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Vamana Avatar: त्रेता युग में भगवान विष्णु ने क्यों लिया था वामन अवतार, क्या है इसकी पौराणिक कथा

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Vamana Avatar: धार्मिक मान्यता है कि त्रेता युग में भगवान विष्णु ने वामन अवतार में धरती पर जन्म लिया था। वामन देव का अवतार भगवान विष्णु का पांचवा अवतार माना जाता है। इससे पहले भगवान मत्स्य, कूर्म, वराह और नरसिंह अवतार में जन्म ले चुके हैं।

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Vamana Avatar: धार्मिक मान्यता है कि त्रेता युग में भगवान विष्णु ने वामन अवतार में धरती पर जन्म लिया था। वामन देव का अवतार भगवान विष्णु का पांचवा अवतार माना जाता है। इससे पहले भगवान मत्स्य, कूर्म, वराह और नरसिंह अवतार में जन्म ले चुके हैं। लेकिन क्या आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि भगवान विष्णु ने भगवान वामन का अवतार क्यों लिया था? इस अवतार को लेने के पीछे क्या कारण था? आइए इन सभी के बारे में विस्तार से जानते हैं।

भगवान विष्णु वामन अवतार क्यों लेना पड़ा

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वेदों और पुराणों में भगवान विष्णु के 10 अवतारों का वर्णन है, जिसमें वामन पांचवा अवतार है। जब-जब सृष्टि पर कोई विपत्ति या संकट आया, तब-तब श्री हरि ने अवतार लेकर उसे दूर किया। भगवान विष्णु का वामन अवतार भी इसी उद्देश्य से हुआ था। भगवान विष्णु के वामन अवतार के बारे में मान्यता है कि, इंद्र देव को स्वर्ग का राज्य वापस दिलाने और अत्यंत शक्तिशाली दैत्यराज बलि का अभिमान तोड़ने के लिए भगवान विष्णु को वामन अवतार लेना पड़ा था। आइए जानते हैं विष्णु जी के वामन अवतार से जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में।

पौराणिक कथा

राक्षस राजा बलि बहुत शक्तिशाली था और उसने अपनी शक्ति से तीनों लोकों पर कब्ज़ा कर लिया था। राजा बलि भले ही क्रूर था और उसे अपनी शक्ति पर बहुत घमंड भी था। लेकिन साथ ही वह भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त भी था और वह बहुत दान पुण्य भी करता था। इसी वजह से उसे इंद्रदेव की जगह स्वर्ग का स्वामी बनाया गया था।

जब बलि ने देवी-देवताओं को परेशान करना शुरू किया

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लेकिन जैसे ही बलि को स्वर्ग का स्वामी बनाया गया, उसने अपनी शक्ति और पद का दुरुपयोग करके सभी देवी-देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया। स्वर्ग के सभी देवी-देवता भी बलि के अत्याचारों से बहुत परेशान हो गए और इसके बाद सभी ने भगवान विष्णु से मदद की गुहार लगाई। इंद्र देव ने भी भगवान से स्वर्ग पर फिर से कब्जा करने की प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने सभी देवी-देवताओं को आश्वासन दिया कि वह राजा बलि का घमंड तोड़ देंगे और तीनों लोकों को उसके कब्जे से मुक्त करा देंगे। अपने वचन को पूरा करने के लिए विष्णु जी ने त्रेता युग में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को माता अदिति और कश्यप ऋषि के पुत्र के रूप में धरती पर जन्म लिया। इसे भगवान विष्णु का वामन अवतार कहा जाता है।

विष्णु जी एक बौने या बटुक ब्राह्मण का रूप धारण करके राजा बलि के पास पहुंचे। इस रूप में उनके एक हाथ में छत्र और दूसरे हाथ में दंड था। वामन देव ने बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी। बलि अपनी वचनबद्धता और दान के लिए प्रसिद्ध थे। इसलिए दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने भी राजा बलि को किसी भी तरह का वचन देने से पहले चेतावनी दी थी, लेकिन इसके बावजूद राजा बलि ने ब्राह्मण पुत्र को तीन पग भूमि देने का वचन दिया।

वामन देव ने दो पग में स्वर्ग और धरती नाप ली

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इसके बाद वामन देव ने विशाल रूप धारण कर अपने एक पैर से पूरी धरती और दूसरे पैर से पूरा स्वर्ग नाप लिया। इसके बाद जब तीसरे पैर के लिए कुछ नहीं बचा तो राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया और वामन देव से अपना पैर अपने सिर पर रखने के लिए कहा। इस तरह भगवान ने बलि का घमंड तोड़ा। लेकिन बलि की वचनबद्धता से वे बहुत प्रसन्न हुए और इसके बाद उन्होंने उसे पाताल लोक का राजा बना दिया। जैसे ही वामन देव ने राजा बलि के सिर पर पैर रखा, वे तुरंत पाताल लोक पहुंच गए और भगवान विष्णु की कृपा से बलि ने अनंत काल तक पाताल लोक पर राज किया।

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