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Sanwaliya Seth Temple Story: क्यों कहते हैं श्री कृष्ण को सांवलिया सेठ? जानिए पीछे की कहानी

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Sanwaliya Seth Temple Story: बहुत कम लोग जानते हैं कि श्री कृष्ण को सांवलिया सेठ के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन भगवान कृष्ण का यह नाम पूरे देश में शायद ही प्रचलित हो, लेकिन राजस्थान में भगवान श्री कृष्ण का सांवलिया सेठ के नाम बहुत ज्यादा प्रचलित है।

Sanwaliya Seth Temple Story
Sanwaliya Seth Temple Story: बहुत कम लोग जानते हैं कि श्री कृष्ण को सांवलिया सेठ के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन भगवान कृष्ण का यह नाम पूरे देश में शायद ही प्रचलित हो, लेकिन राजस्थान में भगवान श्री कृष्ण का सांवलिया सेठ के नाम बहुत ज्यादा प्रचलित है। इसकारण वश भगवान श्री कृष्ण के परम भक्ति मीरा बाई भी सांवलिया सेठ की पूजा करती थीं। मीरा बाई सांवलिया सेठ को प्यार से गिरधर गोपाल कहकर बुलाती थीं। 

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में एक मंदिर सांवलिया सेठ मंदिर है, जो काफी प्रसिद्ध है। मान्यताओं के अनुसार, लोग अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए श्री कृष्ण के स्वरूप सांवलिया सेठ को अपना बिजनेस पार्टनर बनाते हैं। इतना ही नहीं, लोग उन्हें अपनी खेती, व्यापार, घर में हिस्सा भी देते हैं और अपनी महीने की कमाई का एक हिस्सा सांवलिया सेठ के मंदिर में दान भी करते हैं। श्री कृष्ण के सांवलिया सेठ के रूप से जुड़ी एक रोचक कथा है, जो इस प्रकार है... 

सुदामा और श्री कृष्ण की कहानी

कथा के अनुसार, श्री कृष्ण के मित्र सुदामा काफी गरीबी से जूझ रहे थे जब उनकी पत्नी ने उन पर बहुत दबाव डाला तो वे श्री कृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे। वहां श्री कृष्ण ने अपने मित्र का खुले दिल से स्वागत किया। जब सुदामा को 56 भोग का भोजन परोसा गया तो सुदामा ने यह कहकर खाने से मना कर दिया कि उनकी पत्नी वसुंधरा और बच्चे भूखे होंगे। यह सुनकर श्री कृष्ण तुरंत दूसरा रूप धारण कर लेते हैं और सुदामा के गांव पहुंच जाते हैं और वहां वे सांवले शाह बन जाते हैं।

अचानक एक बच्चा दौड़ता हुआ सुदामा के घर के बाहर आता है और कहता है कि पास के गांव के सांवलिया सेठ के घर पुत्र का जन्म हुआ है। इसके लिए दस दिनों तक महायज्ञ किया जा रहा है। साथ ही आसपास के सभी शहरों में दस दिनों तक भंडारे का आयोजन किया जा रहा है। उसके बाद सुदामा के बच्चे भी वहां गए और सांवले सेठ के यहां से भोजन लेकर आए। 

जब सुदामा द्वारका से लौट रहे थे तो उन्हें भी पता चला कि कोई सांवलिया सेठ भंडारा आयोजित कर रहा है। जब सुदामा एक व्यक्ति को रोकते हैं और उससे अपने गांव में हो रहे भंडारे के बारे में पूछते हैं कि क्या यह वास्तव में वहां हो रहा है, तो वह व्यक्ति हां में जवाब देता है। यह उत्तर सुनकर सुदामा की आत्मा तृप्त हो गई। उसे अब अपने भूखे बच्चे और पत्नी की चिंता नहीं रही। श्री कृष्ण की इस उदारता और सहायता करने के तरीकों के कारण, उन्हें तब से सांवलिया सेठ कहा जाता है।

ऐसा माना जाता है कि संत दयाराम के पास सांवलिया रूप में श्री कृष्ण की चार मूर्तियां थीं, जिनमें से सबसे छोटी मूर्ति ने मीराबाई को भी मोहित कर लिया था। जब औरंगजेब भगवान की मूर्तियों को तोड़ रहा था, तो उससे बचने के लिए संत दयाराम ने श्री कृष्ण की मूर्तियों को बागुंड-भादसोड़ा के छापर में एक बरगद के पेड़ के नीचे गड्ढा खोदकर छिपा दिया। 

सांवलिया सेठ का मंदिर बनाने की कथा

1840 में मंडफिया गांव के निवासी भोलाराम गुर्जर नामक एक ग्वाले को सपना आया कि भादसोड़ा-बागुंड गांव की सीमा पर छापर में भगवान की चार मूर्तियाँ जमीन में दबी हुई हैं। जब उस स्थान पर खुदाई की गई, तो वहाँ से 4 समान मूर्तियाँ मिलीं। उनमें से पहली मूर्ति मंडफिया में और दूसरी भादसोड़ा में स्थापित की गई। जबकि तीसरी प्रतिमा छापर में ही स्थापित की गई। मंडफिया स्थित मंदिर को सांवलिया धाम के नाम से जाना जाता है।

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