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Shiv Purana Part 101: कैसे हुआ ग्रहों के सेनापति मंगल का जन्म? पढ़ें रोचक कहानी

jeevanjaliPublished by:
निधि
सार

Shiv Purana: शिव ने पृथ्वी से कहा कि भले ही यह पुत्र मेरे श्रम से उत्पन्न हुआ है लेकिन यह आज से पृथ्वी पुत्र ही कहलायेगा। यह सदा त्रिविध तापों से – रहित होगा। अत्यन्त गुणवान् और भूमि देने वाला होगा।

शिव पुराण

Shiv Purana: शिव पुराण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि कैसे हिमाचल ने अपनी पति मेना को समझाया कि उन्होंने सपने में शिव को देखा और उनकी बेटी उनकी सेवा करने के लिए उनके पास ही रुक गई। इसके बाद गिरिराज हिमवान् और मेनका शुद्ध हृदय से उस स्वप्न के फल की परीक्षा एवं प्रतीक्षा करने लगे। दूसरी ओर दक्ष-यज्ञ से अपने निवास स्थान कैलास पर्वत पर आकर भगवान् शिव प्रियाविरह से कातर हो गये और प्राणों से भी अधिक प्यारी सतीदेवी का हृदय से चिन्तन करने लगे। अपने पार्षदों को बुलाकर सती के लिये शोक करते हुए उनके प्रेमवर्द्धक गुणों का अत्यन्त प्रीति पूर्वक वर्णन करने लगे।

यह सब उन्होंने सांसारिक गति को दिखाने के लिये किया। फिर, गृहस्थ- आश्रम की सुन्दर स्थिति तथा नीति-रीति का परित्याग करके वे दिगम्बर हो गये और सब लोकों में उन्मत्त की भाँति भ्रमण करने लगे। लीला कुशल होने के कारण विरही की अवस्था का प्रदर्शन करने लगे। सती के विरह से दुःखित हो कहीं भी उनका दर्शन न पाकर भक्त कल्याणकारी भगवान् शंकर पुन: कैलासगिरि पर लौट आये और मन को यल्नपूर्वक एकाग्र करके उन्होंने समाधि लगा ली, जो समस्त दुःखों का नाश करनेवाली है।

समाधि में वे अविनाशी स्वरूप का दर्शन करने लगे। इस तरह तीनों गुणों से रहित हो वे भगवान् शिव चिरकाल तक सुस्थिर भाव से समाधि लगाये बैठे रहे। वे प्रभु स्वयं ही माया के अधिपति निर्विकार परब्रह्म हैं। तदनन्तर जब असंख्य वर्ष व्यतीत हो गये, तब उन्होंने समाधि छोड़ी। भगवान् शिव के ललाट से उस समय श्रम- जनित पसीने की एक बूंद पृथ्वी पर गिरी और तत्काल एक शिशु के रूप में परिणत हो गयी। उस बालक के चार भुजाएँ थीं, शरीर की कान्ति लाल थी और आकार मनोहर था।


दिव्य द्युति से दीप्तिमान् वह शोभाशाली बालक अत्यन्त दु:स्सह तेज से सम्पन्न था, तथापि उस समय लोकाचार-परायण परमेश्वर शिव के आगे वह साधारण शिशु की भाँति रोने लगा। यह देख पृथ्वी भगवान् शंकर से भय मान उत्तम बुद्धि से विचार करने के पश्चात् सुन्दरी स्त्री का रूप धारण करके वहीं प्रकट हो गयीं। उन्होंने उस सुन्दर बालक को तुरंत उठाकर अपनी गोद में रख लिया और अपने ऊपर प्रकट होने वाले दूध को ही स्तन्य के रूप में उसे पिलाने लगीं। उन्होंने स्नेहसे उसका मुँह चूमा और अपना ही बालक मान हँस-हँसकर उसे प्यार करने लगीं।

इसके बाद शिव ने पृथ्वी से कहा कि भले ही यह पुत्र मेरे श्रम से उत्पन्न हुआ है लेकिन यह आज से पृथ्वी पुत्र ही कहलायेगा। यह सदा त्रिविध तापों से – रहित होगा। अत्यन्त गुणवान् और भूमि देने वाला होगा। शिव की उपर्युक्त आज्ञा को शिरोधार्य करके पुत्र सहित पृथ्वी देवी शीघ्र ही अपने स्थानको चली गयीं। उन्हें आत्यन्तिक सुख मिला। वह बालक ‘भौम’ यानी मंगल देव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। युवा होने पर तुरंत काशी चला गया और वहाँ उसने दीर्घकाल तक भगवान् शंकर की सेवा की। विश्वनाथजी की कृपा से ग्रह की पदवी पाकर वे भूमि कुमार शीघ्र ही श्रेष्ठ एवं दिव्य लोक में चले गये।

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