Bahuda Yatra: पुरी की परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घर नौ दिन तक निवास करते हैं। इस अवधि में उन्हें विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं। गुंडिचा मंदिर में भगवान को वही सम्मान और सेवा दी जाती है, जो श्रीमंदिर में दी जाती है।
Bahuda Yatra: जगन्नाथ रथ यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण और भावुक चरण बहुदा यात्रा माना जाता है। यह वह अवसर होता है जब भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा गुंडिचा मंदिर में नौ दिन के प्रवास के बाद पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। ओडिशा के पुरी में निकलने वाली यह वापसी यात्रा उतनी ही श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाई जाती है जितनी मुख्य रथ यात्रा। लाखों श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए मार्ग में एकत्र होते हैं और रथों को खींचने का सौभाग्य प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
बहुदा यात्रा को केवल वापसी यात्रा नहीं माना जाता, बल्कि इसे भगवान जगन्नाथ के वार्षिक लीलाक्रम का अनिवार्य भाग समझा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि गुंडिचा मंदिर भगवान की मौसी का घर है, जहां वे विश्राम और विशेष सेवाओं को स्वीकार करते हैं। नौ दिन बाद भगवान का पुनः श्रीमंदिर लौटना बहुदा यात्रा कहलाता है।
बहुदा यात्रा का अर्थ
‘बहुदा’ शब्द का अर्थ है – वापस आना या लौटना। रथ यात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर जाते हैं, जबकि बहुदा यात्रा के दिन वे उसी मार्ग से वापस अपने मुख्य धाम लौटते हैं। यह यात्रा आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन संपन्न होती है। इस दिन तीनों रथ पुनः सजाए जाते हैं और गुंडिचा मंदिर से प्रस्थान करते हैं। सबसे आगे बलभद्र का रथ तालध्वज, उसके बाद सुभद्रा का दर्पदलन और अंत में भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ चलता है।
गुंडिचा मंदिर से वापसी की परंपरा
पुरी की परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घर नौ दिन तक निवास करते हैं। इस अवधि में उन्हें विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं। गुंडिचा मंदिर में भगवान को वही सम्मान और सेवा दी जाती है, जो श्रीमंदिर में दी जाती है। नौ दिन पूर्ण होने पर भगवान की वापसी की तैयारियाँ आरंभ होती हैं। रथों की पुनः पूजा होती है, सेवक और पुजारी विशेष विधि से भगवान को रथों पर विराजमान करते हैं और फिर बहुदा यात्रा का शुभारंभ होता है।
पौराणिक कथा और धार्मिक मान्यता
स्कंद पुराण और जगन्नाथ परंपरा में वर्णित कथा के अनुसार राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान जगन्नाथ की स्थापना के बाद यह उत्सव प्रारंभ कराया था। गुंडिचा मंदिर को उस पवित्र स्थान के रूप में माना जाता है जहाँ भगवान विशेष रूप से भक्तों के बीच निवास करते हैं। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ वर्ष में एक बार अपने भक्तों के समीप आने के लिए स्वयं श्रीमंदिर से बाहर निकलते हैं। गुंडिचा मंदिर में निवास के बाद जब वे लौटते हैं तो यह बहुदा यात्रा कहलाती है। इस यात्रा में भगवान को मार्ग में रुक-रुक कर विभिन्न सेवाएं अर्पित की जाती हैं।
मौसी मां मंदिर में विशेष विराम
बहुदा यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ मौसी मां मंदिर के निकट रुकता है। यहां भगवान को ‘पोडा पीठा’ नामक पारंपरिक पकवान अर्पित किया जाता है। यह ओडिशा का प्रसिद्ध प्रसाद है और माना जाता है कि भगवान को यह विशेष रूप से प्रिय है। मौसी मां मंदिर में यह भोग अर्पित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है और बहुदा यात्रा का प्रमुख आकर्षण मानी जाती है।
क्या होता है सुनाबेशा?
बहुदा यात्रा के अगले दिन भगवान तीनों रथों पर ही स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत होते हैं। इस उत्सव को सुनाबेशा कहा जाता है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा स्वर्ण मुकुट, स्वर्ण भुजाएं और अन्य आभूषण धारण करते हैं। श्रद्धालुओं के लिए यह दर्शन अत्यंत दुर्लभ और पुण्यदायक माना जाता है।
अधरपाना और अन्य अनुष्ठान
बहुदा यात्रा के बाद रथों पर अधरपाना अनुष्ठान भी किया जाता है। इसमें विशाल पात्रों में विशेष पेय तैयार कर भगवान को अर्पित किया जाता है। परंपरा के अनुसार यह पेय रथों में निवास करने वाले देवताओं और अदृश्य शक्तियों को समर्पित होता है। अनुष्ठान के अंत में पात्रों को तोड़ दिया जाता है।
यात्रा का समापन
बहुदा यात्रा के बाद अंतिम महत्वपूर्ण अनुष्ठान ‘नीलाद्री बीजे’ होता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ पुनः श्रीमंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। परंपरा के अनुसार देवी लक्ष्मी भगवान से रुष्ट होती हैं, क्योंकि वे उन्हें साथ लिए बिना गुंडिचा मंदिर चले गए थे। मंदिर की परंपरा में भगवान और देवी लक्ष्मी के बीच संवाद और मनुहार की रस्म निभाई जाती है। इसके बाद भगवान को मंदिर में प्रवेश की अनुमति मिलती है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)