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Grishneshwar Jyotirlinga: कहां स्थित है भगवान शिव का अंतिम ज्योतिर्लिंग? जानिए घृष्णेश्वर मंदिर का इतिहास

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी
सार

Grishneshwar Jyotirlinga: घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग को घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में अंतिम और अत्यंत पवित्र माना जाता है।

घृष्णेश्वर मंदिर
Grishneshwar Jyotirlinga: घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग को घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में अंतिम और अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में विश्व प्रसिद्ध एलोरा गुफाओं के नजदीक वेरुल गांव में येलगंगा नदी के तट पर स्थित है। भगवान शिव को समर्पित यह तीर्थ स्थल न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि अपनी अनूठी वास्तुकला, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और चमत्कारों की कथाओं के लिए भी प्रसिद्ध है। आइए, इस मंदिर के इतिहास के बारे में जानते हैं।

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। हालांकि, इसकी स्थापना की सटीक तिथि अज्ञात है। पुराणों में इसका उल्लेख शिव पुराण, स्कंद पुराण और रामायण जैसे ग्रंथों में मिलता है। माना जाता है कि यह मंदिर 3,000 वर्षों से भी अधिक पुराना है। मध्यकाल में विशेष रूप से 13वीं-14वीं शताब्दी मे दिल्ली सल्तनत और मुगल शासकों के आक्रमणों के कारण मंदिर को कई बार क्षति पहुंची। फिर भी इसकी पवित्रता और भक्ति ने इसे बार-बार पुनर्जनन दिया। 16वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी के दादा मालोजी भोसले ने एक मंदिर का फिर से निर्माण करवाया।

मंदिर की स्थापना और निर्माण कथा

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की कथा शिव पुराण में वर्णित है और यह भक्त घुश्मा की भक्ति से जुड़ी है। कथा के अनुसार, देवगिरी पर्वत के समीप सुधर्मा नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहता था। दोनों निसंतान होने के कारण दुखी थे। सुदेहा ने अपने पति का विवाह अपनी छोटी बहन घुश्मा से करवाया। घुश्मा भगवान शिव की परम भक्त थी और प्रतिदिन 101 मिट्टी के शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा करती थी। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे पुत्र रत्न प्रदान किया, लेकिन सुदेहा को घुश्मा के पुत्र से ईर्ष्या हुई और उसने बच्चे की हत्या कर दी, जिसका शव उसने उसी सरोवर में फेंक दिया जहां घुश्मा शिवलिंग विसर्जित करती थी। घुश्मा ने अपनी भक्ति नहीं छोड़ी और भगवान शिव ने उसकी प्रार्थना पर उसके पुत्र को पुनर्जनन दिया। साथ ही, शिव ने घुश्मा की भक्ति के सम्मान में स्वयं ज्योतिर्लिंग के रूप में वहां निवास करने का वरदान दिया। इस कारण यह ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर या घृष्णेश्वर के नाम से विख्यात हुआ, जिसका अर्थ है- करुणा का स्वामी।

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मूर्ति की विशेषता

घृष्णेश्वर मंदिर का मुख्य आकर्षण इसका स्वयंभू शिवलिंग है, जो गर्भगृह में पूर्वमुखी दिशा में स्थापित है। यह शिवलिंग अन्य ज्योतिर्लिंगों की तुलना में छोटा है, लेकिन इसकी आध्यात्मिक शक्ति अपार मानी जाती है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर हिंदू पौराणिक कथाओं के देवी-देवताओं की नक्काशी और मूर्तियां हैं। गर्भगृह के बाहर भगवान शिव के वाहन नंदी की मूर्ति विराजमान है, जो भक्तों को दर्शन के समय आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है। माना जाता है कि सूर्यदेव स्वयं इस शिवलिंग की प्रथम पूजा करते हैं, जिससे इसे विशेष महत्व प्राप्त है।

चमत्कार और मान्यताएं

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग को चमत्कारों का केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि जो निसंतान दंपति सूर्योदय से पहले मंदिर के समीप शिवालय तीर्थ सरोवर के दर्शन के बाद ज्योतिर्लिंग की पूजा करते हैं, उनकी संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है। इसके अलावा, यह भी विश्वास है कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन से भक्तों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। साथ ही उन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। आदि शंकराचार्य ने कहा था कि कलियुग में इस ज्योतिर्लिंग का स्मरण मात्र रोग, दोष और दुखों से मुक्ति दिलाता है। शिवालय तीर्थ सरोवर को गंगा की सहायक नदी माना जाता है और बिना इसके दर्शन के ज्योतिर्लिंग की यात्रा अधूरी मानी जाती है। भक्तों का मानना है कि इस मंदिर की यात्रा सभी 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का पुण्य प्रदान करती है।

मंदिर की वास्तुकला और स्थापत्य कला

घृष्णेश्वर मंदिर दक्षिण भारतीय और हेमाडपंती वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है और इसका क्षेत्रफल लगभग 44,400 वर्ग फुट है, जो इसे सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग मंदिर बनाता है। मंदिर का पांच-स्तरीय शिखर जटिल नक्काशी से सजा है, जिसमें भगवान शिव की कथाएं और भगवान विष्णु के दशावतारों को दर्शाया गया है।
मंदिर में तीन प्रवेश द्वार हैं, जिनमें से एक महाद्वार और दो पक्षद्वार हैं। सभामंडप में 24 खंभे हैं, जिन पर पौराणिक कथाओं की नक्काशी की गई है। गर्भगृह का क्षेत्रफल लगभग 289 वर्ग फुट है और यह पूर्व की ओर मुख किए हुए है। मंदिर की दीवारों और छत पर की गई शिल्पकारी इतनी मनमोहक है कि यह पुरातत्व और स्थापत्य कला के प्रेमियों को भी आकर्षित करती है। मंदिर का परिसर सादगी और भव्यता का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।

