंभ हुई।एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा ने एक बार इच्छा व्यक्त की कि वे अपने दोनों भाइयों श्रीकृष्ण और बलराम के साथ नगर भ्रमण करना चाहती हैं। उनकी इस इच्छा को पूरा करने के लिए तीनों भाई-बहन रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकले। इसी घटना की स्मृति में आज भी जगन्नाथ रथ यात्रा निकाली जाती है।

राजा इंद्रद्युम्न और भगवान जगन्नाथ की कथा

रथ यात्रा के इतिहास का संबंध मालवा के राजा इंद्रद्युम्न से भी जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उन्होंने स्वप्न में भगवान का दिव्य रूप देखा और उसी स्वरूप की स्थापना करने का संकल्प लिया।भगवान विष्णु के निर्देश पर वे पुरी पहुंचे, जहां उन्हें समुद्र तट पर एक दिव्य दारु  प्राप्त हुआ। उसी लकड़ी से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां बनाई गईं।कथा के अनुसार, स्वयं विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई के रूप में मूर्तियां बनाने आए। उन्होंने शर्त रखी कि जब तक कार्य पूरा न हो जाए, कोई भी द्वार नहीं खोलेगा। लेकिन कई दिनों तक कोई आवाज न आने पर राजा और रानी ने द्वार खोल दिया। तब विश्वकर्मा अदृश्य हो गए और मूर्तियां अधूरी अवस्था में ही रह गईं। भगवान ने आकाशवाणी कर कहा कि उन्हें इसी रूप में स्थापित किया जाए। तभी से भगवान जगन्नाथ का वर्तमान स्वरूप पूजा जाता है।

ऐतिहासिक प्रमाण

इतिहासकारों के अनुसार वर्तमान जगन्नाथ मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के महान शासक **राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव** ने प्रारंभ कराया था। बाद में उनके उत्तराधिकारियों ने मंदिर का निर्माण पूरा कराया।हालांकि, रथ यात्रा की परंपरा इससे भी पहले से प्रचलित मानी जाती है। अनेक विद्वानों का मानना है कि यह उत्सव आदिवासी परंपराओं और वैष्णव संस्कृति का अद्भुत संगम है। समय के साथ यह उत्सव पूरे भारत ही नहीं बल्कि विश्वभर में प्रसिद्ध हो गया।

तीन दिव्य रथों का महत्व
1. नंदीघोष रथ
यह भगवान जगन्नाथ का रथ है। इसमें 16 पहिए होते हैं और इसका रंग लाल तथा पीला होता है।

2. तालध्वज रथ
यह भगवान बलभद्र का रथ है। इसमें 14 पहिए होते हैं और इसका रंग लाल तथा हरा होता है।

3. दर्पदलन रथ
यह माता सुभद्रा का रथ है। इसमें 12 पहिए होते हैं और इसका रंग लाल तथा काला होता है।

हर वर्ष इन रथों का निर्माण नए पवित्र वृक्षों की लकड़ी से किया जाता है। रथ निर्माण की प्रक्रिया अक्षय तृतीया से शुरू होती है और पारंपरिक शिल्पकार इसे विशेष धार्मिक विधियों के साथ पूरा करते हैं।

 गुंडिचा मंदिर क्यों जाते हैं भगवान?

रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा श्रीमंदिर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर जाते हैं। इसे भगवान की मौसी का घर भी कहा जाता है।पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान यहां सात दिनों तक विश्राम करते हैं। इस दौरान श्रद्धालु बिना किसी भेदभाव के भगवान के दर्शन कर सकते हैं। इसके बाद बहुदा यात्रा के माध्यम से तीनों देवता पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं।

रथ यात्रा की विशेष परंपराएं

रथ यात्रा से पहले भगवान 15 दिनों तक सार्वजनिक दर्शन नहीं देते। इसे अनवासर कहा जाता है। मान्यता है कि स्नान पूर्णिमा के दिन 108 कलशों से स्नान कराने के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं और विश्राम करते हैं।रथ यात्रा के दिन पुरी के गजपति महाराज स्वयं स्वर्ण झाड़ू से तीनों रथों की सफाई करते हैं। इस परंपरा को छेरा पहंरा कहा जाता है। यह संदेश देती है कि भगवान के सामने राजा और प्रजा सभी समान हैं।

 रथ यात्रा का आध्यात्मिक महत्व

जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि समता, सेवा और भक्ति का संदेश भी देती है। इस दिन भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं। जो लोग किसी कारण मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते, वे भी भगवान के दर्शन कर पाते हैं।रथ की रस्सी खींचना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। मान्यता है कि इससे जीवन के कष्ट दूर होते हैं, शुभ फल प्राप्त होते हैं और भगवान की विशेष कृपा मिलती है।

विश्वभर में रथ यात्रा

आज जगन्नाथ रथ यात्रा केवल पुरी तक सीमित नहीं है। भारत के अनेक राज्यों के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, रूस, मॉरीशस और कई अन्य देशों में भी यह उत्सव बड़े उत्साह से मनाया जाता है। विभिन्न वैष्णव संस्थाओं और भक्त समुदायों के प्रयासों से भगवान जगन्नाथ का यह महापर्व वैश्विक पहचान बना चुका है।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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