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Narak Chaturdashi 2026: कब है नरक चतुर्दशी? जानें छोटी दिवाली की सही तारीख, पूजा मुहूर्त और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Narak Chaturdashi 2026: नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करना विशेष फलदायी माना जाता है। साल 2026 में नई दिल्ली के अनुसार, अभ्यंग स्नान का शुभ मुहूर्त सुबह 5 बजकर 41 मिनट से 6 बजकर 38 मिनट तक रहेगा। 

Narak Chaturdashi
Narak Chaturdashi 2026: दीपावली का त्योहार पांच दिनों तक मनाया जाता है और इसकी शुरुआत धनतेरस से होती है। इस पर्व के दूसरे दिन नरक चतुर्दशी मनाई जाती है, जिसे छोटी दिवाली, रूप चौदस और रूप चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करने और शाम को दीपदान करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि नरक चतुर्दशी के दिन दीपक जलाने और विधि-विधान से पूजा करने से नकारात्मकता दूर होती है। हालांकि, साल 2026 में छोटी दिवाली और नरक चतुर्दशी की तिथि को लेकर लोगों के मन में असमंजस हो सकता है। ऐसे में आइए जानते हैं कि इस साल नरक चतुर्दशी कब मनाई जाएगी, अभ्यंग स्नान का शुभ मुहूर्त क्या रहेगा और इस पर्व का धार्मिक महत्व क्या है।

कब है नरक चतुर्दशी 2026?

हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर, शनिवार को सुबह 10 बजकर 47 मिनट पर शुरू होगी और 8 नवंबर, रविवार को सुबह 11 बजकर 27 मिनट पर समाप्त होगी। इस साल नरक चतुर्दशी का अभ्यंग स्नान 8 नवंबर को किया जाएगा। वहीं, चतुर्दशी तिथि के प्रदोष काल में होने के कारण छोटी दिवाली और यम दीपदान की परंपरा 7 नवंबर की शाम को निभाई जाएगी। इस तरह इस साल छोटी दिवाली के दीपदान और नरक चतुर्दशी के अभ्यंग स्नान के लिए अलग-अलग दिन रहेंगे।

नरक चतुर्दशी 2026 अभ्यंग स्नान मुहूर्त

नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करना विशेष फलदायी माना जाता है। साल 2026 में नई दिल्ली के अनुसार, अभ्यंग स्नान का शुभ मुहूर्त सुबह 5 बजकर 41 मिनट से 6 बजकर 38 मिनट तक रहेगा। इस दौरान श्रद्धालु तिल के तेल से शरीर की मालिश करके उबटन लगाते हैं और फिर स्नान करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस समय स्नान करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और आरोग्य की प्राप्ति होती है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और चंद्रोदय के समय के अनुसार मुहूर्त में अंतर हो सकता है।

छोटी दिवाली पर क्यों जलाए जाते हैं दीपक?

छोटी दिवाली के दिन शाम को घर के मुख्य द्वार और आसपास दीपक जलाने की परंपरा है। इस दिन विशेष रूप से यमराज के निमित्त दीपदान किया जाता है, जिसे यम दीपदान कहते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यमराज के नाम से दीपक जलाने से परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है। कई घरों में इस दिन 14 दीपक जलाने की परंपरा भी निभाई जाती है। मान्यता है कि दीपदान करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव दूर होता है।

नरक चतुर्दशी की पूजा विधि

नरक चतुर्दशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान की तैयारी की जाती है। स्नान से पहले शरीर पर तिल का तेल लगाकर मालिश की जाती है और पारंपरिक रूप से उबटन लगाया जाता है। इसके बाद स्वच्छ जल से स्नान करके साफ वस्त्र धारण किए जाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है और परिवार की सुख-समृद्धि तथा आरोग्य की कामना की जाती है। शाम के समय घर के बाहर दीपक जलाकर यमराज के निमित्त दीपदान किया जाता है। कुछ स्थानों पर इस दिन हनुमान जी की पूजा करने की भी परंपरा है।

नरक चतुर्दशी का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में नरक चतुर्दशी का विशेष महत्व बताया गया है। इसे बुराई पर अच्छाई की जीत और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन अभ्यंग स्नान करने से व्यक्ति को नरक के कष्टों से मुक्ति मिलती है। वहीं, दीपदान करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। इस दिन को रूप चौदस भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि सुबह तेल और उबटन लगाकर स्नान करने से शरीर की शुद्धि होती है और सौंदर्य में निखार आता है।

नरक चतुर्दशी की पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नरकासुर नामक एक शक्तिशाली असुर ने अपने अत्याचारों से तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था। उसने 16 हजार कन्याओं को बंदी बना लिया था। उसके अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता मांगी। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ युद्ध करके नरकासुर का वध किया और बंदी बनाई गई कन्याओं को मुक्त कराया। मान्यता है कि नरकासुर का वध कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन हुआ था। इसी खुशी में लोगों ने दीपक जलाकर उत्सव मनाया, तभी से इस दिन को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाने की परंपरा चली आ रही है।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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