Jagannath Rath Yatra: जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक वार्षिक उत्सव नहीं, बल्कि उस प्राचीन पौराणिक परंपरा का प्रतीक है जिसमें भगवान विष्णु ने कलियुग में जगन्नाथ रूप से पृथ्वी पर निवास करने का संकल्प लिया था। यही कारण है कि पुरी के भगवान जगन्नाथ को ‘कलियुग का भगवान’ कहा जाता है। मान्यता है कि इस युग में जब धर्म क्षीण होता जाता है और मनुष्य के लिए कठिन साधनाएं संभव नहीं रह जातीं, तब भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों को अत्यंत सहज रूप से दर्शन देते हैं। स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और अन्य पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार भगवान ने स्वयं राजा इंद्रद्युम्न को यह वरदान दिया था कि वे पुरुषोत्तम क्षेत्र यानी वर्तमान पुरी में जगन्नाथ रूप में सदा विराजमान रहेंगे और रथ यात्रा के दौरान स्वयं भक्तों के बीच आकर दर्शन देंगे। इसी पौराणिक मान्यता के कारण जगन्नाथ धाम को कलियुग का प्रमुख तीर्थ और भगवान जगन्नाथ को कलियुग का विशेष रूप से पूजित भगवान माना जाता है। आइए जानते हैं यह पूरी पौराणिक कथा...
राजा इंद्रद्युम्न और नीलमाधव की कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक दिन उन्होंने एक दिव्य देवता ‘नीलमाधव’ के बारे में सुना, जिनकी पूजा गुप्त रूप से की जाती थी। राजा ने अपने दूत विद्यापति को उनकी खोज में भेजा। विद्यापति अनेक वन और पर्वत पार करते हुए शबर जाति के प्रमुख विश्ववसु के पास पहुंचे। विश्ववसु नीलमाधव की पूजा करते थे और किसी को उस स्थान का रहस्य नहीं बताते थे। अंततः विद्यापति को नीलमाधव के दर्शन हुए, लेकिन जब राजा इंद्रद्युम्न वहां पहुंचे तो नीलमाधव का विग्रह अदृश्य हो चुका था। राजा अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने कठोर तपस्या आरंभ कर दी, तब आकाशवाणी हुई कि समुद्र तट पर एक दिव्य दारु (काष्ठ) प्रकट होगा, उसी से भगवान का विग्रह निर्मित किया जाए।
दिव्य दारु और विश्वकर्मा का आगमन
कुछ समय बाद समुद्र तट पर एक अलौकिक काष्ठ बहकर आया। उसे कोई हिला नहीं सका, तब राजा ने भगवान का स्मरण किया और वह काष्ठ स्वयं रथ पर स्थापित हो गया। इसके बाद एक वृद्ध शिल्पी के रूप में भगवान विश्वकर्मा प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि वे विग्रह निर्माण करेंगे, लेकिन एक शर्त रखी कि जब तक कार्य पूर्ण न हो जाए, कोई भी द्वार नहीं खोलेगा। राजा ने यह शर्त स्वीकार कर ली।
कई दिनों तक भीतर से औजारों की आवाज आती रही, फिर अचानक सब शांत हो गया। रानी गुंडिचा को चिंता हुई कि कहीं शिल्पी को कुछ हो न गया हो। राजा ने अंततः द्वार खुलवा दिया। भीतर विश्वकर्मा अदृश्य हो चुके थे और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र तथा सुभद्रा के विग्रह अधूरे रूप में विराजमान थे। राजा को दुख हुआ, लेकिन तभी दिव्य वाणी हुई कि यही रूप कलियुग में पूजित होगा। भगवान ने कहा कि वे इसी स्वरूप में समस्त भक्तों को दर्शन देंगे।
कलियुग में विशेष रूप से प्रकट होने का वरदान
स्कंद पुराण में वर्णित है कि भगवान विष्णु ने राजा इंद्रद्युम्न से कहा कि सत्ययुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग में वे विभिन्न अवतारों में प्रकट हुए, किंतु कलियुग में जगन्नाथ रूप में निवास करेंगे। पौराणिक श्लोकों में उल्लेख मिलता है कि कलियुग में जब धर्म क्षीण होगा, तब पुरुषोत्तम क्षेत्र (पुरी) में भगवान जगन्नाथ के दर्शन और नामस्मरण से भक्तों को विशेष कृपा प्राप्त होगी। इसी कारण उन्हें ‘कलियुग का भगवान’ कहा जाता है।
जगन्नाथ स्वरूप को कलियुग से क्यों जोड़ा जाता है
अधूरा विग्रह- भगवान ने स्वयं कहा कि वे पूर्ण शिल्पित रूप में नहीं, बल्कि इसी दिव्य स्वरूप में पूजित होना चाहते हैं। यह स्वरूप किसी जाति, भाषा या क्षेत्र की सीमा में बंधा नहीं माना गया।
सभी के लिए सुलभ दर्शन- पुरी में भगवान रत्नसिंहासन से निकलकर रथ पर विराजते हैं। रथ यात्रा के समय वे स्वयं भक्तों के बीच आते हैं। यह परंपरा अन्य प्रमुख मंदिरों से अलग मानी जाती है।
नाम और दर्शन की महिमा- पुराणों में कहा गया है कि कलियुग में भगवान जगन्नाथ के दर्शन, रथ यात्रा में सहभागिता और उनके नाम का स्मरण विशेष फलदायी माना गया है।
रथ यात्रा और कलियुग का संबंध