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Maharshi Dronacharya Ka Janm: कैसे हुआ था गुरु द्रोणाचार्य का जन्म? जानिए रहस्यमयी कथा

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Maharshi Dronacharya Ka Janm: महर्षि द्रोणाचार्य पांडवों और कौरवों के गुरु थे इसके साथ ही साथ वे अश्वत्थामा के पिता भी थे। कहा जाता है कि गुरु द्रोणाचार्य का महाभारत के युद्ध के साथ ही साथ सभी प्रमुख योद्धाओं के जीवन में भी एक अहम भूमिका थी।

Maharshi Dronacharya Ka Janm
Maharshi Dronacharya Ka Janm: महर्षि द्रोणाचार्य पांडवों और कौरवों के गुरु थे इसके साथ ही साथ वे अश्वत्थामा के पिता भी थे। कहा जाता है कि गुरु द्रोणाचार्य का महाभारत के युद्ध के साथ ही साथ सभी प्रमुख योद्धाओं के जीवन में भी एक अहम भूमिका थी। लेकिन गुरु द्रोणाचार्य के जीवन यात्रा की विशेष घटनाओं को देखा जाए, तो उन्होंने कृपाचार्य के साथ ही साथ शिक्षा प्राप्त की और महान धनुर्धर भी बने। 

गुरु द्रोणाचार्य महर्षि परशुराम से दिव्य अस्त्र-शस्त्र की विद्या पाई और बाद में वो कौरवों और पांडवों के गुरु भी बनें। उन्होंने शस्त्र विद्या भी सिखाई। गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन को भी सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाया था, लेकिन जब महाभारत का युद्ध हुआ तो उस समय कौरवों की ओर से लड़ना पड़ा। जिस तरह उनके जीवन की यात्रा रही ठीक वैसे ही द्रोणाचार्य की जन्म की कथा भी है। तो आज इस खबर में गुरु द्रोणाचार्य के जन्म की कथा के बारे में विस्तार से जानेंगे। जो शायद कम ही लोग जानते होंगे।

क्या है गुरु द्रोणाचार्य के जन्म की कथा

महर्षि भारद्वाज एक महान ऋषि थे जो गंगा नदी के तट पर आश्रम बनाकर तपस्या करते थे। एक दिन जब वे गंगा स्नान करने गए तो उन्होंने वहां स्वर्ग की अप्सरा घृताची को देखा। अप्सरा को देखकर महर्षि भारद्वाज के मन में अनायास ही काम वासना जाग उठी और उनके शरीर से वीर्य स्खलित हो गया। उन्होंने तुरंत उस वीर्य को अपने कमंडल में एकत्रित कर लिया। ईश्वर की कृपा से उसी कमंडल में एक दिव्य बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम "द्रोण" पड़ा। संस्कृत में "द्रोण" का अर्थ होता है पात्र (कमंडल), इसलिए उनका नाम "द्रोणाचार्य" हो गया। इस प्रकार महर्षि द्रोण का जन्म किसी स्त्री के गर्भ से नहीं, बल्कि एक पात्र (कमंडल) से हुआ था, जो एक अनोखी बात है।

बता दें कि गुरु द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपि से हुआ था, जिससे उन्हें अश्वत्थामा नामक एक अमर पुत्र की प्राप्ति हुई। कहा जाता है कि अश्वत्थामा को अमरता का श्राप भगवान श्री कृष्ण से मिला था। महाभारत के युद्ध में अपने कर्तव्यों से बंधे होने के कारण द्रोणाचार्य ने कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ना पड़ा।     पांडव जानते थे कि युद्ध में अपने गुरु द्रोणाचार्य को हराना बहुत बड़ी चुनौती है। 

इसलिए, उन्होंने महाभारत युद्ध के दौरान छल से अश्वत्थामा नामक हाथी को मार डाला और जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि मैंने अश्वत्थामा को मार डाला। जब द्रोण ने युधिष्ठिर से इस बात की पुष्टि की, तो युधिष्ठिर ने कहा कि "अश्वत्थामा मर चुका है"। युधिष्ठिर की बातें सुनकर द्रोण विलाप करने लगे और अपने रथ से उतरकर जमीन पर बैठ गए। इस मौके का फायदा उठाकर पांडव सेना के सेनापति धृष्टद्युम्न ने द्रोणाचार्य का वध कर दिया।

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