Ram Katha: चैत्र शुक्ल पंचमी को गुहराज निषाद की जयंती मनाई जाती है। राम कथा में कई तरह के रहस्य छुपे हुए हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार प्रभु श्री हरि विष्णु क्षीरसागर में अपनी पत्नी माता लक्ष्मी के साथ शेषनाग की शय्या बनाकर उस पर विश्राम करते हैं।
Ram Katha: चैत्र शुक्ल पंचमी को गुहराज निषाद की जयंती मनाई जाती है। राम कथा में कई तरह के रहस्य छुपे हुए हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार प्रभु श्री हरि विष्णु क्षीरसागर में अपनी पत्नी माता लक्ष्मी के साथ शेषनाग की शय्या बनाकर उस पर विश्राम करते हैं। इसी दौरान एक कछुआ मोक्ष पाने की इच्छा से बार बार विष्णु जी के पैर छूने का प्रयास करता है। मोक्ष पाने की इच्छा से उन्होंने क्षीरसागर में भगवान विष्णु के चरण स्पर्श करने का कई बार प्रयास किया परंतु माता लक्ष्मी की सतर्कता से कारण वह ऐसा करने में असफल रहा।
अगले कई जन्मों तक भी यही सिलसिला चलता रहा लेकिन इस दौरान उन्होंने भगवान को पहचानने की दिव्य दृष्टि प्राप्त कर ली। त्रेतायुग यानी श्रीराम के काल में इसी कछुए ने केवट के रूप में जन्म लिया और फिर प्रभु श्रीराम जब वनवास गमन के समय गंगा पार करने के लिए गंगा किनारे खड़े हुए तो केवट ने उन्हें पहचान लिया।
उस केवट का नाम गुहराज निषाद था। गुहराज निषाद से प्रभु श्रीराम ने कहा कि हमें गंगा के उस पार ले चलो। निषादराज केवट का वर्णन रामचरित मानस के अयोध्या कांड में किया गया है। राम केवट को आवाज देते हैं- नाव किनारे ले आओ, पार जाना है। मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥
चरन कमल रज कहुं सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥
- श्री राम ने केवट से नाव मांगी, पर वह लाता नहीं है। वह कहने लगा- मैंने तुम्हारा मर्म जान लिया। तुम्हारे चरण कमलों की धूल के लिए सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है। वह कहता है कि पहले पांव धुलवाओ, फिर नाव पर चढ़ाऊंगा। छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई॥
तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई॥3॥
भावार्थ:-जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुंदरी स्त्री हो गई (मेरी नाव तो काठ की है)। काठ पत्थर से कठोर तो होता नहीं। मेरी नाव भी मुनि की स्त्री हो जाएगी और इस प्रकार मेरी नाव उड़ जाएगी, मैं लुट जाऊँगा (अथवा रास्ता रुक जाएगा, जिससे आप पार न हो सकेंगे और मेरी रोजी मारी जाएगी) (मेरी कमाने-खाने की राह ही मारी जाएगी)॥3॥
केवट ने भगवान से कहा कि मैंने सुना है आपके चरणों में ऐसा जादू है कि पत्थर भी मनुष्य बन जाता है। मेरी नाव तो लकड़ी की है और उसी से मेरा घर चलता है। अगर वह भी मनुष्य में बदल कर गायब हो गई तो मेरी रोजी-रोटी छिन जाएगी। अतः मैं पहले आपके पांव पखारकर यह देखूंगा कि कुछ होगा तो नहीं, फिर ही आपको गंगा पार कराऊंगा। * एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू॥
जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥4॥
भावार्थ:-मैं तो इसी नाव से सारे परिवार का पालन-पोषण करता हूँ। दूसरा कोई धंधा नहीं जानता। हे प्रभु! यदि तुम अवश्य ही पार जाना चाहते हो तो मुझे पहले अपने चरण कमल पखारने (धो लेने) के लिए कह दो॥4॥
इसके बाद गुहराज निषाद ने पहले प्रभु श्रीराम के चरण धोए और फिर उन्होंने अपनी नाव में उन्हें सीता, लक्ष्मण सहित बैठाया। आज गुहराज निषाद के वंशज और उनके समाज के लोग उनकी पूजा अर्चन करते हैं। चैत्र शुक्ल पंचमी को उनकी जयंती मनाई है।