Bhai Dooj : हिंदू धर्म में भाई दूज का त्योहार भाई-बहन के अटूट प्रेम, स्नेह और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है।
Bhai Dooj : हिंदू धर्म में भाई दूज का त्योहार भाई-बहन के अटूट प्रेम, स्नेह और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई के माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं। वहीं भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं और जीवनभर उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाई दूज के दिन विधि-विधान से तिलक करने से भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम और मधुरता बनी रहती हैलेकिन क्या आप जानते हैं कि भाई दूज पर भाई को तिलक लगाते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना भी जरूरी माना जाता है? आइए जानते हैं तिलक लगाने के सही नियम और इस दिन किन गलतियों से बचना चाहिए।
भाई दूज पर भाई को तिलक लगाते समय किन बातों का रखें ध्यान?
1. शुभ मुहूर्त में ही करें तिलक
भाई दूज के दिन तिलक लगाने के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन दोपहर के समय भाई को तिलक लगाना शुभ होता है। हालांकि, तिलक लगाने से पहले पंचांग में द्वितीया तिथि और शुभ मुहूर्त जरूर देख लेना चाहिए। शुभ समय में पूजा और तिलक करने से पर्व का धार्मिक महत्व बढ़ जाता है। 2. तिलक लगाने से पहले करें पूजा
भाई को तिलक लगाने से पहले पूजा स्थल को साफ कर लें। इसके बाद भगवान गणेश, भगवान विष्णु और यमराज का स्मरण करके पूजा करें। कुछ परंपराओं में यमराज और यमुना जी की पूजा का भी विधान है। इसके बाद भाई को तिलक लगाने की प्रक्रिया शुरू करें। मान्यता है कि इससे भाई पर देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है।
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3. भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर बिठाएं
भाई दूज के दिन तिलक लगाते समय भाई को एक साफ आसन पर बैठाना चाहिए। कई धार्मिक परंपराओं में भाई का मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखने को शुभ माना जाता है। इसके बाद बहन को भाई के माथे पर तिलक लगाना चाहिए। ध्यान रखें कि तिलक लगाते समय मन में भाई की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना करें। 4. रोली और अक्षत से लगाएं तिलक
भाई दूज पर भाई को तिलक लगाने के लिए रोली और अक्षत यानी साबुत चावल का इस्तेमाल किया जाता है। सबसे पहले भाई के माथे पर रोली से तिलक लगाएं और फिर उस पर अक्षत चढ़ाएं। हिंदू धर्म में अक्षत को पूर्णता, शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। ध्यान रखें कि पूजा में इस्तेमाल किए जाने वाले चावल साबुत हों और टूटे हुए चावलों का इस्तेमाल न करें। 5. भाई की आरती उतारना न भूलें
तिलक लगाने के बाद भाई की आरती उतारने की परंपरा है। इसके लिए पूजा की थाली में दीपक, रोली, अक्षत, मिठाई और फूल रख सकते हैं। भाई की आरती उतारते समय उनके सुखी और स्वस्थ जीवन की कामना करें। इसके बाद भाई को मिठाई खिलाएं। धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम और अपनापन बना रहता है। 6. तिलक लगाते समय न करें जल्दबाजी
भाई दूज का पर्व केवल एक रस्म नहीं, बल्कि भाई-बहन के भावनात्मक रिश्ते का उत्सव है। इसलिए तिलक लगाते समय जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। पूरे श्रद्धा भाव से पूजा करें और भाई के मंगलमय जीवन की प्रार्थना करें। इस दिन किसी भी तरह के विवाद, क्रोध और कटु वचनों से बचना चाहिए। 7. भाई को खिलाएं मिठाई
तिलक और आरती के बाद भाई को मिठाई खिलाने की परंपरा है। आप अपनी पसंद के अनुसार लड्डू, पेड़ा, खीर या कोई अन्य मिठाई खिला सकती हैं। मान्यता है कि भाई का मुंह मीठा कराने से जीवन में मिठास और खुशहाली बनी रहती है। इसके बाद भाई अपनी बहन को उपहार देकर उसके प्रति प्रेम और सम्मान प्रकट करता है। 8. भाई दूज पर भाई-बहन साथ करें भोजन
भाई दूज पर भाई-बहन के साथ भोजन करने की भी परंपरा है। कई मान्यताओं के अनुसार, इस दिन बहन के घर भोजन करना भाई के लिए शुभ माना जाता है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में इस परंपरा को मनाने के तरीके अलग हो सकते हैं। इस दिन भाई-बहन को एक-दूसरे के साथ समय बिताना चाहिए और अपने रिश्ते को मजबूत बनाने का प्रयास करना चाहिए।
क्या है भाई दूज का धार्मिक महत्व?
पौराणिक कथा के अनुसार, सूर्यदेव और उनकी पत्नी संज्ञा के दो संतानें थीं, जिनका नाम यमराज और यमुना था। दोनों भाई-बहन एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। एक दिन यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया। यमराज अपनी बहन के घर पहुंचे तो यमुना ने उनका आदर-सत्कार किया और उनके माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी आयु की कामना की।बहन के इस प्रेम और सत्कार से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा। तब यमुना ने वरदान मांगा कि जो भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाकर उससे तिलक करवाए और भोजन करे, उसे अकाल मृत्यु का भय न रहे। यमराज ने बहन की यह इच्छा स्वीकार कर ली। तभी से भाई दूज का पर्व मनाने की परंपरा शुरू होने की मान्यता प्रचलित है। यह भी पढ़ें-
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)