Nagchandreshwar Temple: उज्जैन को भगवान महाकाल की नगरी कहा जाता है। यहां स्थित महाकालेश्वर मंदिर से जुड़ी कई ऐसी धार्मिक परंपराएं हैं, जिनका रहस्य आज भी श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इन्हीं में से एक है महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसके कपाट पूरे साल में केवल एक दिन, नागपंचमी के अवसर पर ही खोले जाते हैं। इस दिन भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए देशभर से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं। आखिर इस मंदिर के कपाट सालभर बंद क्यों रहते हैं? यहां विराजमान भगवान शिव की प्रतिमा की क्या विशेषता है? और नागपंचमी के दिन ही दर्शन देने की यह परंपरा कब से चली आ रही है? आइए जानते हैं नागचंद्रेश्वर मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं और धार्मिक रहस्य...
महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर है मंदिर
नागचंद्रेश्वर मंदिर, उज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर परिसर में स्थित है। यह मंदिर महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर है। यहां भगवान शिव नागचंद्रेश्वर स्वरूप में विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्रतिमा अपने आप में बेहद विशेष मानी जाती है, क्योंकि इसमें भगवान शिव को नागराज के आसन पर विराजमान देखा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव के इस स्वरूप के दर्शन करने का विशेष महत्व है। यही वजह है कि नागपंचमी के दिन जब मंदिर के कपाट खुलते हैं, तब यहां दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतार लग जाती है।
साल में सिर्फ एक दिन खुलते हैं कपाट
नागचंद्रेश्वर मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसके कपाट खोलने की परंपरा है। यह मंदिर सामान्य दिनों में बंद रहता है और वर्ष में केवल नागपंचमी के दिन ही श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोला जाता है। नागपंचमी के अवसर पर मंदिर के कपाट विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक विधियों के बाद खोले जाते हैं। इसके बाद श्रद्धालु भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करते हैं। दर्शन का यह अवसर बेहद खास माना जाता है, क्योंकि पूरे वर्ष में भक्तों को इस मंदिर के दर्शन के लिए केवल इसी दिन का इंतजार रहता है।
भगवान शिव के साथ विराजमान हैं नागराज
नागचंद्रेश्वर मंदिर में स्थापित प्रतिमा की एक खास बात यह है कि इसमें भगवान शिव और माता पार्वती नागराज के ऊपर विराजमान दिखाई देते हैं। धार्मिक मान्यता में भगवान शिव का नागों से विशेष संबंध माना गया है। भगवान शिव के गले में नागराज वासुकि के विराजमान होने का वर्णन भी पौराणिक कथाओं में मिलता है। नागचंद्रेश्वर स्वरूप में भगवान शिव का नाग के साथ विराजमान होना इसी धार्मिक परंपरा को विशेष रूप से दर्शाता है। नागपंचमी के दिन इस स्वरूप के दर्शन को भक्त अत्यंत शुभ मानते हैं।
प्रतिमा से जुड़ी है प्राचीन मान्यता
नागचंद्रेश्वर मंदिर की प्रतिमा को लेकर एक प्राचीन धार्मिक मान्यता भी प्रचलित है। कहा जाता है कि यह प्रतिमा नेपाल से लाई गई थी। इसमें भगवान शिव और माता पार्वती नाग के आसन पर विराजमान हैं और उनके ऊपर नाग का फन बना हुआ है। पौराणिक परंपराओं में नागों को भगवान शिव का प्रिय माना गया है। इसी कारण नागपंचमी के दिन नाग देवता और भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है। नागचंद्रेश्वर मंदिर में इसी धार्मिक स्वरूप के दर्शन को विशेष फलदायी माना जाता है।
कपाट बंद रखने की परंपरा क्यों?
नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट सालभर बंद रखने को लेकर धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है। मान्यता है कि नागचंद्रेश्वर भगवान वर्षभर तपस्या में लीन रहते हैं और नागपंचमी के दिन ही उनके दर्शन का अवसर मिलता है। इसी धार्मिक विश्वास के कारण मंदिर के कपाट सामान्य दिनों में नहीं खोले जाते। नागपंचमी के दिन विशेष पूजा के बाद कपाट खोले जाते हैं और श्रद्धालुओं को भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन कराए जाते हैं। पूजा पूरी होने के बाद मंदिर के कपाट फिर से बंद कर दिए जाते हैं।
नागपंचमी पर उमड़ता है भक्तों का सैलाब
नागपंचमी के दिन उज्जैन में नागचंद्रेश्वर मंदिर के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस दिन महाकाल मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं और भगवान नागचंद्रेश्वर की पूजा की जाती है। श्रद्धालु भगवान शिव और नागराज को दूध, जल, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करते हैं। मंदिर में विशेष पूजा और अभिषेक के बाद भक्तों को दर्शन का अवसर मिलता है।
नागपंचमी से क्यों जुड़ा है मंदिर?
हिंदू धर्म में सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नाग देवताओं की पूजा की जाती है। भगवान शिव की पूजा में भी नागों का विशेष स्थान होने के कारण नागपंचमी का संबंध शिव उपासना से गहराई से जुड़ा माना जाता है। ऐसे में नागचंद्रेश्वर मंदिर में भगवान शिव के नाग स्वरूप के दर्शन का महत्व और बढ़ जाता है। नागपंचमी के दिन यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु भगवान नागचंद्रेश्वर की पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
महाकाल की नगरी में अनोखी धार्मिक परंपरा
उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसी मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के कारण देशभर में प्रसिद्ध है। सालभर में केवल एक दिन कपाट खुलना और उसी दिन हजारों-लाखों श्रद्धालुओं का दर्शन के लिए पहुंचना इस मंदिर को और विशेष बनाता है। नागपंचमी के अवसर पर जब मंदिर के कपाट खुलते हैं, तब श्रद्धालुओं को भगवान शिव के नागचंद्रेश्वर स्वरूप के दर्शन होते हैं। यही वह दुर्लभ दर्शन है, जिसका भक्त पूरे साल इंतजार करते हैं।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)