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Narak Chaturdashi: नरक चतुर्दशी क्यों मनाई जाती है? जानें भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर से जुड़ी पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Narak Chaturdashi: धार्मिक कथाओं के अनुसार, नरकासुर को धरती माता यानी देवी भूदेवी का पुत्र माना जाता है। उसे भगवान से कई शक्तियां और वरदान प्राप्त थे, जिसके कारण वह बहुत शक्तिशाली हो गया था।

Narak Chaturdashi
Narak Chaturdashi: दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी हिंदू धर्म में विशेष धार्मिक महत्व रखती है। इसे छोटी दिवाली और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घरों में दीपक जलाने, सूर्योदय से पहले स्नान करने और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राक्षस नरकासुर का वध करके हजारों महिलाओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर से कैसे जुड़ा? आखिर इस दिन को छोटी दिवाली क्यों कहा जाता है? आइए जानते हैं इससे जुड़ी पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व।

नरक चतुर्दशी क्यों मनाई जाती है?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से है। नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुर का राजा था, जिसे भौमासुर के नाम से भी जाना जाता था। शुरुआत में वह शक्तिशाली और पराक्रमी था, लेकिन धीरे-धीरे उसके अंदर अहंकार और अत्याचार की भावना बढ़ने लगी। उसने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करना शुरू कर दिया और देवताओं के साथ-साथ मनुष्यों को भी परेशान करने लगा। उसके अत्याचार इतने बढ़ गए थे कि तीनों लोकों में भय का माहौल बन गया था। इसी अत्याचार से मुक्ति मिलने की खुशी में नरक चतुर्दशी मनाई जाती है।

कौन था नरकासुर?

धार्मिक कथाओं के अनुसार, नरकासुर को धरती माता यानी देवी भूदेवी का पुत्र माना जाता है। उसे भगवान से कई शक्तियां और वरदान प्राप्त थे, जिसके कारण वह बहुत शक्तिशाली हो गया था। शुरुआत में वह एक अच्छा शासक था, लेकिन बाद में बुरी संगति और अहंकार के कारण उसका स्वभाव बदल गया। शक्ति के मद में चूर होकर उसने देवताओं के राजा इंद्र को भी परेशान करना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, उसने देवताओं की माता अदिति के कुंडल छीन लिए और अनेक राजाओं को पराजित कर उनके राज्य में आतंक फैलाया। उसकी सबसे बड़ी क्रूरता यह थी कि उसने 16 हजार से अधिक राजकुमारियों और महिलाओं को बंदी बना लिया था।

भगवान श्रीकृष्ण ने किया नरकासुर का वध

नरकासुर के बढ़ते अत्याचारों से परेशान होकर देवता भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे और उनसे सहायता मांगी। देवताओं ने बताया कि नरकासुर अपनी शक्ति के बल पर निर्दोष लोगों को परेशान कर रहा है और हजारों महिलाओं को बंदी बनाकर रखा है। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का अंत करने का निर्णय लिया। पौराणिक कथा के अनुसार, इस युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण के साथ उनकी पत्नी सत्यभामा भी गई थीं। दोनों ने मिलकर नरकासुर के विरुद्ध युद्ध किया। युद्ध के दौरान नरकासुर ने भगवान श्रीकृष्ण पर कई शक्तिशाली अस्त्रों से हमला किया, लेकिन वह उन्हें पराजित नहीं कर सका। अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध कर दिया। कुछ धार्मिक मान्यताओं में नरकासुर के वध में सत्यभामा की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।

16 हजार महिलाओं को मिली मुक्ति

नरकासुर के अत्याचारों का सबसे दुखद पहलू यह था कि उसने 16 हजार से अधिक महिलाओं को बंदी बनाकर रखा था। वह उन्हें अपने महल में कैद करके रखता था और उन्हें यातनाएं देता था। भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध करने के बाद सभी महिलाओं को उसकी कैद से मुक्त कराया। इसके साथ ही उन्होंने देवताओं को भी नरकासुर के आतंक से छुटकारा दिलाया। भगवान श्रीकृष्ण ने देवताओं की माता अदिति के कुंडल भी वापस दिलाए। इस तरह नरकासुर के अंत के साथ ही अधर्म और अत्याचार का भी अंत हुआ। इसी विजय की स्मृति में नरक चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है।

नरक चतुर्दशी को क्यों कहते हैं छोटी दिवाली?

नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली कहने के पीछे भी धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है। मान्यता है कि नरकासुर के वध के बाद लोगों ने खुशी में दीपक जलाए और भगवान श्रीकृष्ण की विजय का उत्सव मनाया। इसी परंपरा के चलते इस दिन दीपदान किया जाता है। दीपावली से ठीक एक दिन पहले आने के कारण भी इसे छोटी दिवाली कहा जाता है। इस दिन घरों के बाहर और पूजा स्थल पर दीपक जलाए जाते हैं। माना जाता है कि दीपक जलाने से नकारात्मकता दूर होती है और घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।

नरक चतुर्दशी पर स्नान और दीपदान का महत्व

नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले स्नान करने की विशेष परंपरा है। इसे अभ्यंग स्नान भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करने से व्यक्ति को नरक के भय से मुक्ति मिलती है। स्नान के दौरान शरीर पर तिल का तेल लगाने की भी परंपरा है। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। शाम के समय घर के बाहर और पूजा स्थल पर दीपक जलाए जाते हैं। कुछ स्थानों पर यमराज के नाम से भी दीपदान किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।

नरक चतुर्दशी का धार्मिक संदेश

नरक चतुर्दशी की पौराणिक कथा केवल भगवान श्रीकृष्ण की विजय से जुड़ी नहीं है, बल्कि यह अधर्म पर धर्म की जीत का भी संदेश देती है। नरकासुर के अहंकार और अत्याचार का अंत बताता है कि गलत कार्य करने वाला व्यक्ति चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंत में उसकी हार निश्चित होती है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बंदी महिलाओं को मुक्त कराना भी अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और निर्दोष लोगों की रक्षा करने की प्रेरणा देता है। यही वजह है कि नरक चतुर्दशी को हिंदू धर्म में विजय, मुक्ति और प्रकाश का प्रतीक माना जाता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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