Anand Chaturdashi And Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी से शुरू होने वाला गणेश उत्सव अनंत चतुर्दशी के दिन अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचता है। इस दिन भक्त पूरे श्रद्धाभाव से गणपति बप्पा की पूजा-अर्चना करने के बाद उनकी प्रतिमा का विसर्जन करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गणेश जी कुछ दिनों के लिए भक्तों के घर और पंडालों में विराजते हैं और फिर अनंत चतुर्दशी पर उन्हें विधि-विधान से विदाई दी जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गणपति विसर्जन के लिए अनंत चतुर्दशी का दिन ही क्यों चुना गया? इसके पीछे कौन-सी धार्मिक मान्यता जुड़ी है? आइए जानते हैं।
अनंत चतुर्दशी का महत्व
अनंत चतुर्दशी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा करने की परंपरा है। इसी तिथि को गणेश उत्सव का समापन भी माना जाता है। गणेश चतुर्थी से शुरू होने वाला 10 दिवसीय गणेशोत्सव अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति विसर्जन के साथ पूरा होता है। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि हर घर में गणपति की प्रतिमा 10 दिनों तक ही रखी जाए। कई परिवार अपनी परंपरा के अनुसार डेढ़ दिन, तीन, पांच या सात दिन बाद भी विसर्जन करते हैं। लेकिन अनंत चतुर्दशी को होने वाला विसर्जन सबसे प्रमुख माना जाता है।
10 दिन बाद क्यों होता है विसर्जन?
गणेश चतुर्थी के दिन गणपति की प्रतिमा की स्थापना की जाती है। इसके बाद कई स्थानों पर लगातार 10 दिनों तक पूजा, आरती और भोग का क्रम चलता है। इस अवधि को गणेशोत्सव का मुख्य पर्व माना जाता है। दस दिनों तक गणपति की पूजा करने के बाद अनंत चतुर्दशी पर उन्हें विदाई दी जाती है। धार्मिक मान्यता में यह गणेश उत्सव के पूर्ण होने का संकेत माना जाता है। इसी वजह से इस दिन देश के कई हिस्सों में बड़े स्तर पर गणपति विसर्जन की परंपरा देखने को मिलती है।
महाभारत से जुड़ी मान्यता
गणपति विसर्जन को लेकर एक प्रचलित धार्मिक कथा महाभारत से भी जुड़ी बताई जाती है। मान्यता के अनुसार, महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की कथा भगवान गणेश को सुनाई थी और गणेश जी लगातार उसे लिखते रहे। कथा के अनुसार, यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा। जब कथा पूरी हुई और वेदव्यास ने अपनी आंखें खोलीं, तब उन्होंने देखा कि लगातार लेखन करने के कारण गणेश जी के शरीर का ताप बहुत बढ़ गया था। इसके बाद वेदव्यास ने गणेश जी को जल से स्नान कराया, जिससे उनके शरीर का ताप सामान्य हुआ। प्रचलित मान्यता में इस घटना को अनंत चतुर्दशी से जोड़ा जाता है। इसी धार्मिक कथा के आधार पर अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश प्रतिमा के जल में विसर्जन की परंपरा को समझाया जाता है।
विसर्जन का धार्मिक भाव
गणेश प्रतिमा की स्थापना और विसर्जन को केवल एक पूजा की शुरुआत और समाप्ति के रूप में नहीं देखा जाता। धार्मिक परंपरा में प्रतिमा को अस्थायी रूप से स्थापित कर उसमें पूजा के माध्यम से देवत्व का आवाहन किया जाता है। पूजा का क्रम पूरा होने के बाद विसर्जन के जरिए गणपति को विदाई दी जाती है। इस दौरान भक्त गणपति बप्पा से घर-परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखने और अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करते हैं। विसर्जन के समय ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ जैसे जयकारे इसी भाव को व्यक्त करते हैं।
अनंत चतुर्दशी पर ही क्यों खास है विसर्जन?
इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अनंत चतुर्दशी गणेशोत्सव के पारंपरिक समापन की तिथि है। गणेश चतुर्थी से शुरू होने वाले 10 दिवसीय उत्सव का समापन इसी दिन माना जाता है। इसलिए इस दिन गणपति को विधि-विधान से विदाई देने की परंपरा सबसे अधिक प्रचलित हुई। साथ ही, अनंत चतुर्दशी स्वयं भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तिथि है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा और अनंत सूत्र धारण करने की परंपरा होती है, इसलिए यह तिथि गणेश उत्सव के समापन और अनंत देव की उपासना, दोनों से जुड़ी हुई है।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)