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Gundicha Mandir: गुंडिचा मंदिर का रहस्य, जानें क्यों भगवान जगन्नाथ हर साल इस मंदिर में आते हैं?

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Gundicha Mandir:  हर वर्ष रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने मुख्य मंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर में नौ दिनों तक निवास करते हैं।

Gundicha Mandir
Gundicha Mandir: ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर जितना प्रसिद्ध है, उतना ही रहस्यमय है गुंडिचा मंदिर। हर वर्ष रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने मुख्य मंदिर से निकलकर इसी गुंडिचा मंदिर में नौ दिनों तक निवास करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इस मंदिर का क्या रहस्य है? भगवान केवल नौ दिनों के लिए ही यहां क्यों आते हैं? आइए जानते हैं गुंडिचा मंदिर से जुड़े धार्मिक, पौराणिक और आध्यात्मिक रहस्यों के बारे में।

गुंडिचा मंदिर क्या है?

गुंडिचा मंदिर पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। रथ यात्रा का अंतिम पड़ाव यही मंदिर होता है। मान्यता है कि यह मंदिर भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर नहीं, बल्कि उनकी जन्मस्थली और लीला-स्थली माना जाता है। हालांकि लोक परंपरा में इसे "मौसी घर" भी कहा जाता है, लेकिन वास्तव में मौसी का मंदिर अलग है, जिसे अर्धाशिनी (मौसी मां) मंदिर कहा जाता है।

गुंडिचा नाम कैसे पड़ा?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी का नाम रानी गुंडिचा था। जब भगवान जगन्नाथ की दिव्य मूर्तियों की स्थापना हुई, तब रानी गुंडिचा ने भगवान से प्रार्थना की कि वे प्रत्येक वर्ष कुछ समय उनके महल में भी निवास करें। भगवान ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर यह वरदान दिया कि वे हर वर्ष रथ यात्रा के दौरान नौ दिनों तक उनके भवन में रहेंगे। इसी कारण इस स्थान का नाम गुंडिचा मंदिर पड़ा।

भगवान केवल 9 दिनों के लिए ही क्यों आते हैं?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों को यह संदेश देते हैं कि ईश्वर किसी एक स्थान तक सीमित नहीं हैं। वे समय-समय पर अपने भक्तों के बीच आते हैं और उनके प्रेम को स्वीकार करते हैं।दूसरी मान्यता के अनुसार, नौ दिन का यह प्रवास भगवान श्रीकृष्ण की वृंदावन लीलाओं का प्रतीक है। कई वैष्णव परंपराएं मानती हैं कि जगन्नाथ मंदिर द्वारका का प्रतीक है जबकि गुंडिचा मंदिर वृंदावन का। भगवान हर वर्ष अपने प्रिय भक्तों और गोपियों की स्मृति में वृंदावन स्वरूप गुंडिचा मंदिर आते हैं।

गुंडिचा मंदिर का आध्यात्मिक रहस्य

गुंडिचा मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि आध्यात्मिक प्रतीक भी है।शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य का हृदय यदि अहंकार, क्रोध और लोभ से मुक्त हो जाए, तो वही भगवान का निवास बन जाता है। रथ यात्रा से पहले जिस प्रकार गुंडिचा मंदिर की विशेष सफाई की जाती है, उसे गुंडिचा मार्जन कहा जाता है।इस परंपरा का संदेश है कि जैसे मंदिर को स्वच्छ करके भगवान का स्वागत किया जाता है, उसी प्रकार अपने मन को भी शुद्ध करना चाहिए ताकि उसमें ईश्वर का वास हो सके। रथ यात्रा से पहले हजारों भक्त मिलकर पूरे मंदिर की सफाई करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।भक्ति परंपरा में इसे बाहरी सफाई से अधिक आंतरिक शुद्धि का प्रतीक माना गया है। कहा जाता है कि जब मन निर्मल होता है, तभी भगवान उसमें प्रवेश करते हैं।

क्या गुंडिचा मंदिर वास्तव में मौसी का घर है?

अधिकांश लोग गुंडिचा मंदिर को भगवान की मौसी का घर मानते हैं, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है।असल में रथ यात्रा के दौरान भगवान जब गुंडिचा मंदिर जाते हैं, तब लौटते समय वे रास्ते में स्थित मौसी मां मंदिर में रुकते हैं। वहां उन्हें विशेष रूप से पोडा पीठा नामक पारंपरिक प्रसाद अर्पित किया जाता है।इसलिए गुंडिचा मंदिर और मौसी मां मंदिर दोनों अलग-अलग स्थान हैं।

मंदिर की वास्तुकला भी है रहस्यमयी

गुंडिचा मंदिर का निर्माण कलिंग शैली में हुआ है। यह मंदिर साधारण दिखने के बावजूद अत्यंत पवित्र माना जाता है।रथ यात्रा के अलावा पूरे वर्ष यह मंदिर लगभग खाली रहता है। केवल उन्हीं नौ दिनों में यहां विशेष पूजा, आरती और दर्शन होते हैं।यह अपने आप में अनोखी परंपरा है कि इतना महत्वपूर्ण मंदिर वर्षभर शांत रहता है और केवल रथ यात्रा के समय ही जीवंत हो उठता है।

हेरा पंचमी से जुड़ा रहस्य

जब भगवान जगन्नाथ गुंडिचा मंदिर में रहते हैं, तब पांचवें दिन माता लक्ष्मी भगवान को वापस बुलाने के लिए यहां आती हैं। इस उत्सव को हेरा पंचमी कहा जाता है।कथा के अनुसार, भगवान तुरंत वापस नहीं लौटते, जिससे माता लक्ष्मी नाराज़ हो जाती हैं और प्रतीकात्मक रूप से भगवान के रथ को थोड़ा नुकसान पहुंचाकर वापस चली जाती हैं।यह लीला भगवान और माता लक्ष्मी के मधुर दांपत्य संबंध तथा भक्ति के भाव को दर्शाती है।

बहुदा यात्रा का महत्व

नौ दिन पूरे होने के बाद भगवान पुनः अपने मुख्य मंदिर की ओर लौटते हैं। इस यात्रा को बहुदा यात्रा कहा जाता है।वापसी के समय भगवान मौसी मां मंदिर में रुकते हैं और पोडा पीठा का भोग ग्रहण करते हैं। इसके बाद वे श्रीमंदिर लौटकर सुना वेश धारण करते हैं, जिसमें भगवान स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत होते हैं।

गुंडिचा मंदिर हमें क्या संदेश देता है?

गुंडिचा मंदिर केवल एक धार्मिक स्थान नहीं, बल्कि जीवन का गहरा संदेश भी देता है।ईश्वर केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि निर्मल हृदय में निवास करते हैं।बाहरी सफाई के साथ मन की शुद्धि भी आवश्यक है।भगवान अपने भक्तों के प्रेम से बंधे होते हैं।रथ यात्रा हमें सिखाती है कि ईश्वर स्वयं भक्तों के बीच आने के लिए उत्सुक रहते हैं।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

 

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