Jitiya Vrat 2026: मां और संतान का रिश्ता अपने आप में बेहद खास होता है। बच्चे की सलामती के लिए मां हर मुश्किल सहने को तैयार रहती है। इसी मातृत्व भावना से जुड़ा है जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे आम बोलचाल में जितिया या जिउतिया व्रत कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माताएं यह व्रत अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से रखती हैं। यह व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है और कई जगह इसे निर्जला व्रत के रूप में रखा जाता है। इस वर्ष यानी 2026 में जितिया व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा। इस व्रत में पूजा के साथ इसकी कथा सुनने और पढ़ने की भी विशेष परंपरा है। आखिर क्या है जितिया व्रत से जुड़ी जीमूतवाहन की कथा और चील-सियारिन की कहानी? आइए जानते हैं जितिया व्रत की पूरी कथा।
क्यों रखा जाता है जितिया व्रत
जितिया व्रत का संबंध संतान की रक्षा और उसके लंबे जीवन की कामना से माना जाता है। धार्मिक परंपरा में इस दिन जीमूतवाहन की पूजा और व्रत कथा का श्रवण किया जाता है। कथा में जीमूतवाहन द्वारा दूसरे की संतान को बचाने के लिए अपना जीवन संकट में डालने का प्रसंग आता है। इसी वजह से उन्हें संतान की रक्षा से जुड़े इस व्रत में विशेष रूप से याद किया जाता है। जितिया व्रत से जुड़ी दो प्रमुख कथाएं सुनाई जाती हैं। पहली कथा राजा जीमूतवाहन, नाग बालक शंखचूड़ और पक्षीराज गरुड़ से जुड़ी है। दूसरी कथा चील और सियारिन की है, जो व्रत में नियम और निष्ठा के महत्व को बताती है।
व्रत कथा- जीमूतवाहन ने बचाई नाग बालक की जान
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय जीमूतवाहन नाम के एक धर्मात्मा और दयालु राजकुमार थे। उन्हें दूसरों की सहायता करने में हमेशा सुख मिलता था। एक दिन वे जंगल की ओर गए। वहां उन्हें एक वृद्धा दिखाई दी, जो बहुत दुखी होकर रो रही थी।
जीमूतवाहन ने उसके रोने का कारण पूछा तो वृद्धा ने बताया कि वह नाग जाति से है और उसका एक पुत्र है। नागों और पक्षीराज गरुड़ के बीच एक पुरानी व्यवस्था के कारण हर दिन एक नाग को गरुड़ के सामने भोजन के रूप में जाना पड़ता था। उस दिन उसके इकलौते पुत्र शंखचूड़ की बारी थी।
अपने पुत्र की मृत्यु की कल्पना से वृद्धा का रो-रोकर बुरा हाल था। वह अपने बेटे को बचाना चाहती थी, लेकिन उसके सामने कोई रास्ता नहीं था। वृद्धा की पीड़ा देखकर जीमूतवाहन का हृदय पिघल गया।
उन्होंने उससे कहा कि वह अपने पुत्र को बचाए और उसकी जगह उन्हें वहां भेज दे। वृद्धा ने बहुत समझाया कि यह उनके लिए जानलेवा हो सकता है, लेकिन जीमूतवाहन अपने निर्णय पर अडिग रहे। उन्होंने कहा कि अगर उनके जीवन से किसी मां की संतान बच सकती है तो इससे बड़ा पुण्य उनके लिए और क्या होगा।
गरुड़ के सामने लेट गए जीमूतवाहन
इसके बाद जीमूतवाहन ने स्वयं को लाल वस्त्र में ढक लिया और उस स्थान पर जाकर लेट गए, जहां गरुड़ नाग को लेने आने वाले थे। कुछ समय बाद पक्षीराज गरुड़ वहां पहुंचे।
गरुड़ ने लाल वस्त्र में लिपटे जीमूतवाहन को नाग समझकर अपने पंजों में उठा लिया और आकाश की ओर उड़ने लगे, लेकिन जीमूतवाहन ने न तो भय दिखाया और न ही अपने बचाव के लिए कोई प्रयास किया।
गरुड़ को कुछ असामान्य लगा। उन्हें आश्चर्य हुआ कि जिसे वे नाग समझकर उठा लाए हैं, वह अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष क्यों नहीं कर रहा है। गरुड़ ने जब उनसे पूछा कि वे कौन हैं, तब जीमूतवाहन ने पूरी बात बता दी। उन्होंने कहा कि वे उस नाग बालक की जगह स्वयं आए हैं, ताकि एक मां अपने बेटे को न खोए।
जीमूतवाहन के त्याग से द्रवित हुए गरुड़
