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Lord Jagannath: मौसी के घर 'गुंडिचा मंदिर' में कब तक विश्राम करेंगे भगवान जगन्नाथ, इस दौरान क्या-क्या होता है?

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Lord Jagannath: रथ यात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा श्रीमंदिर से प्रस्थान करते हैं। यात्रा पूर्ण होने पर वे गुंडिचा मंदिर में प्रवेश करते हैं। 

Lord Jagannath
Lord Jagannath: जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा श्रीमंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं, जिसे परंपरागत रूप से भगवान की मौसी का घर माना जाता है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को रथ यात्रा शुरू होने के बाद तीनों देवता अपने-अपने रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं और वहां लगभग सात दिनों तक विश्राम करते हैं। इस अवधि को गुंडिचा प्रवास कहा जाता है। वर्ष 2026 में रथ यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ 3 जुलाई से 10 जुलाई तक गुंडिचा मंदिर में विराजमान रहेंगे और इसके बाद बहुदा यात्रा के माध्यम से पुनः श्रीमंदिर लौटेंगे।

कब तक रुकते हैं भगवान जगन्नाथ

रथ यात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा श्रीमंदिर से प्रस्थान करते हैं। यात्रा पूर्ण होने पर वे गुंडिचा मंदिर में प्रवेश करते हैं। परंपरा के अनुसार तीनों देवता यहां सात दिन तक निवास करते हैं। इस अवधि में गुंडिचा मंदिर ही उनका मुख्य निवास स्थान माना जाता है। सातवें दिन बहुदा यात्रा आरंभ होती है, जिसमें भगवान पुनः अपने रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर लौटते हैं।

गुंडिचा मंदिर को मौसी का घर क्यों कहा जाता है

पुरी की प्राचीन परंपरा में गुंडिचा मंदिर को भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है। मान्यता है कि राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी गुंडिचा देवी के नाम पर इस मंदिर का निर्माण हुआ था। रथ यात्रा के दौरान भगवान अपने भक्तों के बीच आने के साथ-साथ अपनी मौसी के घर भी जाते हैं। इसी कारण गुंडिचा प्रवास को अत्यंत पवित्र और भावनात्मक पर्व माना जाता है।

 

जगन्नाथ

गुंडिचा मंदिर पहुंचने के बाद क्या होता है

जब तीनों रथ गुंडिचा मंदिर के सिंहद्वार पर पहुंचते हैं, तब विशेष वैदिक मंत्रों और पारंपरिक सेवाओं के साथ देवताओं का स्वागत किया जाता है। इसके बाद उन्हें रथों से उतारकर मंदिर के भीतर स्थापित किया जाता है। इस प्रक्रिया को पहंडी कहा जाता है। पहंडी के दौरान सेवायत देवताओं को झूमते हुए विशेष शैली में मंदिर के भीतर ले जाते हैं।

गुंडिचा मंदिर में प्रवेश के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को विशेष शयन व्यवस्था में विराजमान किया जाता है। यहां प्रतिदिन भोग, आरती, पूजा और विभिन्न नीतियां उसी प्रकार संपन्न होती हैं जैसे श्रीमंदिर में होती हैं।

आडापा दर्शन का महत्व

गुंडिचा प्रवास के दौरान भगवान का दर्शन आडापा दर्शन कहलाता है। यह रथ यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक मानी जाती है। श्रद्धालु मानते हैं कि इस अवधि में भगवान जगन्नाथ अत्यंत सुलभ रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। लाखों श्रद्धालु गुंडिचा मंदिर पहुंचकर आडापा दर्शन करते हैं।

हेरा पंचमी की परंपरा

गुंडिचा प्रवास के पांचवें दिन हेरा पंचमी मनाई जाती है। इस दिन श्रीमंदिर में विराजमान माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ से मिलने गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान बिना माता लक्ष्मी को साथ लिए रथ यात्रा पर निकल गए थे, इसलिए माता उनसे मिलने आती हैं। मंदिर परिसर में इस अवसर पर विशेष अनुष्ठान होते हैं। माता लक्ष्मी की प्रतिमा गुंडिचा मंदिर के द्वार तक लाई जाती है और पारंपरिक रीति से पूजा संपन्न होती है।

