Bhagwan Jagannath: आषाढ़ मास के शुभ संयोग में भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने विशालकाय रथों पर सवार होकर गुंडीचा मंदिर के लिए निकल पड़े हैं। पूरा पुरी धाम 'जय जगन्नाथ' के जयघोष से गूंज उठा है।
Bhagwan Jagannath Rath Yatra: ओडिशा के पुरी धाम में भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा श्रद्धा और उत्साह के साथ शुरू हो गई। इस वर्ष रथ यात्रा का शुभारंभ विशेष शुभ संयोग में हुआ, जिसे धार्मिक दृष्टि से अत्यंत मंगलकारी माना जा रहा है। जैसे ही भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने-अपने विशालकाय रथों पर विराजमान होकर मंदिर से बाहर आए, पूरा पुरी धाम "जय जगन्नाथ" के जयघोष से गूंज उठा। देश-विदेश से पहुंचे लाखों श्रद्धालुओं ने भगवान के दर्शन पाकर अपने को बहुत भाग्यशाली मान रहे हैं।
मान्यता है कि इस दौरान भगवान के दर्शन करने और रथ की रस्सी खींचने से भक्तों को विशेष पुण्यफल की प्राप्ति होती है और जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। इसके अलावा श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यही कारण है कि हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक यात्रा का हिस्सा बनने पुरी पहुंचते हैं।
तीन अलग-अलग रथों की विशिष्ट परंपरा
यात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के लिए तीन विशाल और अलग-अलग रथ होते हैं।
नंदीघोष: यह भगवान जगन्नाथ का रथ है, जो सबसे बड़ा होता है। इसमें 16 पहिए होते हैं और इसे इसके लाल और पीले रंग से पहचाना जा सकता है।
तालध्वज: यह भगवान बलभद्र का रथ है।
दर्पदलन या पद्मध्वज: यह देवी सुभद्रा का रथ है।
रथयात्रा की पूरी प्रक्रिया
पहांडी: रथ यात्रा वाले दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को ढोल-नगाड़ों और मंत्रोच्चार के बीच झूमते हुए मंदिर से बाहर निकालकर रथों तक लाया जाता है।
छेरा पहरा: पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से तीनों रथों को साफ करते हैं और उन पर सुगंधित जल छिड़कते हैं。
रथ खींचना: भक्त भारी-भरकम और विशाल रथों (नंदीघोष, तालध्वज, दर्पदलन) को मोटी रस्सियों से खींचकर मुख्य मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर दूर 'गुंडिचा मंदिर' तक ले जाते हैं।
गुंडिचा में प्रवास: गुंडिचा मंदिर को भगवान की 'मौसी का घर' माना जाता है, जहां देवगण 7 दिनों तक विश्राम करते हैं।
बहुदा यात्रा: नौवें दिन भगवान की मुख्य मंदिर वापसी की यात्रा होती है, जिसे बहुदा यात्रा कहते हैं।
सोना भेषा: वापसी पर मुख्य मंदिर के सिंहद्वार के सामने भगवान को सोने के आभूषणों से सजाया जाता है।
निलाद्रि बीजे: यह यात्रा का अंतिम चरण होता है। देवी लक्ष्मी मुख्य मंदिर का द्वार बंद कर देती हैं। भगवान जगन्नाथ उन्हें रसगुल्ले (ओडिशा का प्रसिद्ध 'रसगोला') भेंटकर मनाते हैं और गर्भगृह में लौटते हैं।
विशालकाय रथों पर विराजमान हुए भगवान
रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा अलग-अलग भव्य और विशाल रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की ओर रवाना हो गए हैं। इस यात्रा के लिए जिन रथों का निर्माण किया गया है उन्हें हर वर्ष की तरह पारंपरिक तरीके से विशेष प्रकार की लकड़ी से बनाया गया है। रंग-बिरंगे कपड़ों, सुंदर नक्काशी और धार्मिक प्रतीकों से सजे ये रथ श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बने रहे हैं। जैसे ही रथ आगे बढ़े, भक्तों ने उत्साह के साथ जयघोष करना शुरू दिया।
जयघोष और भक्ति से सराबोर हुआ पुरी धाम
रथ यात्रा के दौरान पूरा पुरी धाम भक्तिमय माहौल में डूब गया। हर तरफ "जय जगन्नाथ" के जयघोष, शंखनाद, घंटियों की ध्वनि और भजन-कीर्तन सुनाई दे रहे हैं। श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए घंटों पहले से सड़कों के किनारे खड़े रहे। कई भक्त हाथ जोड़कर भगवान से सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते दिखाई दिए। पूरा वातावरण आस्था, श्रद्धा और उत्साह से भर गया।
छेरा पहरा की परंपरा बनी आकर्षण का केंद्र
रथ यात्रा शुरू होने से पहले गजपति महाराज ने सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए 'छेरा पहरा' की रस्म निभाई। इस दौरान उन्होंने सोने की झाड़ू से भगवान के रथों की सफाई की। यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि भगवान के सामने सभी समान हैं और सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
रथ खींचने के लिए उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
रथ यात्रा के सबसे विशेष पल तब आए जब हजारों श्रद्धालुओं ने मोटी रस्सियों के सहारे भगवान के रथों को खींचना शुरू किया। धार्मिक मान्यता है कि भगवान के रथ को खींचने का सौभाग्य प्राप्त होना अत्यंत पुण्यदायी होता है। यही कारण है कि हर वर्ष लाखों लोग इस सेवा में शामिल होने के लिए पुरी पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं का उत्साह और भगवान के प्रति उनकी अटूट आस्था इस अवसर पर साफ दिखाई दी।