Lord Jagannath: पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर केवल चार धामों में से एक होने के कारण ही नहीं, बल्कि अपनी अनगिनत धार्मिक परंपराओं और रहस्यमयी मान्यताओं के कारण भी पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। इस मंदिर का प्रत्येक भाग किसी न किसी पौराणिक कथा और आस्था से जुड़ा हुआ माना जाता है। इन्हीं में से एक है मंदिर के सिंहद्वार पर स्थित तीसरी सीढ़ी, जिसे 'यम शिला' कहा जाता है। मंदिर में प्रवेश करने वाले अधिकांश श्रद्धालु इस तीसरी सीढ़ी पर पैर नहीं रखते, बल्कि उसे लांघकर आगे बढ़ते हैं। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
जगन्नाथ मंदिर की इस तीसरी सीढ़ी को लेकर अनेक धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि इस सीढ़ी का संबंध स्वयं यमराज से है और इसके पीछे भगवान जगन्नाथ तथा धर्मराज यम के बीच हुए एक विशेष प्रसंग का उल्लेख मिलता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि आखिर यम शिला क्या है और भक्त इस पर पैर रखने से क्यों बचते हैं।
क्या है जगन्नाथ मंदिर की यम शिला?
जगन्नाथ मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार, जिसे सिंहद्वार कहा जाता है, पर कुल बाईस सीढ़ियां बनी हुई हैं। इन्हें ओड़िया भाषा में "बाइस पहाचा" कहा जाता है। इन बाईस सीढ़ियों का अपना अलग धार्मिक महत्व बताया जाता है। इन्हीं सीढ़ियों में तीसरी सीढ़ी को यम शिला के नाम से जाना जाता है। मंदिर की प्राचीन परंपरा के अनुसार इस सीढ़ी पर सीधे पैर रखना उचित नहीं माना जाता। अधिकांश श्रद्धालु तीसरी सीढ़ी को स्पर्श किए बिना उसे लांघकर आगे बढ़ते हैं। मंदिर के सेवायत और स्थानीय लोग भी इसी परंपरा का पालन करते हैं। यह मान्यता केवल लोकविश्वास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे भगवान जगन्नाथ और धर्मराज यम से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा सुनाई जाती है, जिसे सदियों से पुरी में सुनाया जाता रहा है।
भगवान जगन्नाथ और यमराज से जुड़ी पौराणिक कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान श्रीहरि जगन्नाथ रूप में नीलाचल धाम में विराजमान हुए, तब उनके दर्शन के लिए पृथ्वी के साथ-साथ देवता, ऋषि और अनेक दिव्य शक्तियां भी आने लगीं। भगवान जगन्नाथ के दर्शन और उनकी कृपा से भक्तों को महान पुण्य प्राप्त होने लगा। कथा के अनुसार जो भी श्रद्धालु सच्ची श्रद्धा से भगवान जगन्नाथ के दर्शन करता, उस पर भगवान की विशेष कृपा होती और उसके अनेक पाप नष्ट हो जाते। इससे यमलोक में आने वाले जीवों की संख्या कम होने लगी।
धर्मराज यम ने देखा कि भगवान जगन्नाथ की कृपा के कारण अनेक जीव उनके दंड से मुक्त हो रहे हैं। इस स्थिति को देखकर यमराज भगवान विष्णु के इस दिव्य स्वरूप के समक्ष पहुंचे और अपनी चिंता प्रकट की। उन्होंने विनम्रतापूर्वक भगवान जगन्नाथ से कहा कि यदि सभी जीव आपके दर्शन मात्र से पापों से मुक्त हो जाएंगे, तो फिर धर्म और कर्म के अनुसार न्याय करने का उनका दायित्व कैसे पूरा होगा।
यमराज ने भगवान जगन्नाथ से क्या प्रार्थना की?
कथा के अनुसार धर्मराज यम ने भगवान जगन्नाथ से निवेदन किया कि सृष्टि का संचालन कर्म के आधार पर होता है। प्रत्येक जीव को उसके कर्मों के अनुसार फल मिलना चाहिए। यदि सभी बिना किसी भेद के केवल दर्शन मात्र से समस्त पापों से मुक्त हो जाएंगे, तो धर्म व्यवस्था का संतुलन प्रभावित होगा।
भगवान जगन्नाथ ने धर्मराज की बात को गंभीरता से सुना। उन्होंने यमराज को आश्वस्त किया कि उनकी व्यवस्था और दायित्व कभी समाप्त नहीं होंगे। भगवान ने कहा कि उनके दर्शन का फल श्रद्धा, भक्ति और भगवान की कृपा पर आधारित है, जबकि यमराज का कार्य जीवों के कर्मों के अनुसार न्याय करना है। दोनों व्यवस्थाएं अपने-अपने स्थान पर बनी रहेंगी।
तीसरी सीढ़ी पर यमराज को मिला स्थान
पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ ने धर्मराज यम को अपने मंदिर के सिंहद्वार की तीसरी सीढ़ी पर स्थान प्रदान किया। यही तीसरी सीढ़ी आगे चलकर यम शिला के नाम से प्रसिद्ध हुई। कहा जाता है कि भगवान ने यमराज से कहा कि जो भी भक्त उनके धाम में प्रवेश करेगा, वह इस स्थान का सम्मान करेगा। इस कारण यह परंपरा प्रारंभ हुई कि भक्त तीसरी सीढ़ी पर पैर नहीं रखेंगे, बल्कि उसे लांघकर मंदिर में प्रवेश करेंगे। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह सम्मान स्वयं धर्मराज यम को समर्पित माना जाता है। इसी कारण आज भी लाखों श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश करते समय तीसरी सीढ़ी को स्पर्श करने से बचते हैं।
यम शिला को लेकर क्या है धार्मिक मान्यता?
पुरी की परंपरा के अनुसार यम शिला केवल एक साधारण पत्थर या सीढ़ी नहीं मानी जाती। इसे धर्मराज यम का प्रतीक स्थान माना जाता है। श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश करते समय इस सीढ़ी के सामने श्रद्धा प्रकट करते हैं और फिर उसे लांघकर आगे बढ़ते हैं। माना जाता है कि यह परंपरा भगवान जगन्नाथ द्वारा धर्मराज को दिए गए सम्मान की स्मृति में निभाई जाती है। इसलिए मंदिर आने वाले श्रद्धालु इसे सदियों पुरानी धार्मिक मर्यादा मानकर उसका पालन करते हैं।
बाइस पहाचा का धार्मिक महत्व