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Vishnu Purana Katha: समय की उत्पत्ति पर विष्णु पुराण का क्या है रहस्य, जानिए पौराणिक कथा

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Mystery of Time: विष्णु पुराण के अनुसार समय की उत्पत्ति स्वयं भगवान विष्णु की दिव्य इच्छा से हुई। समय ही वह शक्ति है जिसने सृष्टि को गति दी, प्रकृति को सक्रिय किया और समस्त ब्रह्मांड में परिवर्तन का क्रम प्रारंभ किया। 
 

Vishnu Purana
Spiritual Knowledge: समय एक ऐसी शक्ति है जिसे न कोई देख सकता है और न ही उसे रोक सकता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हर जीव समय के अनुसार ही अपना जीवन व्यतीत करता है। आज विज्ञान समय को ब्रह्मांड का एक महत्वपूर्ण आयाम मानता है, जबकि सनातन धर्म के प्राचीन ग्रंथों में हजारों वर्ष पहले ही समय की गहरी व्याख्या की गई है। विष्णु पुराण में समय को केवल घड़ी की टिक-टिक या दिन-रात का क्रम नहीं माना गया, बल्कि उसे भगवान विष्णु की दिव्य शक्ति और सृष्टि के संचालन का आधार बताया गया है।

विष्णु पुराण के अनुसार समय की उत्पत्ति स्वयं परमात्मा की इच्छा से हुई। जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब केवल भगवान विष्णु ही अनंत स्वरूप में विद्यमान थे। उसी परम सत्ता से समय का प्रादुर्भाव हुआ और फिर समय के माध्यम से सृष्टि की रचना, पालन और संहार का क्रम प्रारंभ हुआ। यही कारण है कि हिंदू धर्म में समय को अत्यंत पवित्र और दिव्य शक्ति माना जाता है।

सृष्टि से पहले क्या था?

विष्णु पुराण के अनुसार सृष्टि के आरंभ से पहले न पृथ्वी थी, न आकाश, न सूर्य, न चंद्रमा और न ही कोई जीव-जंतु। चारों ओर केवल असीम जल और गहरा अंधकार था। इस अवस्था को प्रलय काल कहा जाता है। उस समय भगवान विष्णु शेषनाग पर योगनिद्रा में विराजमान थे। समस्त ब्रह्मांड उनकी दिव्य शक्ति में समाया हुआ था। जब भगवान विष्णु की इच्छा हुई कि नई सृष्टि की रचना की जाए, तभी उनकी योगमाया सक्रिय हुई। उसी क्षण समय का प्रवाह आरंभ हुआ। समय के बिना कोई भी परिवर्तन संभव नहीं था, इसलिए सबसे पहले काल का उदय हुआ और उसके बाद सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

समय की उत्पत्ति का रहस्य

विष्णु पुराण में बताया गया है कि समय कोई साधारण तत्व नहीं बल्कि भगवान विष्णु की अदृश्य शक्ति है। यह शक्ति हर वस्तु को गति देती है। यदि समय न हो तो न जन्म होगा, न विकास होगा और न ही परिवर्तन संभव होगा। पुराण के अनुसार भगवान विष्णु ने अपनी इच्छा से काल को प्रकट किया। काल ने ही प्रकृति के तीन गुणों सत्त्व, रज और तम को सक्रिय किया। इन तीनों गुणों के संतुलन से पंचमहाभूतों का निर्माण हुआ और फिर धीरे-धीरे संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना प्रारंभ हुई। इस प्रकार विष्णु पुराण यह स्पष्ट करता है कि समय किसी घड़ी या खगोलीय घटना से उत्पन्न नहीं हुआ, बल्कि वह स्वयं ईश्वर की दिव्य शक्ति का स्वरूप है।

भगवान विष्णु और काल का संबंध

विष्णु पुराण में भगवान विष्णु को काल से भी परे बताया गया है। इसका अर्थ यह है कि समय स्वयं भगवान के अधीन है। भगवान न कभी जन्म लेते हैं और न ही उनका अंत होता है। वे अनादि और अनंत हैं। मनुष्य समय के प्रभाव में रहता है, लेकिन भगवान विष्णु समय के निर्माता और संचालक हैं। जब सृष्टि की आवश्यकता होती है, तब समय आगे बढ़ता है और जब प्रलय का समय आता है, तब वही समय सब कुछ अपने भीतर समेट लेता है। इसी कारण सनातन धर्म में भगवान विष्णु को जगत का पालनकर्ता ही नहीं, बल्कि समय के नियंता के रूप में भी पूजा जाता है।

विष्णु पुराण में समय की गणना

विष्णु पुराण में समय की गणना अत्यंत सूक्ष्म और विशाल दोनों स्तरों पर की गई है। सबसे छोटे समय से लेकर करोड़ों वर्षों तक की अवधि का उल्लेख मिलता है। पुराण के अनुसार निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन, पक्ष, मास, ऋतु, वर्ष और युग समय के विभिन्न रूप हैं। इसके बाद चार युगों सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग का वर्णन किया गया है। इन चारों युगों का एक चक्र महायुग कहलाता है। ऐसे अनेक महायुग मिलकर मन्वंतर बनाते हैं और कई मन्वंतर मिलकर ब्रह्मा का एक दिन बनता है। ब्रह्मा का दिन समाप्त होने पर आंशिक प्रलय होती है और फिर अगले दिन नई सृष्टि का क्रम प्रारंभ हो जाता है। इस प्रकार विष्णु पुराण समय को केवल मानव जीवन तक सीमित नहीं रखता, बल्कि पूरे ब्रह्मांड के स्तर पर उसकी व्याख्या करता है।

