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Hindu Dharma: दधीचि ने क्यों किया था अपनी अस्थियों का दान? जानें इसके पीछे की पौराणिक कथा

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Hindu Dharma: हिंदू धर्म ग्रंथों और इतिहास में दान की अनेक कथाएं प्रसिद्ध हैं। इनमें दानवीर ऋषि दधीचि की कथा प्रमुख स्थान रखती है। जिन्होंने देवताओं के कल्याण के लिए अपनी अस्थियां दान कर अपना शरीर त्याग दिया था।

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Hindu Dharma: हिंदू धर्म ग्रंथों और इतिहास में दान की अनेक कथाएं प्रसिद्ध हैं। इनमें दानवीर ऋषि दधीचि की कथा प्रमुख स्थान रखती है। जिन्होंने देवताओं के कल्याण के लिए अपनी अस्थियां दान कर अपना शरीर त्याग दिया था। उनकी जयंती आज भी भाद्रपद की शुक्ल अष्टमी को बड़ी आस्था के साथ मनाई जाती है। आइए, आज उन्हीं ऋषि दधीचि की दान की कथा के बारे में विस्तार से जानते हैं।

ऋषि दधीचि की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार ऋषि दधीचि महान ऋषि अथर्व और शांति के पुत्र थे। वे भगवान शिव के उपासक थे। तेज के आगे जब उनकी तपस्या फीकी पड़ गई तो देवराज इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा। उन्होंने अपनी सेना के साथ उन पर आक्रमण भी किया। लेकिन वे असफल रहे। एक बार जब गुरु बृहस्पति क्रोधित हो गए तो देवराज इंद्र ने त्वष्टा के पुत्र विश्वदेव को यज्ञ का पुरोहित बनाया तो उन्होंने गुप्त रूप से उसमें राक्षसों की आहुति दे दी। 

इस बात का पता चलने पर इंद्र ने विश्वदेव का सिर काट दिया। बदला लेने के लिए त्वष्टा ने यज्ञ किया और वृत्रासुर को उत्पन्न किया, जिसने इंद्र देव को युद्ध के लिए चुनौती दी। घबराकर इंद्र ब्रह्मा के पास गए, जिन्होंने उन्हें बताया कि वृत्रासुर का वध केवल ऋषि दधीचि की हड्डियों से बने वज्र से ही किया जा सकता है।

राजा दधीचि का दान

पौराणिक कथाओं के अनुसार, ब्रह्माजी की बात सुनकर देवराज इंद्र झिझकते हुए ऋषि दधीचि के पास गए। जब उन्होंने ऋषि से कहा कि उन्हें वज्र के लिए उनकी हड्डियों की आवश्यकता है, तो वे खुशी-खुशी देने को तैयार हो गए। अपनी हड्डियों का दान करने के बाद उन्होंने फिर योग माया से अपना शरीर त्याग दिया। जिसके बाद देवराज इंद्र ने वृत्रासुर की हड्डियों से वज्र बनाकर उसका वध कर दिया। इस तरह ऋषि दधीचि दूसरों के कल्याण के लिए अपनी हड्डियों का दान करके अमर दानी बन गए।
 
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