Yoga: योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने की एक विधि नहीं है, बल्कि भारतीय सनातन परंपरा में इसे आत्मा, मन और परम चेतना के मिलन का मार्ग माना गया है। योग की उत्पत्ति को लेकर अनेक लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि आखिर इसकी शुरुआत कब हुई और सबसे पहले योग का ज्ञान किसने दिया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार योग का आदि स्रोत स्वयं भगवान शिव हैं। उन्हें 'आदियोगी' और 'प्रथम गुरु' कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने सबसे पहले योग के गूढ़ रहस्यों का उपदेश दिया था।
धार्मिक ग्रंथों और प्राचीन परंपराओं के अनुसार भगवान शिव ने माता पार्वती को योग का ज्ञान प्रदान किया और बाद में यही ज्ञान सप्तऋषियों के माध्यम से संपूर्ण संसार में फैला। यही कारण है कि योग की जड़ें केवल शारीरिक अभ्यास तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह सनातन धर्म की प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है।
भगवान शिव को क्यों कहा जाता है आदियोगी?
सनातन परंपरा में भगवान शिव को योग का आदि प्रवर्तक माना गया है। 'आदि' अर्थात सबसे पहले और 'योगी' अर्थात योग का पूर्ण ज्ञाता। पौराणिक मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभिक काल में जब संसार में जीवन तो था, लेकिन आत्मज्ञान और योग की विधि का कोई ज्ञान नहीं था, तब भगवान शिव गहन समाधि में लीन रहते थे। उनकी समाधि इतनी गहरी बताई गई है कि वे बाहरी संसार से पूर्णतः विरक्त होकर परम चेतना में स्थित रहते थे। अनेक देवता, ऋषि और सिद्ध पुरुष उनके इस दिव्य स्वरूप को देखकर आश्चर्यचकित थे। सभी जानना चाहते थे कि आखिर वह कौन-सा ज्ञान है, जिसने भगवान शिव को इस सर्वोच्च अवस्था तक पहुंचाया। इसी ज्ञान को आगे चलकर योग के नाम से जाना गया।
माता पार्वती को सुनाया था योग का प्रथम उपदेश
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय माता पार्वती ने भगवान शिव से प्रश्न किया कि वे किस प्रकार इस दिव्य समाधि और परम आनंद की अवस्था को प्राप्त करते हैं। तब भगवान शिव ने उन्हें योग के रहस्यों का विस्तार से वर्णन करना प्रारंभ किया। कहा जाता है कि भगवान शिव ने हिमालय के अत्यंत शांत और एकांत स्थान पर माता पार्वती को ध्यान, प्राणायाम, आसन, कुंडलिनी, चक्रों तथा आत्मा और परमात्मा के मिलन से संबंधित गूढ़ ज्ञान सुनाया। यह उपदेश अत्यंत गोपनीय माना गया था और केवल योग्य शिष्य के लिए था। इसी संवाद को कई परंपराओं में योग का पहला उपदेश माना जाता है।
सप्तऋषियों ने कैसे प्राप्त किया योग का ज्ञान?
भगवान शिव के योग ज्ञान की चर्चा धीरे-धीरे अनेक ऋषियों तक पहुंची। पौराणिक मान्यता के अनुसार कई ऋषि भगवान शिव के पास पहुंचे और उनसे योग सीखने की इच्छा व्यक्त की। शुरुआत में भगवान शिव ने उनकी परीक्षा ली। लंबे समय तक कठोर तप, धैर्य और साधना के बाद केवल सात ऋषि ऐसे पाए गए जो इस दिव्य ज्ञान को ग्रहण करने योग्य थे। यही सात महापुरुष आगे चलकर सप्तऋषि कहलाए। इन सप्तऋषियों में महर्षि अत्रि, महर्षि भृगु, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि कश्यप, महर्षि गौतम और महर्षि जमदग्नि शामिल थे। भगवान शिव ने इन्हें योग के विभिन्न स्वरूपों, ध्यान, तप, प्राण, चेतना और आत्मसाक्षात्कार की संपूर्ण विधि सिखाई।
सप्तऋषियों ने कैसे फैलाया योग का ज्ञान?
योग का ज्ञान प्राप्त करने के बाद सप्तऋषियों को भगवान शिव ने विभिन्न दिशाओं में भेजा। प्रत्येक ऋषि ने अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर योग की शिक्षा दी। धार्मिक परंपराओं के अनुसार इन्हीं ऋषियों ने भारत के विभिन्न भागों के साथ-साथ हिमालय से लेकर मध्य एशिया और अन्य क्षेत्रों तक योग की परंपरा का विस्तार किया। समय के साथ अनेक आश्रम स्थापित हुए, जहां गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से योग का ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहा। इसी कारण योग को किसी एक व्यक्ति या काल की खोज नहीं माना जाता, बल्कि यह गुरु परंपरा से निरंतर प्रवाहित होने वाला दिव्य ज्ञान माना जाता है।
वेदों और उपनिषदों में भी मिलता है योग का उल्लेख
योग का स्वरूप केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है। वैदिक साहित्य में भी इसके अनेक संकेत मिलते हैं। ऋग्वेद में ध्यान, तप, प्राण और आत्मचिंतन का उल्लेख मिलता है। इसके बाद उपनिषदों में योग को और अधिक विस्तार से समझाया गया। विशेष रूप से कठोपनिषद, श्वेताश्वतर उपनिषद, मैत्रायणीय उपनिषद और अन्य ग्रंथों में मन, इंद्रियों और आत्मा पर नियंत्रण को योग का आधार बताया गया है। इन ग्रंथों में योग को केवल आसनों तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उसे आत्मज्ञान प्राप्त करने का साधन माना गया है।
महर्षि पतंजलि ने योग को व्यवस्थित स्वरूप दिया
धार्मिक परंपराओं में भगवान शिव को योग का आदि गुरु माना जाता है, जबकि महर्षि पतंजलि ने इस प्राचीन ज्ञान को व्यवस्थित रूप से संकलित किया। उन्होंने योगसूत्र की रचना कर योग के सिद्धांतों को सूत्रबद्ध किया। योगसूत्र में अष्टांग योग का विस्तार से वर्णन मिलता है, जिसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि को योग के आठ अंग बताया गया है। पतंजलि ने कोई नया योग नहीं बनाया, बल्कि प्राचीन ऋषि परंपरा से प्राप्त ज्ञान को व्यवस्थित रूप देकर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित किया।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी योग और आयुर्वेद से संबंधित सामान्य जानकारियों, परंपरागत मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी देना है। जीवांजलि इसकी पुष्टि नहीं करता है। किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्या या उपचार के लिए किसी योग्य चिकित्सक, योग विशेषज्ञ या आयुर्वेदाचार्य से परामर्श अवश्य लें।