समय और सृष्टि का चक्र

विष्णु पुराण के अनुसार सृष्टि एक बार बनकर हमेशा के लिए नहीं रहती। यह निरंतर बनने और मिटने का चक्र है। जब सृष्टि का निर्माण होता है, तब समय आगे बढ़ता है। जब जीव अपने कर्मों के अनुसार जीवन जीते हैं, तब भी समय उन्हें आगे ले जाता है। एक निश्चित अवधि के बाद प्रलय आती है और पूरी सृष्टि फिर से भगवान विष्णु में विलीन हो जाती है। इसके बाद कुछ समय तक सब कुछ शांत रहता है और फिर भगवान की इच्छा से समय का नया प्रवाह शुरू होता है। यह चक्र अनादि काल से चलता आ रहा है और भविष्य में भी चलता रहेगा। यही विष्णु पुराण का सबसे बड़ा रहस्य माना जाता है।

समय और कर्म का संबंध

विष्णु पुराण में समय और कर्म को एक-दूसरे का पूरक बताया गया है। समय सभी को समान रूप से मिलता है, लेकिन उसका परिणाम व्यक्ति के कर्मों पर निर्भर करता है। मनुष्य अच्छे कर्म करता है तो समय उसके लिए शुभ अवसर लेकर आता है। यदि वह बुरे कर्म करता है, तो वही समय कठिनाइयों और दुखों का कारण बनता है। इसलिए पुराण यह शिक्षा देता है कि समय का सम्मान करते हुए सदैव धर्म और सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए। समय कभी किसी के लिए नहीं रुकता, इसलिए हर क्षण का सदुपयोग करना ही जीवन की सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।

समय को ईश्वर का स्वरूप क्यों माना गया?

विष्णु पुराण में कहा गया है कि समय किसी भी व्यक्ति के साथ पक्षपात नहीं करता। राजा हो या साधारण व्यक्ति, सभी पर समय का समान प्रभाव पड़ता है। यही निष्पक्षता उसे ईश्वरीय शक्ति बनाती है। समय हर क्षण परिवर्तन लाता है। बचपन को युवावस्था और युवावस्था को वृद्धावस्था में बदलने वाला भी समय ही है। ऋतुओं का परिवर्तन, ग्रहों की गति, जन्म और मृत्यु इन सबका आधार समय है। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने समय को भगवान की अदृश्य शक्ति माना, जिसका सम्मान करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।

विष्णु पुराण से मिलने वाली सीख

विष्णु पुराण की यह कथा केवल ब्रह्मांड की उत्पत्ति नहीं बताती, बल्कि जीवन का गहरा संदेश भी देती है। यह हमें सिखाती है कि संसार में कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है। समय के साथ हर स्थिति बदलती रहती है। इसलिए सफलता मिलने पर अहंकार नहीं करना चाहिए और कठिन समय आने पर निराश भी नहीं होना चाहिए। समय का चक्र निरंतर चलता रहता है। जो व्यक्ति धैर्य, संयम और अच्छे कर्मों के साथ जीवन बिताता है, वह हर परिस्थिति का सामना करने में सक्षम होता है। यह भी बताया गया है कि भगवान पर विश्वास रखने वाला व्यक्ति समय की कठिन परीक्षाओं को भी सहजता से पार कर सकता है। इसलिए धर्म, सत्य, सेवा और सदाचार का पालन जीवन को सार्थक बनाता है।

समस्त ब्रह्मांड में परिवर्तन का क्रम 

विष्णु पुराण के अनुसार समय की उत्पत्ति स्वयं भगवान विष्णु की दिव्य इच्छा से हुई। समय ही वह शक्ति है जिसने सृष्टि को गति दी, प्रकृति को सक्रिय किया और समस्त ब्रह्मांड में परिवर्तन का क्रम प्रारंभ किया। भगवान विष्णु समय के निर्माता हैं, जबकि समस्त जीव समय के अधीन हैं। यह पौराणिक कथा हमें बताती है कि समय केवल बीतने वाली घड़ियों का नाम नहीं है, बल्कि यह ईश्वर की वह अदृश्य शक्ति है जो सृष्टि के प्रत्येक कार्य का संचालन करती है। जन्म, जीवन, कर्म और मृत्यु- सब कुछ समय के नियमों के अनुसार चलता है। इसलिए समय का सम्मान करना, उसका सदुपयोग करना और सदैव अच्छे कर्मों में लगे रहना ही विष्णु पुराण का सबसे बड़ा संदेश है। यही कारण है कि आज भी समय की उत्पत्ति का यह रहस्य भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक माना जाता है।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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