Narak Chaturdashi: दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। इसे छोटी दिवाली और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नरक चतुर्दशी पर तिल के तेल से शरीर की मालिश करने के बाद स्नान करना बेहद शुभ माना जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस दिन स्नान के लिए तिल के तेल का ही इस्तेमाल क्यों किया जाता है? इसके पीछे कौन सी धार्मिक मान्यता जुड़ी है? आइए जानते हैं नरक चतुर्दशी पर तिल के तेल से स्नान करने का महत्व।
नरक चतुर्दशी पर तिल के तेल से स्नान क्यों?
हिंदू धर्म में तिल के तेल को धार्मिक रूप से पवित्र और शुभ माना गया है। नरक चतुर्दशी के दिन तिल के तेल से शरीर की मालिश करने के बाद स्नान करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन सूर्योदय से पहले शरीर पर तिल का तेल लगाने और फिर स्नान करने से नकारात्मकता दूर होती है। इसे अभ्यंग स्नान कहा जाता है। मान्यता है कि नरक चतुर्दशी पर अभ्यंग स्नान करने से व्यक्ति को नरक के भय से मुक्ति मिलती है और उसे आरोग्य तथा सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
अभ्यंग स्नान का क्या है महत्व?
नरक चतुर्दशी के दिन किए जाने वाले अभ्यंग स्नान को विशेष फलदायी माना जाता है। इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शरीर पर तिल के तेल की मालिश की जाती है। इसके बाद उबटन लगाकर स्नान किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किया गया स्नान व्यक्ति के तन और मन की शुद्धि का प्रतीक है। इसे केवल शरीर की सफाई से जोड़कर नहीं देखा जाता, बल्कि यह जीवन से बुराइयों और नकारात्मक विचारों को दूर करने का भी प्रतीक माना जाता है। कई स्थानों पर इस दिन स्नान के लिए तिल के तेल के साथ बेसन, हल्दी और सुगंधित उबटन का भी इस्तेमाल किया जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी है मान्यता
नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर के वध की पौराणिक कथा से भी जुड़ा है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, नरकासुर नामक असुर ने देवताओं और ऋषि-मुनियों को परेशान कर रखा था। उसने 16 हजार से अधिक कन्याओं को बंदी बना लिया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसका वध करके बंदी कन्याओं को मुक्त कराया था। मान्यता है कि नरकासुर के वध के बाद लोगों ने स्नान करके उत्सव मनाया था। इसी कारण इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करने की परंपरा प्रचलित हुई। इसे बुराई पर अच्छाई की जीत और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक भी माना जाता है।
तिल के तेल का धार्मिक संबंध
हिंदू धर्म में तिल और तिल के तेल का संबंध पितरों तथा शनिदेव की पूजा से भी माना जाता है। विशेष रूप से तिल का दान और तिल के तेल का दीपक जलाना शुभ माना गया है। नरक चतुर्दशी पर तिल के तेल से स्नान करने की परंपरा को भी धार्मिक शुद्धि और शुभता से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से स्नान करने वाले व्यक्ति को नकारात्मक प्रभावों से रक्षा मिलती है और उसके जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।
नरक चतुर्दशी पर कैसे करें स्नान?