प्रमुख त्योहार और उत्सव

घृष्णेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है, जो फरवरी या मार्च में मनाया जाता है। इस दौरान लाखों भक्त भगवान शिव के दर्शन के लिए यहां आते हैं। सावन मास में भी मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ती है, क्योंकि यह महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना जाता है। अन्य प्रमुख उत्सवों में श्रावण सोमवार, हरियाली तीज और शिवरात्रि शामिल हैं। इन अवसरों पर मंदिर को फूलों और दीपों से सजाया जाता है और विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है।

दर्शन की परंपरा और विधि

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन की परंपरा में कुछ विशेष नियम हैं। पुरुष भक्तों को गर्भगृह में प्रवेश के लिए ऊपरी वस्त्र उतारना होता है। दर्शन से पहले शिवालय तीर्थ सरोवर के दर्शन की सलाह दी जाती है। भक्त जल, दूध, बेलपत्र और फूलों से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं। मंगला आरती, महाप्रसाद और संध्या आरती में भाग लेना भी भक्तों के लिए विशेष माना जाता है। भक्तों को शुद्ध मन और श्रद्धा के साथ पूजा करने की सलाह दी जाती है।

दर्शन का समय और व्यवस्था

मंदिर में दर्शन का समय सुबह 5:30 बजे से रात 10:30 बजे तक है। मंगला आरती सुबह 4 बजे, महाप्रसाद दोपहर 12 बजे से दोपहर 1:30 बजे, संध्या आरती शाम 7:30 बजे और रात्रि आरती रात 10:30 बजे होती है। महाशिवरात्रि और सावन जैसे विशेष अवसरों पर भक्तों की भीड़ को संभालने के लिए अतिरिक्त व्यवस्था की जाती है। मंदिर परिसर में पीने का पानी, जूता स्टोर, पार्किंग और सीसीटीवी सुरक्षा जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

कैसे पहुंचे घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

घृष्णेश्वर मंदिर औरंगाबाद से लगभग 30 किमी और दौलताबाद से 11 किमी दूर है। औरंगाबाद का चिकलथाना हवाई अड्डा निकटतम हवाई अड्डा है, जो मंदिर से लगभग 40 किमी दूर है। यहां से टैक्सी या कैब उपलब्ध हैं। औरंगाबाद रेलवे स्टेशन मंदिर से 38 किमी दूर है। मनमाड जंक्शन भी एक प्रमुख रेलवे स्टेशन है, जहां से औरंगाबाद के लिए कई ट्रेनें उपलब्ध हैं। औरंगाबाद से मंदिर तक बस, टैक्सी या ऑटो रिक्शा से आसानी से पहुंचा जा सकता है। मुंबई और पुणे से भी सीधी बस सेवाएं उपलब्ध हैं।

ऑनलाइन दर्शन और सुविधाएं

आधुनिक तकनीक के युग में घृष्णेश्वर मंदिर ने ऑनलाइन दर्शन की सुविधा शुरू की है। मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट और कुछ धार्मिक ऐप्स जैसे भक्ति-भारत के माध्यम से भक्त घर बैठे दर्शन और पूजा बुक कर सकते हैं। ऑनलाइन पूजा बुकिंग के लिए प्लेटफॉर्म भी उपलब्ध हैं, जहां भक्त अपने नाम, पूजा स्थान और समय के आधार पर पंडित बुक कर सकते हैं। मंदिर में सीसीटीवी निगरानी, स्वच्छता और पार्किंग जैसी सुविधाएं भी भक्तों के लिए उपलब्ध हैं।

सामाजिक और धार्मिक सेवाएं

घृष्णेश्वर मंदिर न केवल धार्मिक केंद्र है, बल्कि सामाजिक सेवाओं में भी योगदान देता है। मंदिर ट्रस्ट द्वारा भक्तों के लिए भोजन, पेयजल और आवास की व्यवस्था की जाती है। विशेष अवसरों पर अन्नदान और वस्त्रदान जैसे कार्य किए जाते हैं। मंदिर परिसर में स्थानीय समुदाय के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं, जो सामाजिक एकता को बढ़ावा देते हैं।

मंदिर के आसपास दर्शनीय स्थल

एलोरा गुफाएं: मंदिर से मात्र 500 मीटर दूर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, जो हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म के मंदिरों और मूर्तियों का अनूठा समूह है।
अजंता गुफाएं: औरंगाबाद से 110 किमी दूर प्राचीन बौद्ध कला और चित्रकारी के लिए प्रसिद्ध है।
बीबी का मकबरा: औरंगाबाद में ताजमहल की अनुकृति, जो मुगल वास्तुकला का नमूना है।
दौलताबाद किला: मंदिर से 20 किमी दूर मध्यकालीन भारत का ऐतिहासिक किला।
भद्र मारुती मंदिर: खुल्दाबाद में हनुमान जी का मंदिर है, जहां उनकी मूर्ति शयन मुद्रा में है।
सोनेरी महल: औरंगाबाद में एक राजपूत महल है, जो अब संग्रहालय के रूप में है।
सिद्धार्थ गार्डन और सलीम अली झील: प्राकृतिक सौंदर्य और शांति के लिए उत्तम स्थान है। 

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