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Lete Hanuman Temple: इस मंदिर में लेटी हुई मुद्रा में हैं हनुमान जी, जानिए क्या है लेटे हनुमान मंदिर का इतिहास

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी
सार

Lete Hanuman Ji Temple: प्रयागराज, जिसे तीर्थराज के नाम से जाना जाता है, वह भारत का एक प्रमुख धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र है। 

Lete Hanuman Ji Temple
Lete Hanuman Ji Temple: प्रयागराज, जिसे तीर्थराज के नाम से जाना जाता है, वह भारत का एक प्रमुख धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम स्थल पर बसा यह शहर न केवल अपनी त्रिवेणी के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां स्थित लेटे हनुमान मंदिर भी भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। यह मंदिर विश्व में अपनी तरह का इकलौता मंदिर है, जहां भगवान हनुमान की प्रतिमा लेटी हुई मुद्रा में स्थापित है। इस मंदिर की पौराणिक कथाएं चमत्कार और ऐतिहासिक महत्व इसे हिंदू भक्तों के लिए एक विशेष तीर्थ स्थल बनाते हैं। आइए, इस मंदिर की कहानी, महत्व और इससे जुड़े रोचक तथ्यों के बारे में जानते हैं।

लेटे हनुमान मंदिर का परिचय 

प्रयागराज के संगम तट के समीप दारागंज क्षेत्र में स्थित लेटे हनुमान मंदिर एक प्राचीन और पवित्र तीर्थस्थल है। इसे बड़े हनुमान मंदिर, किले के हनुमान मंदिर, और बांध के हनुमान मंदिर जैसे नामों से भी जाना जाता है। इस मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता है हनुमान जी की 20 फीट लंबी दक्षिणमुखी मूर्ति, जो लेटी हुई अवस्था में स्थापित है। साथ ही, हनुमान जी के दाहिने हाथ में भगवान राम और लक्ष्मण की आकृति तथा बाएं हाथ में गदा सुशोभित है। यह मंदिर न केवल अपनी विशिष्ट मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करने और चमत्कारों के लिए भी विख्यात है।

लेटे हनुमान मंदिर की पौराणिक कथाएं

लेटे हनुमान मंदिर से जुड़ी कई पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएं प्रचलित हैं, जो इसके महत्व को बढ़ाती है।

1. लंका विजय और माता सीता का आशीर्वाद 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान राम ने लंका पर विजय प्राप्त की और हनुमान जी अयोध्या लौट रहे थे, तब वे संगम तट पर रुके। लंबी यात्रा और राक्षसों से युद्ध के कारण वे अत्यधिक थक गए थे। माता सीता ने उनकी थकान देखकर उन्हें संगम तट पर विश्राम करने को कहा। हनुमान जी ने माता सीता की आज्ञा का पालन करते हुए यहां लेटकर विश्राम किया। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, लंका विजय के बाद हनुमान जी मरणासन्न अवस्था में थे, तब माता सीता ने उन्हें अपना सिंदूर देकर जीवनदान दिया और हमेशा आरोग्य रहने का आशीर्वाद दिया। इस कारण इस मंदिर में हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा आज भी कायम है।

2. कन्नौज के राजा ने करवाया मूर्ति का निर्माण 

एक अन्य किंवदंती के अनुसार, यह मंदिर लगभग 600 से 700 वर्ष पुराना है। कन्नौज के एक राजा को जब संतान सुख की प्राप्ति नहीं हो रही थी, तब उनके गुरु ने उन्हें सलाह दी कि वे हनुमान जी की एक ऐसी मूर्ति बनवाएं, जो राम और लक्ष्मण को नागपाश से मुक्त करने के लिए पाताल लोक गए थे। राजा ने विंध्याचल पर्वत से इस मूर्ति को तैयार करवाया और इसे नाव के माध्यम से लाने का प्रयास किया, लेकिन संगम तट पर नाव क्षतिग्रस्त हो गई और मूर्ति गंगा के जल में डूब गई। कई सालों बाद जब गंगा का जलस्तर कम हुआ, तब राम भक्त बाबा बालगिरी महाराज को यह मूर्ति प्राप्त हुई। इसके पश्चात वहां के राजा ने इस पवित्र मूर्ति के लिए एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।

3. अकबर और हनुमान जी का चमत्कार

मुगल शासक अकबर के समय यानी 1582 के आसपास की एक कथा भी इस मंदिर से जुड़ी है। अकबर ने प्रयागराज में किला बनवाने की योजना बनाई और हनुमान जी की इस प्रतिमा को किले के भीतर ले जाना चाहा। उसने अपने सैनिकों को प्रतिमा हटाने का आदेश दिया, लेकिन सैकड़ों सैनिकों के अथक प्रयास के बावजूद प्रतिमा टस से मस नहीं हुई। कहा जाता है कि प्रतिमा जितना उठाने की कोशिश की जाती थी, वह उतना ही धरती में धंसती चली गई। आखिरकार अकबर को स्वप्न में हनुमान जी के दर्शन हुए, जिन्होंने उसे प्रतिमा हटाने से मना किया। इस चमत्कार से प्रभावित होकर अकबर ने हार मान ली और मंदिर को यथास्थान रहने दिया। उसने किले की दीवार मंदिर के पीछे बनवाई और हनुमान जी के लिए जमीन समर्पित की।

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