Jagannath Rath Yatra: जगन्नाथ मंदिर की परंपरा के अनुसार रथ निर्माण की प्रक्रिया अक्षय तृतीया के दिन प्रारंभ होती है। इसी दिन विशेष पूजा के बाद रथों के निर्माण के लिए लकड़ी काटने का कार्य आरंभ किया जाता है।
Jagannath Rath Yatra: जगन्नाथ रथ यात्रा हिंदू धर्म की सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित यात्राओं में गिनी जाती है। ओडिशा के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर से निकलने वाली यह यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं का जीवंत स्वरूप मानी जाती है। हर वर्ष आषाढ़ मास में भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने-अपने रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर तक यात्रा करते हैं। इस यात्रा की सबसे विशेष बात यह है कि इन तीनों देवताओं के रथ हर साल नए बनाए जाते हैं। पुराने रथों का दोबारा उपयोग नहीं किया जाता। यह परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है और इसके पीछे शास्त्रीय विधान, मंदिर परंपरा और प्राचीन धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।
रथ निर्माण की परंपरा कब से शुरू होती है?
जगन्नाथ मंदिर की परंपरा के अनुसार रथ निर्माण की प्रक्रिया अक्षय तृतीया के दिन प्रारंभ होती है। इसी दिन विशेष पूजा के बाद रथों के निर्माण के लिए लकड़ी काटने का कार्य आरंभ किया जाता है। मंदिर प्रशासन द्वारा चयनित कारीगर, जिन्हें “महारण” कहा जाता है, पीढ़ियों से इस कार्य को करते आ रहे हैं। रथ निर्माण केवल तकनीकी कार्य नहीं माना जाता, बल्कि इसे धार्मिक अनुष्ठान के रूप में संपन्न किया जाता है।
रथों के लिए लकड़ी विशेष प्रकार के वृक्षों से ली जाती है। इन वृक्षों का चयन भी धार्मिक विधि से किया जाता है। पारंपरिक रूप से फासी, धौरा, सिमिली और अन्य निर्धारित वृक्षों की लकड़ी का उपयोग किया जाता है। लकड़ी काटने से पहले पूजा की जाती है और अनुमति प्राप्त की जाती है।
हर साल नए रथ बनाने का मुख्य कारण
शास्त्रीय परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ के रथ “नवकलेवर” की भावना से जुड़े माने जाते हैं। जिस प्रकार भगवान के विग्रह विशेष अवसरों पर नए स्वरूप में प्रतिष्ठित किए जाते हैं, उसी प्रकार रथों को भी हर वर्ष नया बनाया जाता है। मंदिर परंपरा में रथ को केवल वाहन नहीं, बल्कि देव स्वरूप का अंग माना गया है। इसलिए पुराने रथ को पुनः उपयोग में नहीं लाया जाता।
एक अन्य कारण यह भी बताया जाता है कि रथ यात्रा के दौरान रथों पर लाखों श्रद्धालुओं का भार पड़ता है। यात्रा कई किलोमीटर तक चलती है और रथों को रस्सियों से खींचा जाता है। ऐसे में लकड़ी की संरचना पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। परंपरा के अनुसार अगली यात्रा के लिए नए रथ बनाकर देवताओं को नवीन और पवित्र रथ प्रदान किए जाते हैं।
तीनों रथों के अलग-अलग नाम
जगन्नाथ रथ यात्रा में तीन अलग-अलग रथ बनाए जाते हैं। प्रत्येक रथ का नाम, आकार और रंग निश्चित होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नंदीघोष है। भगवान बलभद्र के रथ का नाम तालध्वज है और देवी सुभद्रा के रथ का नाम दर्पदलन है। इन रथों के पहियों की संख्या भी अलग होती है। नंदीघोष में 16 पहिए, तालध्वज में 14 पहिए और दर्पदलन में 12 पहिए बनाए जाते हैं। रथों की ऊंचाई, चौड़ाई और सजावट भी परंपरा के अनुसार निर्धारित रहती है।
रथ निर्माण से जुड़ी धार्मिक विधियां
रथ निर्माण के दौरान अनेक धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। लकड़ी के प्रत्येक भाग को जोड़ने से पहले मंत्रोच्चार होता है। रथों के पहिए, धुरी, छत्र और ध्वज विशेष विधि से स्थापित किए जाते हैं। निर्माण पूरा होने के बाद रथों का शुद्धिकरण और पूजन किया जाता है।
मंदिर की परंपरा के अनुसार रथ निर्माण में लोहे की कीलों का उपयोग सीमित मात्रा में किया जाता है। अधिकांश भाग लकड़ी की जोड़ाई और पारंपरिक तकनीकों से तैयार किए जाते हैं। यही कारण है कि आज भी रथ निर्माण की शैली प्राचीन स्वरूप में सुरक्षित है।
पुराने रथों का क्या किया जाता है?
रथ यात्रा समाप्त होने के बाद पुराने रथों को मंदिर परिसर में अलग किया जाता है। उनकी लकड़ी का उपयोग सामान्य निर्माण कार्यों में नहीं किया जाता। परंपरा के अनुसार उस लकड़ी को धार्मिक उपयोगों और मंदिर से जुड़े विशेष कार्यों में लगाया जाता है। कुछ भागों का उपयोग मंदिर की रसोई और अन्य पवित्र कार्यों में भी किया जाता है। इस प्रक्रिया को भी धार्मिक विधान का हिस्सा माना जाता है, क्योंकि रथ यात्रा के दौरान वे रथ भगवान के वाहन के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके होते हैं।
प्राचीन ग्रंथों में रथ परंपरा का उल्लेख
स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और अन्य वैष्णव ग्रंथों में पुरी की रथ यात्रा का उल्लेख मिलता है। इन ग्रंथों में भगवान के रथारोहण और गुंडिचा यात्रा का वर्णन किया गया है। परंपरा के अनुसार रथ निर्माण की विधि भी इन्हीं प्राचीन नियमों पर आधारित मानी जाती है। पुरी के गजपति महाराज भी इस यात्रा में विशेष भूमिका निभाते हैं। रथ यात्रा के दिन “छेरा पहरा” नामक परंपरा निभाई जाती है, जिसमें गजपति महाराज स्वर्ण झाड़ू से रथों की सफाई करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और रथों की पवित्रता से जुड़ी मानी जाती है।
रथ यात्रा के लिए कितनी लकड़ी लगती है?
तीनों रथों के निर्माण में सैकड़ों घनफुट लकड़ी का उपयोग होता है। हर वर्ष निर्धारित जंगलों से लकड़ी लाई जाती है और उसका लेखा-जोखा मंदिर प्रशासन रखता है। रथ निर्माण में लगभग दो माह का समय लगता है। दर्जनों कारीगर दिन-रात कार्य करके समय पर रथ तैयार करते हैं।
रथों की सजावट भी हर वर्ष नई
केवल रथों की लकड़ी ही नहीं, बल्कि उनकी सजावट भी हर वर्ष नई तैयार की जाती है। रथों पर लगने वाले वस्त्र, छत्र, ध्वज, रस्सियां और अलंकरण नए बनाए जाते हैं। प्रत्येक रथ के लिए अलग रंगों का प्रयोग होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ में लाल और पीले रंग का संयोजन, बलभद्र के रथ में लाल और हरे रंग का तथा सुभद्रा के रथ में लाल और काले रंग का उपयोग किया जाता है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)