Vishwakarma Puja: विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर भगवान विश्वकर्मा के स्वरूप, उनकी शिल्पकला और उनसे जुड़ी पौराणिक कथाओं का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पकार और वास्तुकार कहा गया है, लेकिन क्या आपको पता है कि भगवान विश्वकर्मा के पांच पुत्र भी शिल्प की अलग-अलग विधाओं के आचार्य माने जाते हैं? इनके नाम मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ बताए गए हैं। इनके बारे में कई पौराणिक मान्यताएं मिलती हैं। आइए जानते हैं भगवान विश्वकर्मा के पांचों पुत्रों के नाम और उनसे जुड़ी मान्यताएं।
भगवान विश्वकर्मा के पांच पुत्र
धार्मिक परंपराओं में भगवान विश्वकर्मा के पांच पुत्रों का उल्लेख मिलता है। इनके नाम मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ हैं। पांचों को शिल्प की अलग-अलग विधाओं से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इन पांचों ने अपने-अपने क्षेत्र में शिल्पकला को आगे बढ़ाया। इनमें मनु को लोहे, मय को काष्ठ यानी लकड़ी, त्वष्टा को तांबे-कांसे, शिल्पी को पत्थर और स्थापत्य तथा दैवज्ञ को स्वर्ण-रजत जैसे धातु कार्य से जोड़ा जाता है। अलग-अलग धार्मिक स्रोतों में इनके कार्यों के विवरण में कुछ अंतर भी मिलता है।
सबसे बड़े पुत्र मनु
मान्यता के अनुसार मनु भगवान विश्वकर्मा के ज्येष्ठ पुत्र थे। उन्हें लोहे से जुड़े शिल्प और निर्माण कार्य का अधिष्ठाता माना जाता है। विश्वकर्मा परंपरा से जुड़े स्रोतों में मनु के विवाह का उल्लेख महर्षि अंगिरा की पुत्री कंचना के साथ मिलता है। उनके वंश में अग्निगर्भ, सर्वतोमुख और ब्रह्म जैसे ऋषियों के जन्म की मान्यता भी बताई गई है। मनु से जुड़ी मान्यता में लोहे के औजार और विभिन्न प्रकार के धातु कार्य प्रमुख माने जाते हैं। इसी वजह से उन्हें शिल्प परंपरा की एक महत्वपूर्ण धारा का प्रवर्तक माना गया।
दूसरे पुत्र मय
भगवान विश्वकर्मा के दूसरे पुत्र मय को काष्ठ यानी लकड़ी की शिल्पकला का आचार्य माना जाता है। पौराणिक परंपरा में मय को महान शिल्पी बताया गया है। उनका विवाह महर्षि पराशर की पुत्री सौम्या से होने की मान्यता मिलती है। मय का नाम विशेष रूप से वास्तु और निर्माण कला से जुड़ी कथाओं में मिलता है। कुछ परंपराओं में उन्हें इंद्रजाल और अद्भुत निर्माण कला से भी जोड़ा गया है। इसी कारण मय को भगवान विश्वकर्मा की शिल्प परंपरा में विशेष स्थान दिया जाता है।
तीसरे पुत्र त्वष्टा
तीसरे पुत्र का नाम त्वष्टा बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार त्वष्टा तांबे और कांसे जैसी धातुओं के शिल्प में निपुण माने जाते हैं। उनका संबंध देवताओं की शिल्प परंपरा से भी बताया जाता है। कुछ परंपराओं में त्वष्टा का विवाह ऋषि कौशिक की पुत्री जयंती के साथ बताया गया है। उनके वंश में कई ऋषियों के होने की मान्यता मिलती है। त्वष्टा को देवताओं में पूजित शिल्पी के रूप में भी वर्णित किया गया है।
चौथे पुत्र शिल्पी
भगवान विश्वकर्मा के चौथे पुत्र शिल्पी माने जाते हैं। इनके नाम से ही शिल्पकला का संबंध स्पष्ट होता है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें पत्थर, स्थापत्य और निर्माण कला का अधिष्ठाता बताया गया है। कुछ स्रोतों में ईंट और भवन निर्माण से भी उनका संबंध बताया गया है। मान्यता के अनुसार शिल्पी का विवाह महर्षि भृगु की पुत्री करुणा से हुआ था। उनके वंश में भी कई ऋषियों के जन्म की कथा मिलती है। मंदिरों, भवनों और पत्थर की कलाकृतियों से जुड़ी शिल्प परंपरा में शिल्पी को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।
पांचवें पुत्र दैवज्ञ
भगवान विश्वकर्मा के पांचवें पुत्र दैवज्ञ बताए गए हैं। इन्हें स्वर्ण और चांदी जैसे कीमती धातुओं के शिल्प तथा आभूषण निर्माण से जोड़ा जाता है, इसलिए शिल्प परंपरा में दैवज्ञ का संबंध स्वर्णकार कला से माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं में दैवज्ञ का विवाह महर्षि जैमिनी की पुत्री चंद्रिका के साथ बताया गया है। उनके वंश में भी अनेक ऋषियों के होने का उल्लेख मिलता है।
पांचों पुत्रों से जुड़ी मान्यता
भगवान विश्वकर्मा के पांचों पुत्रों को केवल उनकी संतान के रूप में ही नहीं, बल्कि शिल्प की अलग-अलग विधाओं के आचार्य के रूप में भी देखा जाता है। एक परंपरा के अनुसार इन पांचों ने शिल्प विज्ञान की अलग-अलग धाराओं को आगे बढ़ाया और अपने वंशजों को भी उनसे जुड़े कार्य सौंपे। इस तरह मनु का संबंध लोहे के काम, मय का लकड़ी के काम, त्वष्टा का तांबा-कांसा, शिल्पी का पत्थर और स्थापत्य तथा दैवज्ञ का स्वर्ण-रजत शिल्प से जोड़ा जाता है।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)