जीमूतवाहन की बात सुनकर गरुड़ उनके त्याग से प्रभावित हुए। उन्हें समझ आया कि यह व्यक्ति अपने लिए नहीं, बल्कि किसी दूसरी मां की संतान को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर आया है।
कथा के अनुसार, गरुड़ ने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया और नागों को भी अभय प्रदान किया। इससे नागों पर मंडरा रहा संकट समाप्त हो गया। जिन नागों के प्राण पहले लिए जा चुके थे, उन्हें भी जीवन मिलने की कथा कही जाती है।
यही वजह है कि जीमूतवाहन को इस व्रत में संतान की रक्षा और दीर्घायु से जोड़कर देखा जाता है। मताएं उनकी पूजा करते हुए अपनी संतान की सलामती और लंबी उम्र की कामना करती हैं।
चील और सियारिन की कथा
जितिया व्रत में चील और सियारिन की कथा भी बड़े भाव से सुनी जाती है। यह कथा व्रत के नियम और उसके प्रति निष्ठा से जुड़ी हुई है।
कहा जाता है कि एक जंगल में एक चील और एक सियारिन रहती थीं। दोनों आपस में अच्छी सखियां थीं। एक दिन उन्होंने कुछ महिलाओं को जितिया व्रत करते और उसकी पूजा-कथा सुनते देखा। महिलाओं को अपनी संतान के लिए व्रत करते देखकर दोनों ने भी यह व्रत रखने का फैसला किया।
दोनों ने व्रत का संकल्प लिया और पूरे दिन बिना अन्न-जल के रहने लगीं। चील ने पूरी श्रद्धा के साथ अपना व्रत जारी रखा। लेकिन रात होते-होते सियारिन को तेज भूख लगने लगी।
भूख के आगे टूट गया सियारिन का व्रत
सियारिन से भूख सहन नहीं हुई। उसने व्रत के नियम तोड़ दिए और रात में भोजन कर लिया। दूसरी ओर चील ने अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी और पूरी निष्ठा के साथ व्रत पूरा किया।
समय बीता और अगले जन्म में दोनों बहनें बनीं। कथा के अनुसार, चील का जन्म शीलवती के रूप में हुआ और सियारिन का जन्म कपुरावती के रूप में। शीलवती का विवाह एक राजा से हुआ, जबकि कपुरावती का विवाह एक मंत्री से हुआ।
शीलवती को सात पुत्र हुए। उसके सभी बच्चे स्वस्थ और जीवित रहे। वहीं कपुरावती की संतानें जन्म लेने के बाद जीवित नहीं रह पाती थीं। अपने जीवन में यह अंतर देखकर कपुरावती के मन में अपनी बहन के प्रति ईर्ष्या पैदा होने लगी।
बहन के सातों पुत्रों पर संकट
कथा के अनुसार, ईर्ष्या में आकर कपुरावती ने शीलवती के सातों पुत्रों को नुकसान पहुंचाने की योजना बनाई। उसके कहने पर शीलवती के सातों पुत्रों के सिर काट दिए गए और उनके कटे हुए सिर एक स्थान पर रख दिए गए।
जब शीलवती को इसकी जानकारी हुई तो वह बहुत दुखी हुई। वह अपने बच्चों के लिए विलाप करने लगी। लेकिन इसी समय जीमूतवाहन की कृपा से उसके सातों पुत्रों को फिर से जीवन मिल गया। कथा के कुछ प्रचलित रूपों में बताया जाता है कि कटे हुए सिरों की जगह फल दिखाई देने लगे और बाद में जीमूतवाहन की कृपा से बच्चे जीवित हो गए।
जब कपुरावती ने यह देखा तो उसे अपने पिछले जन्म की घटना याद आ गई। उसे समझ आया कि पिछले जन्म में व्रत के प्रति उसकी लापरवाही और नियम तोड़ने का परिणाम उसके जीवन में आया था। उसे अपनी गलती का पछतावा हुआ और उसने अपनी बहन से क्षमा मांगी।
जितिया के दिन कथा पाठ की परंपरा
व्रत रखने वाली महिलाएं पूजा के समय जीमूतवाहन का स्मरण करती हैं। कई परंपराओं में चील और सियारिन से जुड़े प्रतीकों की भी पूजा की जाती है। इसके बाद जितिया व्रत की कथा सुनी या पढ़ी जाती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, कथा का पाठ करते समय मन में अपनी संतान की सुख-शांति और लंबी आयु की कामना की जाती है। जितिया व्रत केवल एक उपवास की परंपरा नहीं, बल्कि उस मां की भावना से जुड़ा पर्व है, जो अपनी संतान की सलामती के लिए कठिन व्रत करती है।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)