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Raksha Bandhan: कैसे शुरू हुई भाई की कलाई पर राखी बांधने की परंपरा? जानिए इसके पीछे की पौराणिक कहानी

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Raksha Bandhan 2026: रक्षाबंधन का पर्व केवल भाई-बहन के प्रेम तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसके पीछे रक्षा के पवित्र संकल्प की भावना भी जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन समय से ही किसी को रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा रही है।

Raksha Bandhan 2026
Raksha Bandhan 2026: रक्षाबंधन का त्योहार आते ही घरों में राखियों की खरीदारी शुरू हो जाती है। बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं, माथे पर तिलक लगाती हैं और उसकी लंबी उम्र व सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। इसके बाद भाई भी बहन की रक्षा का वचन देते हुए उसे उपहार देता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर भाई की कलाई पर राखी बांधने की परंपरा शुरू कैसे हुई? इसके पीछे कौन-सी पौराणिक कथा जुड़ी है? आइए जानते हैं रक्षाबंधन से जुड़ी इस परंपरा की कहानी...

रक्षाबंधन का धार्मिक महत्व

रक्षाबंधन का पर्व केवल भाई-बहन के प्रेम तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसके पीछे रक्षा के पवित्र संकल्प की भावना भी जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन समय से ही किसी को रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा रही है। इसे शुभता, सुरक्षा और मंगलकामना का प्रतीक माना जाता था। समय के साथ यही रक्षा सूत्र भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ गया और रक्षाबंधन के रूप में मनाया जाने लगा। हालांकि, इस त्योहार की शुरुआत को लेकर अलग-अलग पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं।

 

Rakshabandhan 2026

भगवान कृष्ण और द्रौपदी की कथा

रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कहानी बताई जाती है। महाभारत से जुड़ी मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान कृष्ण की उंगली में चोट लग गई थी और उससे रक्त निकलने लगा। यह देखकर द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया। द्रौपदी के इस स्नेह और अपनत्व को देखकर श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनी बहन का स्थान दिया और उनकी रक्षा का वचन दिया।

बाद में जब कौरवों की सभा में द्रौपदी का अपमान किया गया, तब भगवान कृष्ण ने उनकी लाज की रक्षा की। धार्मिक मान्यता में इस प्रसंग को भाई-बहन के रिश्ते और रक्षा के संकल्प से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि द्रौपदी द्वारा कृष्ण की उंगली पर कपड़ा बांधने वाली कथा की अलग-अलग लोक और धार्मिक परंपराओं में अलग व्याख्याएं मिलती हैं।

इंद्र और इंद्राणी की मान्यता

रक्षाबंधन की परंपरा से जुड़ी एक अन्य पौराणिक कथा देवराज इंद्र और उनकी पत्नी इंद्राणी से संबंधित है। मान्यता के अनुसार, एक समय देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। इस युद्ध में देवताओं को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा था, तब इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उनके लिए विजय व सुरक्षा की कामना की। इसके बाद इंद्र युद्ध के लिए गए और उन्हें विजय प्राप्त हुई।

 

Raksha Bandhan 2026

राजा बलि और माता लक्ष्मी की कथा

रक्षाबंधन से जुड़ी एक कथा भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि से भी जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु जब राजा बलि को दिए गए वचन के कारण उनके साथ पाताल लोक में रहने लगे, तब माता लक्ष्मी उन्हें वापस लाने के लिए वहां पहुंचीं। माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधा और उन्हें अपना भाई माना। इसके बाद उन्होंने भगवान विष्णु को अपने साथ ले जाने की इच्छा व्यक्त की। राजा बलि ने बहन की भावना का सम्मान करते हुए भगवान विष्णु को उनके साथ जाने की अनुमति दे दी। इसी कथा के आधार पर कुछ परंपराओं में रक्षाबंधन को भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और रक्षा के वचन से जोड़ा जाता है।

राखी को क्यों माना जाता है रक्षा सूत्र?

राखी शब्द का संबंध ही रक्षा से माना जाता है। पुराने समय में रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा धार्मिक अनुष्ठानों में भी देखने को मिलती है। पूजा-पाठ और शुभ कार्यों के दौरान भी कलाई पर मौली या कलावा बांधा जाता है। इसी रक्षा सूत्र की परंपरा ने आगे चलकर भाई-बहन के रिश्ते में एक खास रूप ले लिया। बहन जब भाई की कलाई पर राखी बांधती है तो वह उसके सुख, स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना करती है। वहीं भाई बहन की रक्षा और हर परिस्थिति में उसका साथ देने का संकल्प लेता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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