गुंडिचा प्रवास के दौरान होने वाली प्रमुख नीतियां

मंगला आरती, अवकाश नीति, सकाळ धूप, मध्याह्न भोग, संध्या धूप, बड़ा श्रृंगार, रात्रि शयन नीति। इन सभी नीतियों का पालन जगन्नाथ मंदिर की प्राचीन परंपराओं के अनुसार किया जाता है।

 

जगन्नाथ

क्यों जाते हैं भगवान गुंडिचा मंदिर

स्कंद पुराण और उड़ीसा की प्राचीन लोक परंपराओं में वर्णित कथा के अनुसार जब राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान जगन्नाथ की स्थापना कराई, तब रानी गुंडिचा ने भगवान से निवेदन किया कि वे समय-समय पर उनके भवन में भी पधारें। भगवान ने यह वर स्वीकार किया, तभी से प्रतिवर्ष रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने भाई और बहन के साथ गुंडिचा मंदिर जाते हैं।

मौसी के घर विशेष भोग

गुंडिचा मंदिर में भगवान को विशेष प्रकार के भोग अर्पित किए जाते हैं। इनमें पारंपरिक ओड़िया व्यंजन, पिठा, खिचड़ी, दही, विभिन्न प्रकार की मिठाइयां और महाप्रसाद शामिल होते हैं। श्रद्धालुओं के बीच इन भोगों का वितरण भी किया जाता है।

बहुदा यात्रा से पहले की तैयारियां

सात दिनों के प्रवास के अंतिम चरण में बहुदा यात्रा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। रथों को पुनः सजाया जाता है और सेवायत विशेष पूजा करते हैं। इसके बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा पुनः रथों पर विराजमान होते हैं। बहुदा यात्रा के दिन गुंडिचा मंदिर से श्रीमंदिर की ओर वापसी यात्रा आरंभ होती है।

बहुदा यात्रा और श्रीमंदिर वापसी

बहुदा यात्रा के दौरान सबसे पहले बलभद्र का रथ, फिर सुभद्रा का रथ और अंत में भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ प्रस्थान करता है। वापसी के मार्ग में भगवान जगन्नाथ मौसी मां मंदिर में रुकते हैं, जहां उन्हें प्रसिद्ध पोड़ा पीठा का भोग लगाया जाता है। इसके बाद रथ श्रीमंदिर के निकट पहुंचते हैं। श्रीमंदिर लौटने के बाद नीलाद्रि बीजे की परंपरा संपन्न होती है, जिसमें भगवान जगन्नाथ पुनः अपने मुख्य मंदिर में प्रवेश करते हैं। इसी के साथ गुंडिचा प्रवास और रथ यात्रा का प्रमुख चरण पूर्ण माना जाता है।

पुरी में इन सात दिनों का वातावरण

गुंडिचा प्रवास के दौरान पूरा पुरी नगर उत्सवमय बना रहता है। देश-विदेश से आए श्रद्धालु गुंडिचा मंदिर में दर्शन करते हैं। मंदिर परिसर में भजन, कीर्तन, वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक सेवाएं निरंतर चलती रहती हैं। इन सात दिनों को भगवान जगन्नाथ के सबसे सुलभ दर्शन का काल माना जाता है, इसलिए श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ उमड़ती है। 
इस प्रकार भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के बाद लगभग सात दिनों तक मौसी के घर गुंडिचा मंदिर में विश्राम करते हैं। इस अवधि में आडापा दर्शन, हेरा पंचमी, विशेष भोग, दैनिक नीतियां और बहुदा यात्रा की तैयारियां प्रमुख रूप से संपन्न होती हैं।



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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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